सब की पगड़ी को हवाओं में उछाला जाए
सोचता हुं कोई अखबार निकाला जाए,
आसमां ही नहीं इक चांद भी रहता है यहां
भूल कर भी कभी पत्थर न उछाला जाए
हरियाणा में विकास इस कदर कुलांचे भर रहा है कि सरकार का अब इस पर नियंत्रण नहीं रहा है। एक तरह से ये बेकाबू सा हो चला है। पिछले दिनों एक चौंकाने वाली खबर पढने को मिली की जींद नगर परिषद की एक नई नवेली इमारत दो बरस से खाली पड़ी है। सरकार अभी तक ये फैसला नहीं ले पा रही कि हमने इसका इस्तेमाल करना है या नहीं करना है? करना है तो क्या करना है? नहीं करना तो क्यों नहीं करना? इसको किराए पर देना है या इसे बेचना है या इसे किसी अन्य नेक काम के लिए इस्तेमाल में लेना है? अगर सरकार विकास करवाने में इसी गति से बिजी रही और इस बाबत फैसला नहीं ले पाई तो जाहिर है कि इस इमारत को खंडहर होने से बचाने के लिए या तो जींद की जनता को हवन यज्ञ करवाने होंगे या फिर उन बाबाओं की शरण में जाना होगा जो खुद को ईश्वर का डायरेक्ट अवतार बताते हैं। आमतौर पर सरकारों में पहले ये फैसला होता है कि किस काम के लिए इमारत बनाई जानी है। मसलन यहां पर स्कूल बनेगा,यहां हस्पताल के लिए भवन बनेगा,यहां सचिवालय बनेगा, यहां विश्राम गृह बनेगा आदि इत्यादि। संभवत: जब विकास हद से गुजर जाए तभी किसी सरकार में ये अवस्था उत्पन्न होती होगी कि पहले इमारत बनाने का फैसला होता है और फिर बाद में ये तय किया जाता है कि इसका इस्तेमाल करना भी है या नहीं? आप सोचिए कि दो बरस से 14 करोड़ रूपए का ये भवन मुंह बाएं खड़ा है और हमारी सरकार इस पर फैसला नहीं कर पा रही। धन्य है हमारे होनहार वो अधिकारीगण और वो नेतागण, जिनके पास इस तरह के मामलों में फैसले लेने के दायित्व हैं और वो हैं कि इस नाजुक मसले पर ना इधर की कह पा रहे हैं,ना उधर की। ये तो जींद का एक उदाहरण है। हो सकता है कि पूरे प्रदेश में ऐसे और भी बहुत से भवन हों जो कि बन तो गए,लेकिन जनता के काम आने के लिए तरस रहे हों। खड़े खड़े खंडहर हो रहे हों और हो सकता है कि ये किसी दिन अचानक से तंग आकर बैठ ही जाएं। सोचें कि इनकी भी तो एक लिमिट होती होगी खड़ा रहने की। अगर रखरखाव नहीं होगा तो कब तक ये यंू सीना ताने खड़ा रहेंगे। और सरकार में इस तरफ किसी का ध्यान भी हो तो क्यों ही हो? इस तरह के भवनों के निर्माण पर होने वाली कमीशनखोरी तो बहुत पहले हो ही ली होगी। अब किसी को इस से क्या लेना कि इसका इस्तेमाल हो रहा है कि नहीं। इसी तरह से पानीपत से दिल्ली मार्ग पर पानीपत में एक एग्रोमाल का एक भवन भी है जो कई बरस से सीना ताने खड़ा है। अब वो कुछ कुछ डरा सहमा सा रहने लगा है। जब वो बन कर तैयार हुआ था तब वो खुद पर बहुत इतराया फिर रहा था कि देखो मेरी लोकेशन देखो, मेरी खूबसूरती, देखो मेरा इस्टाइल, देखो मेरी अदा और अंदाज। सोच रहा था कि यहां अब खूब चहल पहल रहा करेगी। हर रोज रोज नए नए लोगों के दीदार होंगे। मार्किट में मेरी वैल्यू में इजाफा हो जाएगा। सब तरफ मेरा ही जलवा होगा। अब सरकार तो सरकार होती है। अच्छे अच्छों की फड़क निकाल देती है। इस अदने से एग्रोमाल की तो औकात ही क्या? कई बरस से इसे यंू ही बीच चौराहे के खड़ा कर के रखा हुआ है। इस से कोई काम नहीं लिया जा रहा। हम नागरिकों के खून पसीने के करोड़ों रूपए सरेआम सरकारी निर्लज्जता की भेंट चढ रहे हैं। आप ने अपने देश के कर्णधार अफसरों के इंटरव्यू देखे और सुने होंगे। जब ये नौकरी में आते हैं तो इन इंटरव्यूज में मन को लुभाने वाली गल्लां करते हैं। हम ये कर देंगे। हम वो कर देंगे।
