June 21, 2026 2:00 pm

June 21, 2026 2:00 pm

काश ये दरवाज़ा खुल जाए,

काश ये दरवाज़ा खुल जाए,
और वक़्त पीछे लौट आए।
जो छूट गए, जो खो गए,
वे सब आकर हमें थाम जाएँ।
ईंटों में कैद हैं हँसी के स्वर,
आँगन में अब भी साँसें ठहरी हैं।
दरवाज़े बंद नहीं होते कभी,
वे यादों में चुपचाप खुलते रहते हैं।
हर दस्तक एक नाम बन जाती है,
हर खामोशी एक आलिंगन।
कुछ घर नहीं ढहते उम्र के साथ,
वे बस स्मृतियों में बस जाते हैं।
-डॉ. सत्यवान सौरभ

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

बाबूगिरी हिंदी

virender chahal

Our Visitor

3 4 9 0 6 3
Total Users : 349063
Total views : 576339

शहर चुनें