July 13, 2026 10:20 am

July 13, 2026 10:20 am

आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

जरा सी आहट होती है तो दिल ये सोचता है
कहीं ये वो तो नहीं,कहीं ये वो तो नहीं !!!

हरियाणा में बैंक स्कैम में फंसे कुछ लोग तो सीबीआई ने धर दबोचे। इनके लिए सीबीआई वाले शायद यही गुनगुना रहे होंगे कि… दिल में हो तुम,आंखों में तुम, बोलो तुम्हें कैसे चाहंू, पूजा करूं,सजदा करूं, जैसे कहो वैसे चाहंू.. जानंू मेरे जानंू..जान-ए-जानां-जानंू। एक अंग्रेजी अखबार ने डिटेल में रिसर्च कर के ये बताया है कि किस किस अफसर-कर्मचारी की इस घोटाले में क्या भूमिका रही है। इस रिपोर्ट के हिसाब से तो यही लगता है कि देर सवेर कईयों का नंबर लगेगा। जो लोग जेल जाने से वंचित हैं उनको हरदम ये डर सता रहा होगा कि कहीं अब उनका नंबर ना लग जाए। सीबीआई उनको ना पकड़ ले। दरवाजे पर हर आहट से उनका दिल सोचता होगा कि कहीं ये वो नहीं..कहीं ये वो तो नहीं। ऐसा सुनने में आया है कि हरियाणा के जिन अफसरों का इस स्कैम में नाम आया है उसमें से एक तो मर्द निकला। बताते हैं कि इन साहब ने शीर्ष स्तर पर अपनी भावनाएं पहुंचा दी है। कह दिया है कि अगर मुझ पर हाथ डाला गया तो मैं सरकार में एक एक की पोल खोल दूंगा। उनके कहे का निचोड़ राहत इंदौरी के एक शेर में भी है जिसका सार है कि– अगर मेरे घर में आग लगाई गई तो और घर भी चपेट में आ जाएंगे, क्योंकि यहां सिर्फ अकेला मेरा ही मकान थोड़े है। इन अधिकारी ने कहा है कि उनके पास सारा हिसाब किताब में दर्ज है। अब तक किसको, कहां, कितना और क्यों दिया। मैं सबकी पोल खोल दंूगा। किसके कहने से क्या क्या किया। क्या क्या होता रहा है। कहां कहां हिस्सा बंटा। इन्होंने सलीके से और तरीके से अपनी भावनाएं ऊपर तक पहुंचा दी हैं। जैसा कि बातचीत का नियम है कि इसमें सबसे महत्वपूर्ण होता है..सुनना। 20 फीसदी कहना और 80 फीसदी सुनना। जब कभी ऐसे मसले उत्पन्न होते हैं तब सरकारें अत्यंत सजग हो जाती है और वो तो 100 फीसदी तक सिर्फ सुना ही करती हैं। ऐसी बातचीत को ज्यादा सार्थक बनाने पर उतारू हो जाया करती हैं। किसी को आई गई नहीं दिया करती हैं। ना हां कहा करती हैं और ना। अब पता नहीं इन अफसर की ब्लैकमेलिंग का ये पैतरा किसी के…उनके कुछ काम आएगा भी या नहीं? और अगर सरकारें इस तरह आंख दिखाने पर डरने लगें तो हो लिया काम। सरकार चाहे मोम की भी क्यों न हो..सरकार तो सरकार होती है। ऐसे में ज्यादा उचित यही होता है कि नरमाई से ही काम चलाया जाए। गरमाई से आमतौर पर नुकसान हो जाया करता है। बाकि ये अफसर भी ऊंची आयटम है। जो कहा होगा, किया होगा, वो सोच समझ कर ही किया होगा। है के नहीं?

रहम सरकार जी..पब्लिक पर थोड़ा तो रहम करिए
प्रसिद्ध साहित्यकार हरिशंकर परसाई ने कभी लिखा था कि ये मिसफिटस का युग है। जिसे जुआखाना चलाना चाहिए,वो मंत्री है। जिसे डाकू होना चाहिए, वो पुलिस अफसर है। जिसे दलाल होना चाहिए, वो प्रोफैसर है। जिसे जेल में होना चाहिए,वह मजिस्ट्रेट है। जिसे कथावाचक होना चाहिए, वो उपकुलपति है। जिसे जहां नहीं होना चाहिए,वह ठीक वहीं है। हरिशंकर जी का लिखा बरसों बरस बाद भी अक्षर अक्षर सत्य है। उनके लिखे को हरियाणा कुछ नए नवेले आईएएस अफसरों ने ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया। दिल और दिमाग में दो के पहाड़े की तरह बैठा लिया। नौकरी में आते ही दूसरों की मंूछ पाड़ने का टैंडर ले लिया है। उनको ऐसा लगता है कि आईएएस बन कर उनको किसी की भी पगड़ी को हवा में उछालने का लाइसैंस मिल गया है। उनको शायद पता नहीं कि भेड़ बकरी चराने वाले और भेड़ बकरी चराने वालों की औलाद भी इस मुल्क में आईएएस बनते रहे हैं।और भविष्य में भी धड़ल्ले से यूं ही बनती रहेंगी। ये ही तो हमारे देश की खूबसूरती है।