सच में.. इनकी बातें सुन कर दिल पसीज जाता है और हम अपने आप पर नाज करने लग जाते हैं कि हमारा देश और प्रदेश कितने सुरक्षित हाथों में है। ये अधिकारीगण सरकारी खर्च पर विदेशों में पढाई और ट्रेनिंग भी करके आते रहते हैं और हम ये सोचते हैं कि ये वापस लौट कर विकास में जो अब तक कसर रह गई थी उसको पूरी कर देंगे। अब तक ये और ज्यादा होशियार, समझदार, तर्जुेबकार और इज्जतदार हो चुके होते हैं। मगर इनकी प्राथमिकता कुछ और ही होती है। जाहिर है कि ये इन सब मामलों को सिरे चढाने में अपना वक्त बर्बाद नहीं करते। इनका तो नाता वहीं तक होता है जहां तक इनका मेरा क्या पूरा हो रहा होता है। जींद और पानीपत के ये दो भवन कृषि विभाग और नगर निकाय विभाग की कार्यशैली या यंू कहें कि समूची सरकार के काम करने के तरीके के उदाहरण मात्र हैं। ऐसे उदाहरण तो प्रदेश में अन्य स्थानों और अन्य विभागों में भी समुचित मात्रा में उपलब्ध होंगे। क्या सरकार को पूरे प्रदेश में ये सर्वे नहीं करवाना चाहिए कि किस विभाग की इमारतें, किस जगह, कब से और क्यों बिना इस्तेमाल के जर्जर हुई जा रही हैं? जिन अधिकारियों के ऊपर उनके सही इस्तेमाल करने-करवाने का दायित्व था, क्या उनको अपने कर्त्तव्य में कोताही की सजा नहीं मिलनी चाहिए? क्या उनको इस मामले में जिम्मेदार और कसूरवार नहीं ठहराया जाना चाहिए? जो लोग सरकारी सिस्टम से मामूली से भी वाकिफ हैं उनको पता है कि इस तरह के कामों की मंजूरी मिलने,टेंडर होने और उनको सिरे चढाने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। ये सवाल तो पूछा जाना ही चाहिए कि अगर ये भवन जरूरी नहीं तो फिर बनाए क्यों गए? और अगर जरूरी थे तो फिर इनका इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा? ये नहीं होना चाहिए कि गन्ना पाड़या और चले खेत से बाहर। सरकार को ऐसे मामलों में कोताही करने वालों की जवाबदेही जरूर तय करनी चाहिए। बाकी सरकार चाहे कोई हो उस से ज्यादा सी उम्मीद भी नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि सरकार तो सरकार होती है। इसमें निरे उच्चकोटि के समझदार लोगों का गिरोह होता है। इनको किसी से-किसी सलाह की जरूरत नहीं हुआ करती। इनको पता है कि कब, किस काम पर, कितनी ऊर्जा लगानी है। सो घणा सयाणा बनने की जरूरत नहीं है। ज्ञान पेलने की जरूरत नहीं है। हम तो इस मामले में संलिप्त सभी लोगों की जय जयकार करते हुए यही कहेंगे कि सरकार जो कर रही है, ठीक कर रही है। जो करेगी, ठीक करेगी और जो किया है,ठीक किया है।
लव लैटर
अब समझ में आया कि कभी हसरत जयपुरी ने ये क्यों लिखा था कि…मेहरबां लिखूं,हसीना लिखंू,या दिलरूबा लिखूं,हैरान हंू के आप को इस खत में क्या लिखंू,ये मेरा प्रेम पत्र पढ कर के तुम नाराज न होना। तो किस्सा ये है कि अपने यहां मनचाही पोस्टिंग के लिए सिफारिशें करवाना-तिकड़म लगाने की परंपरा अनंत काल से चली आ रही है। गुरूग्राम के डीसी उत्तम सिंह इस परंपरा की राह में अवरोध बन कर खड़ा हो गए हैं। उन्होंने अपने अधीनस्थों को सलाह की आड़ में आदेश जारी करते हुए कहा कि प्रशासन के संज्ञान में आया है कि कुछ कर्मचारी सरकारी नियमों को ताक पर रखकर नेताओं,सीनियर अफसरों,और बाहरी माध्यमों के जरिए अपनी ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन सभी पुण्य आत्माओं को कहा जाता है कि अगर उनको कोई कष्ट है-खाज है तो वो जालिम लोशन का इस्तेमाल करे। ये लोशन इस तरह के मामलों से उत्पन्न दाद,खाज,खुजली का असरदार रामबाण इलाज है। इस चिट्ठी का निचोड है कि अगर किसी कर्मचारी को कोई दिक्कत है तो सरकार में प्ररोपर चैनल के जरिए-नियमों के तहत अपने कष्ट निवारण का रास्ता तलाशें। अगर कोई इन हिदायतों की अवहेलना करेगा-कोई घणा ऐंडी बणेगा तो उसको मिसकंडक्ट का दोषी माना जाएगा। उसके खिलाफ हरियाणा सिविल सर्विसिज-सजा व अपील नियमों के तहत एक्शन लिया जाएगा। इन बेताब आत्माओं को अब सरकारी दायरे में रह कर ही अपनी इन बेदर्द तमन्नाओं को पूरा करवाने की राह तलाशनी होगी। मलाईदार पोस्टिंग के तलबगार लोग उत्तम सिंह के इस प्रेम पत्र पर अभी तो यही कह रहे होंगे कि..
