सिटी ब्यूटीफुल की बदहाल सड़कों पर जिम्मेदार विभागों की अनदेखी, करीब एक साल से हादसे को न्योता दे रहा गड्ढा
सवाल—बोर्ड लगाने के बाद काम पूरा कराने की जिम्मेदारी किसकी? टूटे बोर्ड और खुले गड्ढों की निगरानी पर भी उठे सवाल
रमेश गोयत
चंडीगढ़, 26 सितम्बर। सिटी ब्यूटीफुल चंडीगढ़ की सड़कों की बदहाली अब सिर्फ परेशानी का कारण नहीं, बल्कि जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रही है। सड़क पर गड्ढा हो, सड़क टूट जाए या किसी हिस्से में मरम्मत की जरूरत हो, कई जगहों पर तत्काल ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ का साइन बोर्ड लगाकर इतिश्री कर दी जाती है। इसके बाद सड़क कब ठीक होगी, काम कब पूरा होगा और लगाए गए बोर्ड की निगरानी कौन करेगा—इन सवालों का जवाब जमीन पर दिखाई नहीं देता।
सेक्टर-47 के पास मोहाली की ओर जाने वाली मुख्य सड़क पर सामने आया एक मामला इस पूरी व्यवस्था की तस्वीर साफ कर रहा है। बताया जा रहा है कि करीब एक साल पहले सड़क पर बने गड्ढे के आसपास ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ का बोर्ड लगाया गया था। समय बीतता गया, वाहन गुजरते रहे और सड़क की हालत खराब होती रही। अब स्थिति यह है कि जिस बोर्ड के जरिए वाहन चालकों को सावधान किया जाना था, वही बोर्ड टूटकर सड़क किनारे पड़ा है, जबकि जिस गड्ढे को बंद करने के लिए काम शुरू होने का संकेत दिया गया था, वह आज भी मौजूद है।
बोर्ड ने भी छोड़ दिया जवाब, गड्ढा अब भी कायम
मौके की तस्वीरें सड़क व्यवस्था की हकीकत सामने रखती हैं। सड़क किनारे लगा चेतावनी बोर्ड टूट चुका है और उसका उद्देश्य ही समाप्त हो गया है। दूसरी ओर सड़क पर बना गड्ढा वाहन चालकों के लिए लगातार परेशानी का कारण बना हुआ है।
लगातार वाहनों की आवाजाही, मौसम और बारिश के असर से सड़क की स्थिति और बिगड़ने की आशंका रहती है। दिन के समय तो वाहन चालक किसी तरह गड्ढे को देखकर बच निकलते हैं, लेकिन रात के समय पर्याप्त रोशनी या स्पष्ट संकेत नहीं होने पर स्थिति अधिक जोखिमपूर्ण हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि करीब एक साल पहले सड़क की समस्या विभाग की जानकारी में थी और वहां ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ का बोर्ड लगाया गया था, तो अब तक स्थायी मरम्मत क्यों नहीं हुई?
‘वर्क इन प्रोग्रेस’ बोर्ड बना व्यवस्था का स्थायी हिस्सा?
चंडीगढ़ की सड़कों पर निर्माण और मरम्मत कार्यों के दौरान ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ जैसे बोर्ड लगाना आम बात है। ऐसे बोर्डों का उद्देश्य वाहन चालकों और पैदल राहगीरों को निर्माण या क्षतिग्रस्त सड़क के बारे में सचेत करना होता है। लेकिन जब यही बोर्ड लंबे समय तक लगे रहें और वास्तविक काम आगे न बढ़े तो उनका उद्देश्य सवालों के घेरे में आ जाता है।
कई स्थानों पर लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि बोर्ड लगाने के बाद उसकी निगरानी और संबंधित कार्य की समयसीमा तय होती है या नहीं? यदि किसी सड़क की मरम्मत का काम लंबित है तो उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी या एजेंसी की है और कितने समय में समस्या का समाधान किया जाना है?