सो..गुरूर किस बात का? किस काम का? के सौदा है भाई थारा? नौकरी में आए हो तो नौकरी करो, लेकिन ये क्या कि आप आदमी को आदमी ही ना समझो। खुद को खुदा समझो ये तो ठीक है, लेकिन इसका ये मतलब तो हरगिज नहीं कि आप सामने वाले को जब चाहे, जैसे चाहो जलील करोगे? और इस सरकार की भी दाद देनी पड़ेगी कि एक ऐसे बददिमाग और बदतमीज आईएएस अफसर को छांट कर पूर्व-अभूतपूर्व मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री मनोहरलाल खटटर की लोकसभा क्षेत्र में आने वाले जिले पानीपत में चाव से लगाया है। यहां इसका एक ही काम है। ये आईएएस अफसर आए दिन खटटर की वोट पक्के करने में जुटा रहता है। किसी से सीधे मुंह बात ही नहीं करता। बोलने तक की तमीज नहीं। एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ी बीएलओज की एक मीटिंग में एक अधीनस्थ कर्मचारी को कह दिया कि मैं तुम्हारे मुंह पर थप्पड़ मारूगां। अब बताइए कि उसको ये कहने का हक किसने दिया? अगर कोई अधीनस्थ सरकारी काम में कोताही करता है तो उस से निपटने के और बहुत से तरीके हैं। सरकारी नियम कायदों के तहत कार्यवाही की जा सकती है। ये क्या सोच हुई कि अगर सामने वाला बीएलओ है तो उसकी कुछ इज्जत नहीं है? उसको कोई भी, कुछ भी कह सकता है। ऐसा कितनी ही दफा देख गया है कि अत्यंत गरीब घर के तीसरे-चौथे दर्जे के कर्मचारियों के बच्चे भी आईएएस-आईपीएस बन जाते हैं। ऐसा भी तो हो सकता है कि ये आईएएस जिन बीएलओ को कम आंक कर सरेआम उनकी बेइज्जत कर रहा हो उनका बेटा भी कहीं आईएएस ही हो। कहने का आशय ये कि सरकार को एक ट्रेनिंग इन आईएएस व ऐसे ही अन्यों की भी करवानी चाहिए। इसमें और नहीं कुछ इनको सिर्फ बोलने की-बात करने की ट्रेनिंग ही दी जाए। ये साधारण मामला नहीं है। ये निहायत ही गंभीर विषय है। जैसे होटल मैनेजमेंट के स्टाफ को बताया और सिखाया जाता है कि किस तरह से गैस्ट से बर्ताव करना है, वैसा इन अफसरों को भी सिखाया जाए। यंू तो ये ट्रेनिंग सरकारी सिस्टम में आने वाले हर कर्मचारी और अधिकारी को दी जानी चाहिए,लेकिन इन आईएएस और आईपीएस के लिए तो अत्यंत अनिवार्य होना चाहिए। अब सोशल मीडिया के जमाने में तो ये और जरूरत बन गई है। बल्कि इसकी एक परीक्षा भी होनी चाहिए। सरकार में शीर्ष स्तर पर ये जरूर देखा जाना चाहिए कि किसी अधिकारी की पब्लिक डीलिंग कैसी है? पोस्टिंग करने में इसका खास ख्याल रखा जाना चाहिए कि अफसर को न केवल एक्ट की जानकारी हो, बल्कि उसके पास पूरे फैक्ट भी हों और वो टैक्टफुल भी हो। ये इसलिए भी जरूरी है कि एक अदने से अधिकारी को सरकारी छवि से खिलवाड़ करने की हरगिज..हरगिज इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। ये नेक काम करने का हक सिर्फ और सिर्फ सरकार का ही होना चाहिए। इन अफसरों को इत्त्ता सा तो बताया जाए कि जब तक आप चुप हैं तभी तक आप.. आप हैं.. जैसे ही आप बोलते हैं, वैसे ही आप की पोल खुल जाती है। दुनिया को झट से पता लग जाता है कि आप.. आप हैं या तुम हैं या कुछ भी नहीं है। अब आप उस अवस्था को प्राप्त कर चुके होते हैं, जहां आप के एक एक शब्द का मूल्यांकन होता है। इसके अनेकों अर्थ निकाले जाते हैं। एक एक बात तौली जाती है। आप कैसे चलते हैं… कैसे उठते हैं.. कैसे मिलते है.. सब पर दुनिया की पैनी नजर रहती है। आप लोग सरकार का चेहरा हैं। आप लोग सरकार की आन बान शान हैं। आप हर किसी की निगाह में हो। ये ठीक है कि छोटी उम्र में पावर मिलने से दिमाग में पावर की पपड़ी जम जाती है। सोचने समझने की शक्ति कम हो जाती है। विवेक की हत्या हो जाती है। एक फितूर सा सवार हो जाता है। एक सनक सी सवार हो जाती है। इसमें हर कोई अपने से कमतर लगने लगता है। ये आचरण बताता है कि आप की परवरिश कैसी हुई है? आप के संस्कार कैसे हैं?आप के पास डिग्री ही है या आप शिक्षित भी हैं?आप का शिक्षा से कुछ लेना देना है के नहीं? इस हालात पर कहा जा सकता है..
दरबदर जो थे वो दीवारों के मालिक हो गए
मेरे सब दरबान,दरबारों के मालिक हो गए
लफ्ज गूंूगे हो चुके,तहरीर अंधी हो चुकी
जितने थे मुखबिर वो सरकारों के मालिक हो गए
लाल सूरज आसमां से घर की छत पर आ गया
जितने थे बेकार सब कारों के मालिक हो गए
और अपने घर में बैठ कर निहारते रहे खुद को
चंद जुगनू चांद और सितारों के मालिक हो गए
देखते देखते कितनी दुकानें खुल गई
बिकने जो आए थे बाजारों के मालिक हो गए
सिर उठे तो सिरों से हाथ धोना पड़ गया
सिर झुकाए जो बैठे थे वो पगड़ी के मालिक हो गए