ख्वाब क्या देखे कि हर मंजर में जाले पड़ गए
ऐसी गर्मी की पीले फूल भी काले पड़ गए
मैं अंधेरों से बचा लाया था अपने आप को
मेरा दुख ये है कि मेरे पीछे उजाले पड़ गए
जिन जमीनों के इंतकाल हैं मेरे पुरखों के नाम
उन जमीनों पर मेरे जीने के लाले पड़ गए
ताक में बैठा हुआ बूढा कबूतर रो दिया
जिस में डेरा था उसी मस्जिद में ताले पड़ गए
कोई वारिस हो तो आए और आ कर देख ले
जिल्ल ए सुब्हानी की ऊंची छत में जाले पड़ गए
सारवान का एक और सुशील फैसला
पंचकूला में नगर निकाय की जमीन एक निजी होटल वालों को देने के मामले में कहानी में कुछ दम सा नहीं रहा। खेल में कुछ स्वाद सा नहीं आ रहार। पहले मीडिया रिपोर्टस में ये दावा किया गया कि पंचकूला के तत्कालीन डीसी सुशील सारवान 200 करोड़ की सरकारी जमीन प्राइवेट पार्टी के नाम करने का बड़ा स्कैंडल कर चलते बने। विपक्ष ने इस मुददे पर खूब हो हल्ला किया। फिर नगर निकाय की अपील पर अंबाला के डिवीजनल कमीशन संजीव वर्मा ने ठोक कर ये फैसला दे दिया कि जो सारवान ने ये सुशील कार्य अंजाम दिया है,वो ठीक किया है। अब रही सही कसर भी पूरी हो गई। पंचकूला के डीसी सतपाल शर्मा ने भी अपनी ताजा तरीन रिपोर्ट में कह दिया कि ये सारा काम-खेल नियमों के मुताबिक खेला गया। इस में कहीं कोई फाउल नहीं हुआ। अब नगर निकाय वालों का फर्ज बनता है कि उनको ये जरूर बताना चाहिए कि उनकी जमीन का कौन सा हिस्सा-कौन सा खसरा नंबर, जिस पर उनका मालिकाना हक था, वो प्राइवेट पार्टी के नाम कर दिया गया? तभी तो इस खेल में कुछ टिवस्ट आएगा। उनको इस राज का पर्दाफाश करना चाहिए कि इस पवित्र कार्य में क्या क्या अनियमितता हुई,किस नियम के तहत हुई और इसमें किस किस अधिकारी की कैसे कैसे-कितनी-कितनी संलिप्तता रही है। अगर ऐसा हो जाए तो फिर खेल रोमांचक बन जाएगा। अगर ऐसा नहीं हो पाता तो फिर यही कहा जाएगा कि खोदा पहाड़-निकली चूहिया। इस तरह के जो काम-खेल, नियमों के नाम पर-नियमों की आड़ में किए जाते हैं,उनको करने में इतनी खुशी मिलती है, मानो साक्षात ईश्वर से मुलाकात हो गई हो। इस हालात पर कहा जा सकता है..
जा के ये कह दे कोई शोलों से, चिंगारी से
फूल इस बार खिले हैं बड़ी तैयारी से
अपनी हर सांस को नीलाम किया है मैंने
लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से
जेहन में जब भी तेरे खत की इबारत चमकी
एक खुशबू सी निकलने लगी अलमारी से
शाहजादे से मुलाकात तो नामुमकिन है
चलिए मिल आते हैं चल कर किसी दरबारी से
बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हम ने खैरात भी मांगी है तो खुददारी से













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