October 11, 2026 8:55 am

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अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर जारी किए ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन नायब तहसीलदार और कानूनगो की अग्रिम जमानत रद्द

हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत पर चल रहे थे दोनों अधिकारी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा—मौजूदा तथ्यों में अग्रिम जमानत देना उचित नहीं था

बाबूगिरी न्यूज़
कुरुक्षेत्र/पंचकूला। कुरुक्षेत्र में नए बस स्टैंड के पास हुडा विभाग द्वारा अधिग्रहित जमीन से जुड़े कथित तौर पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ जारी करने के मामले में तत्कालीन नायब तहसीलदार शिवराज सिंह और कानूनगो कर्मबीर सिंह की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। शिवराज को सरकार जबरन रिटायर कर चुकी है। वहीं, कानूनगो कर्मबीर सिंह फिलहाल हिसार में तैनात हैं। कर्मबीर कानूनगो  कैथल में फर्जी एनओसी मामले  में 5 लाख रिश्वत लेते पिछले साल विजिलेंस ने गिरफ्तार किया था, अब बहाल होकर हिसार में लगा हुआ है
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि मौजूदा तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए दोनों अधिकारियों को अग्रिम जमानत दिया जाना उचित नहीं था। यह आदेश जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 28 सितंबर को दीदार सिंह की ओर से दायर दोनों आपराधिक अपीलों पर सुनाया।
दोनों अधिकारियों के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो में मामले दर्ज हैं और जांच एजेंसी मामले की जांच कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब जांच में दोनों अधिकारियों से पूछताछ और अन्य कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।

क्या है पूरा मामला

मामला कुरुक्षेत्र में नए बस स्टैंड के पास हुडा विभाग द्वारा अधिग्रहित जमीन से जुड़ा है। कुरुक्षेत्र सेक्टर-7 निवासी दीदार सिंह की ओर से लगाए गए आरोपों के मुताबिक, लैंड एक्विजिशन डिपार्टमेंट पंचकूला में तैनात तत्कालीन नायब तहसीलदार शिवराज सिंह ने खुद को इंचार्ज लैंड एक्विजिशन ऑफिसर के तौर पर प्रदर्शित करते हुए 5 जनवरी 2022 और 21 फरवरी 2022 को दो ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ जारी किए।
आरोप है कि इन प्रमाणपत्रों को जारी करने के समय संबंधित जमीन को लेकर सरकार पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर चुकी थी। बताया गया है कि 1 अक्टूबर 2008 को सरकार ने इस जमीन को रिलीज करने से इनकार कर दिया था। ऐसे में बाद में जारी किए गए प्रमाणपत्रों को लेकर अधिकार और प्रक्रिया पर सवाल उठे।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि संबंधित तारीखों पर शिवराज सिंह न तो नियमित लैंड एक्विजिशन ऑफिसर थे और न ही उन्हें पंचकूला के लैंड एक्विजिशन ऑफिसर का चार्ज सौंपा गया था।
राज्य सरकार के अनुसार शिवराज सिंह उस समय लैंड एक्विजिशन से जुड़े नायब तहसीलदार के पद पर तैनात थे। सरकार का पक्ष था कि ऐसी स्थिति में उनके द्वारा जारी किए गए दोनों ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ उनकी अधिकारिक क्षमता से बाहर थे।
मामले में कानूनगो कर्मबीर सिंह की भूमिका भी जांच के दायरे में है। दोनों अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने संबंधित प्रक्रिया में अपनी निर्धारित अधिकारिता से बाहर जाकर प्रमाणपत्र जारी किए।
अधिकारियों की ओर से आरोपों से इनकार
मामले में दोनों अधिकारियों की ओर से आरोपों का विरोध किया गया। बचाव पक्ष की ओर से कहा गया कि संबंधित तारीखों पर शिवराज सिंह को आवश्यक अधिकार प्राप्त थे और उन्होंने कानूनगो कर्मबीर सिंह के साथ मिलकर प्रमाणपत्र जारी किए थे।
बचाव पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि अपीलकर्ता की संबंधित जमीनों में रुचि थी और इसी कारण अधिकारियों को मामले में निशाना बनाया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को बरकरार नहीं रखा।

हाईकोर्ट ने नवंबर 2025 में दी थी अग्रिम जमानत
इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 17 नवंबर 2025 को दोनों मामलों में तत्कालीन नायब तहसीलदार शिवराज सिंह और कानूनगो कर्मबीर सिंह को अग्रिम जमानत दी थी। इसके खिलाफ दीदार सिंह की ओर से सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अपील दायर की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दोनों आदेशों को रद्द करते हुए दोनों अधिकारियों की अग्रिम जमानत समाप्त कर दी।
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की जांच के दौरान जांच एजेंसी को तथ्यों की पड़ताल करनी होगी। इसमें यह पता लगाना भी शामिल है कि संबंधित जमीन के लिए ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ वास्तव में सही प्रक्रिया के तहत जारी किए गए थे या नहीं और प्रमाणपत्र जारी करने के लिए उस समय कौन अधिकारी कानूनी रूप से अधिकृत था।
सरकार ने अधिकारियों के आचरण पर जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों के समक्ष लगातार यह रुख रखा कि तत्कालीन नायब तहसीलदार शिवराज सिंह और कानूनगो कर्मबीर सिंह का आचरण प्रथम दृष्टया उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर और नियमों के विपरीत था।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के इस रुख को मामले के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना और कहा कि मौजूदा तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए संबंधित अधिकारियों के आचरण की जांच आवश्यक है।

अब आगे क्या होगा?
अग्रिम जमानत रद्द होने के बाद दोनों अधिकारियों के खिलाफ चल रही जांच महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। जांच एजेंसी अब ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ जारी किए जाने की पूरी प्रक्रिया, संबंधित जमीन की स्थिति, अधिकारियों की वास्तविक अधिकारिता और प्रमाणपत्र जारी करने के पीछे की परिस्थितियों की जांच कर सकती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत रद्द किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि दोनों अधिकारी दोषी साबित हो गए हैं। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

शिवराज सिंह को सरकार दे चुकी है समयपूर्व सेवानिवृत्ति
विवादों में घिरे तत्कालीन नायब तहसीलदार शिवराज सिंह को हरियाणा सरकार 5 अगस्त 2026 को समयपूर्व सेवानिवृत्ति दे चुकी है। उस समय वे रोहतक में तैनात बताए गए थे।
वहीं, कानूनगो कर्मबीर सिंह फिलहाल हिसार में तैनात हैं। कर्मबीर कानूनगो कैथल में 5 लाख रिश्वत लेते पिछले साल विजिलेंस ने गिरफ्तार किया था, अब बहाल होकर हिसार में लगा हुआ है।  सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोनों की अग्रिम जमानत रद्द किए जाने के बाद अब जांच एजेंसी के सामने आगे की कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।
मुख्य सवाल अब यही है कि संबंधित जमीन के लिए ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ जारी करने का अधिकार वास्तव में किस अधिकारी के पास था और वर्ष 2022 में जारी किए गए दोनों प्रमाणपत्र किस अधिकार और प्रक्रिया के तहत जारी किए गए थे।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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