...चंद लम्हों में बुर्जुग को ब्रांड एंबेसडर में परिवर्तित किया खुल्लर ने
एक अफसर का आचरण कैसा होना चाहिए.. इसको एक उदाहरण से समझा जा सकता है। ये किस्सा चौटाला सरकार के समय का है और राजेश खुल्लर तब भी मुख्यमंत्री सचिवालय के प्रमुख स्तम्भ हुआ करते थे। ये शायद जून, 2004 का समय था। चंडीगढ स्थित हरियाणा सचिवालय में खुल्लर के आफिस में हमेशा की तरह लोगों की भीड़ धंसी हुई थी। प्रदेश भर के लोग उनके आफिस में अपने कामों के लिए उमड़े हुए थे। खुल्लर जबरदस्त बिजी थे। तभी उन्होंने देखा कि धोती कुर्ता पगड़ी पहने हुए करीब 80 वर्षीय पसीने में तर बदर दुबला सा बुर्जुग उन तक पहुंचने के लिए भीड़ से संघर्ष कर रहा है। उन्हें आगे बढने के लिए कोई रास्ता नहीं दे रहा है और वो दरवाजे के पास ही ठिठके हुए हैं। ये देख कर खुल्लर झट से अपनी कुर्सी से खड़े हुए। उन बुर्जुग को एक कुर्सी पर बिठाया। उनको पानी पिलवाया। उनको चाय पिलवाई। बेसन की बर्फी खिलवाई। उन से उनका काम पूछा। बुर्जुग ने बताया कि वो नारनौल जिले के किसी गांव से आया है। खुल्लर ने झट से अपने स्टाफ की डयूटी लगाई और उन बुर्जुग का काम करवा कर बाय हैंड उनके हाथ में कागज पकड़ाया। साथ ही अपने स्टाफ की डयूटी लगाई कि इनकी सेवा में किसी किस्म की चूक न हो जाए। खुल्लर ने ताड़ लिया था कि ये बुर्जुग आज सुबह चार बजे अपने घर से चले होंगे। सुबह पांच बजे वाली चंडीगढ की हरियाणा रोड़वेज की बस ली होगी। ये कितने मजबूर होकर और कितनी आस लेकर यहां तक पहुंचे होंगे। यहां तक आने के लिए कितना संघर्ष किया होगा। पता नहीं कैसे सीएम सचिवालय का एंट्री पास बनवाया होगा। पता नहीं रास्तें में कुछ खाया होगा या नहीं। वो जो जो उन बुर्जुग के लिए कर सकते थे वो भी.. और जो नहीं कर सकते थे वो भी उन्होंने किया। आप सोचिए कि उन बुर्जुग ने खुल्लर को कितनी दुआएं दी होंगी। कितने आशीष दिए होंगे। इतनी इज्जत पाकर-भाव विभोर होकर क्या वो बुर्जुग खुल्लर के-उस सरकार के ब्रांड एंबेसडर नहीं बन गए होंगे? क्या उन्होंने अपने गांव वापस जाकर अपने पोते पोतियों और ग्रामीणों को ये किस्सा नहीं सुनाया होगा? सरकारें आमतौर पर संवदेनशील स्थानों पर अफसरों की पोस्टिंग में सतर्क रहती हैं। ऐसे में ये जरूर देखा जाना चाहिए कि फील्ड में खासतौर पर करनाल संसदीय क्षेत्र में किस तरह के अफसरों की तैनाती की जा रही है? हरियाणा के जिलों में तैनात होने वाले अफसर और कुछ हो या ना हों,लेकिन कम से कम व्यवहार कुशल तो होने ही चाहिए।