बोर्ड टूट गया, लेकिन किसी की नजर नहीं पड़ी
सेक्टर-47 के पास का मामला निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि सड़क पर लगाया गया चेतावनी बोर्ड टूटकर सड़क किनारे पड़ा रहा और गड्ढा भी लंबे समय तक उसी स्थिति में बना रहा, तो नियमित निरीक्षण की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
एक साल के दौरान सड़क से संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों या संबंधित एजेंसी की टीम ने इस स्थान का निरीक्षण किया या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। यदि निरीक्षण हुआ तो टूटे बोर्ड और सड़क की खराब स्थिति पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि निरीक्षण नहीं हुआ तो मुख्य सड़क की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
मुख्य सड़क होने के कारण बढ़ा जोखिम
सेक्टर-47 के पास मोहाली की ओर जाने वाली मुख्य सड़क पर दिनभर बड़ी संख्या में वाहनों की आवाजाही रहती है। कारों और दोपहिया वाहनों के साथ ऑटो तथा अन्य वाहन भी यहां से गुजरते हैं। ऐसे में सड़क पर बना गड्ढा अचानक वाहन की दिशा बदलने की स्थिति पैदा कर सकता है।
विशेष रूप से दोपहिया वाहन चालकों के लिए सड़क के गड्ढे अधिक परेशानी पैदा कर सकते हैं। रात के समय दृश्यता कम होने तथा बारिश के दौरान गड्ढे में पानी भरने की स्थिति में उसकी गहराई का अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो सकता है।
बारिश के बाद और बिगड़ सकती है सड़क की हालत
सड़क पर मौजूद गड्ढे को समय रहते नहीं भरा गया तो बारिश और लगातार यातायात के कारण उसके आसपास का हिस्सा भी प्रभावित हो सकता है। गड्ढे के किनारों का टूटना शुरू होने पर समस्या छोटी मरम्मत से बढ़कर सड़क के बड़े हिस्से की मरम्मत तक पहुंच सकती है।
यही वजह है कि सड़क पर गड्ढा बनने के बाद सिर्फ चेतावनी बोर्ड लगाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। बोर्ड वाहन चालकों को सावधान कर सकता है, लेकिन स्थायी समाधान सड़क की मरम्मत से ही संभव है।
शहर में लगे ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ बोर्डों का हो हिसाब
शहरवासियों की मांग है कि संबंधित विभाग केवल इस एक स्थान की समस्या का समाधान करने तक सीमित न रहें, बल्कि शहरभर में लगे ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ बोर्डों की भी समीक्षा करें।
यह देखा जाना चाहिए कि—
कितने स्थानों पर बोर्ड लगाए गए हैं।
वहां वास्तविक काम शुरू हुआ या नहीं।
काम की निर्धारित समयसीमा क्या है।
कितने काम पूरे हो चुके हैं।
कितने स्थानों पर अभी भी सड़क या अन्य समस्या कायम है।
टूटे अथवा पुराने बोर्डों को हटाने की जिम्मेदारी किसकी है।
लंबे समय से लंबित कार्यों की निगरानी कौन कर रहा है।
यदि इस प्रकार का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड मौजूद है तो उसे नियमित रूप से अद्यतन करने और मौके पर निरीक्षण की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।
सवाल सिर्फ एक गड्ढे का नहीं
सेक्टर-47 के पास सड़क का यह गड्ढा सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि उस कार्यप्रणाली पर सवाल है जिसमें ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ का बोर्ड तो नजर आता है, लेकिन काम की प्रगति नजर नहीं आती।
करीब एक साल में चेतावनी बोर्ड टूट गया, सड़क की समस्या बनी रही और वाहन चालक उसी रास्ते से गुजरते रहे। अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर गड्ढे की स्थायी मरम्मत करवाए, टूटे बोर्ड को हटाए और आवश्यकतानुसार स्पष्ट चेतावनी संकेत लगाए।
साथ ही शहर में लंबे समय से लगे ऐसे सभी बोर्डों की समीक्षा होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ वास्तव में काम की प्रगति का संकेत है या फिर अधूरे कामों को ढकने वाला एक स्थायी बोर्ड।












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