किताबों और यूनिफॉर्म पर 20–25% तक महंगाई, स्कूलों से ही थमाए जा रहे तय दुकानों के विजिटिंग कार्ड
बाबूगिरी ब्यूरो
चंडीगढ़, 7 अप्रैल 2026: ट्राइसिटी (चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली) में नए शैक्षणिक सत्र के साथ ही एक बार फिर निजी स्कूलों और बुक सेलरों के बीच कथित ‘सैटिंग’ का खेल शुरू हो गया है। हर साल की तरह इस बार भी अभिभावकों को किताबों, कॉपियों और स्कूल यूनिफॉर्म के नाम पर भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है।
अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन और बुक सेलरों के बीच पहले से ही ‘डील’ तय होती है, जिसके चलते किताबों के दामों में इस साल 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी कर दी गई है। एडमिशन के समय ही अभिभावकों को तय दुकानों के विजिटिंग कार्ड थमा दिए जाते हैं और वहीं से किताबें व यूनिफॉर्म खरीदने के लिए कहा जाता है।
तय दुकानों से ही खरीदने की मजबूरी
अभिभावकों का कहना है कि स्कूलों द्वारा निर्धारित दुकानों से ही किताबें खरीदने का दबाव बनाया जाता है। इन दुकानों पर किताबें ‘बंडल’ के रूप में दी जाती हैं, जिसमें अनावश्यक स्टेशनरी—जैसे कवर, पेंसिल, रबर, स्केच पेन, फेविकोल और कॉपियां—भी शामिल होती हैं।
चंडीगढ़ निवासी वीरेंद्र चहल और कप्तान सिंह ने बताया कि “एक ही दुकान से सभी किताबें मिलने का मतलब साफ है कि स्कूल, पब्लिशर और बुक सेलर के बीच सांठगांठ है। अभिभावकों को मजबूरी में महंगे दामों पर पूरा पैकेज लेना पड़ता है।”
हर साल बदल रहा सिलेबस, बढ़ रही परेशानी
अभिभावकों ने यह भी आरोप लगाया कि निजी स्कूलों में हर साल सिलेबस बदल दिया जाता है, जिससे पुरानी किताबें किसी काम की नहीं रहतीं। पहले छात्र अपनी पुरानी किताबें जूनियर बच्चों को दे देते थे, जिससे गरीब परिवारों को राहत मिलती थी, लेकिन अब यह परंपरा लगभग खत्म हो गई है।
कई स्कूलों में CBSE और NCERT की बजाय निजी पब्लिशर्स की महंगी किताबें लगवाई जा रही हैं।
लंबी कतारें और ‘नो ऑप्शन’ सिस्टम
निर्धारित दुकानों पर अभिभावकों की लंबी कतारें लग रही हैं। यदि कोई अभिभावक केवल किताबें लेना चाहता है और स्टेशनरी नहीं खरीदता, तो उसे बार-बार चक्कर लगवाए जाते हैं। कई मामलों में किताबें अन्य दुकानों पर उपलब्ध ही नहीं होतीं, जिससे अभिभावक पूरी तरह से बंधे हुए नजर आते हैं।
पहले भी हो चुकी है कार्रवाई
पिछले वर्ष इस मामले को लेकर प्रशासन हरकत में आया था। टैक्स विभाग और जीएसटी टीम ने शहर की कई बुक शॉप्स पर छापेमारी कर दस्तावेजों की जांच की थी। हालांकि, इसके बावजूद इस साल भी स्थिति में खास सुधार देखने को नहीं मिला है।
अभिभावकों की मांग
अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि:
स्कूलों को किसी एक दुकान से खरीदारी के लिए बाध्य करने से रोका जाए
NCERT आधारित सस्ती किताबों को प्राथमिकता दी जाए
बुक्स और यूनिफॉर्म की ओपन मार्केट में उपलब्धता सुनिश्चित की जाए
इस ‘कमीशन सिस्टम’ की जांच कर सख्त कार्रवाई की जाए
हर साल उठने वाला यह मुद्दा अब एक गंभीर उपभोक्ता अधिकार का मामला बन चुका है। यदि समय रहते प्रशासन ने सख्त कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में अभिभावकों की आर्थिक परेशानी और बढ़ सकती है।












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