बड़े बड़ों को बंदा बना दिया इन भाजपा सरकारों ने
ये तो पानीपत में तैनात इन आईएएस की बदतमीजी का एक छोटा सा किस्सा बताया गया है। ऐसे उनके अनंत किस्से हैं। किस्म किस्म के किस्से हैं। जब ये एसडीम लगे थे..तभी से। तभी शुरू हो गए थे। हमारा मकसद किसी का चरित्रहनन करना कतई नहीं है। इसलिए इनकी जन्मकुंडली पर-इन्होंने कहां कहां, कैसे कैसे गुल खिलाए हैं,इन पर जानबूझ कर अभी बात नहीं की जा रही। हमारा तो यही कहना है कि सम्मान और अपमान सामने वाला ब्याज समेत चुकता करने को आतुर रहता है। ऐसे में क्यों ऐसे कर्म कांड करें कि सामने वाला भी हरदम आपकी मंूछ पाड़ने के लिए व्याकुल रहे? मौका तलाशता रहे। ये जो कुछ नासमझ बालक कुर्सी की गर्मी में इतराते फिर रहे हैं.. किसी को कुछ नहीं समझ रहे हैं ये सब इनका वहम है। मान लो सरकार ने इनको पानीपत से हटा कर बिना पोस्टिंग के कर दिया? फिर क्या करेंगे? हो जाएंगे ना एक झटके में सीधे। आ जाएगी न अक्ल ठिकाने। ऐसी हालत हो जाएगी कि इनको बैठने को कहा जाएगा तो पसर जाएंगे। और ये सरकार तो है ही अच्छे अच्छों को नकेल डालने के लिए। गलतफहमी निकालने के लिए। एक तुर्रम खां आईएएस अफसर पिछली कांग्रेस सरकार में जमकर अखबार और टीवीबाजी किया करते थे। हर समय इंटरव्यूबाजी कर ये दावा किया करते थे कि उन से बड़ा ईमानदार इस दुनिया में कोई नहीं है। उन से बड़ा मसीहा कोई नहीं है। आप सबको पता ही है। फिर हुआ ये कि हरियायाा में भाजपा की सरकार आ गई। एकदम से-अचानक से इनकी अक्ल ठिकाने पर आई पाई गई। एक भी इंटरव्यू कहीं नौकरी में रहते हुए दिया हो जो बताओ। नौकरी से रिटायर हो गए,लेकिन तब भी कहीं कोई चंू नहीं की। समझदारी भी इसी में है। इसी तरह इस सरकार ने तो मुख्यमंत्री सचिवालय तक में रहे अफसर को किनारे कर दिया है। उनके साथ तू कौन-मैं कौन, का काम कर दिया है। जो अफसर हरदम ये सोचते थे कि वो इस सरकार का आंख, कान, नाक यहां तक की आंख,कान और नाक का बाल भी खुद को समझते थे, उनकी अब क्या हालत कर दी है? तो ये पानीपत आला तो सौदा ही किम्मै नहीं। ये सरकार तो है ही बड़े बड़ों का इलाज करने के लिए। इसमें एक से बढ कर एक काबिल सर्जन भरे पड़े हैं। ये फार्मूला अकेले अफसरों पर ही लागू थोड़े हैं। नेताओं पर भी है। सबकी हवा टाइट कर रखी है। क्या अपना और क्या बेगाना। सबकी हेकड़ी निकाल दी है। सब किश्तों में सांस ले रहे हैं। अगर कोई जरा भी चंू कर रहा हो तो बता दो। वैसे भी बारिश का मौसम है। सब तरफ कीचड़ है। फिसलने का भरपूर जोखिम है। सो बीरे मोड़ तो बच के। ओके। सरकार की अदाओं को नमन करते हुए कहा जा सकता है कि..
हम ने कब चाहा कि वो शख्स हमारा हो जाए
इतना सा दिख जाए कि आंखों का गुजारा हो जाए
और हम जिसे पास बिठा ले वो बिछड़ जाता है
तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए
तुमको लगता है कि तुम जीत गए हो हम से
है यही बात तो ये खेल दोबारा हो जाए

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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