— डॉ. प्रियंका सौरभ
समाज की वास्तविक प्रगति केवल ऊँची इमारतों, आधुनिक तकनीक या आर्थिक उपलब्धियों से नहीं आँकी जा सकती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने नागरिकों—विशेषकर महिलाओं—को किस दृष्टि से देखता है। यदि किसी समाज में स्त्री को केवल उसके रूप, देह या पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाए, तो वह समाज अधूरी दृष्टि का परिचय देता है। स्त्री को संपूर्णता में देखने की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है।
इतिहास से लेकर वर्तमान तक महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का परिचय दिया है। विज्ञान, शिक्षा, अंतरिक्ष, राजनीति, साहित्य, खेल और उद्यमिता—हर क्षेत्र में महिलाओं ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। अंतरिक्ष में जाने वाली महिलाएँ केवल व्यक्तिगत सफलता का प्रतीक नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत होती हैं। वे यह साबित करती हैं कि अवसर मिलने पर स्त्री किसी भी सीमा को पार कर सकती है। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि उनकी उपलब्धियों की अपेक्षा उनके बाहरी स्वरूप पर अधिक चर्चा होती है।
समाज में स्त्री की भूमिका को अक्सर सीमित नजरिए से देखा गया है। “मैथमेटिक्स पढ़ाती महिलाओं” का उदाहरण इस बात को स्पष्ट करता है कि जिन क्षेत्रों को लंबे समय तक पुरुष-प्रधान माना गया, वहाँ भी महिलाएँ अपनी दक्षता साबित कर चुकी हैं। आज हजारों महिला शिक्षिकाएँ विद्यार्थियों को न केवल ज्ञान देती हैं, बल्कि उनमें तर्कशीलता, आत्मविश्वास और अनुशासन का विकास भी करती हैं। फिर भी उनके योगदान को अक्सर सामान्य मानकर अनदेखा कर दिया जाता है।
इसी प्रकार घर और परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाने वाली महिलाओं का श्रम भी लंबे समय तक अदृश्य बना रहा है। बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल, घर का संचालन और कई बार आर्थिक सहयोग—ये सभी कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन इन्हें ‘कर्तव्य’ कहकर सामान्य बना दिया जाता है। यदि यही कार्य किसी पेशे के रूप में किया जाए, तो उसका मूल्यांकन होता है, पर घर के भीतर किए गए श्रम को वह मान्यता नहीं मिलती जिसकी वह हकदार है। यह सोच बदलना समय की आवश्यकता है।
आज के दौर में मीडिया और सोशल मीडिया ने स्त्री की छवि को और जटिल बना दिया है। विज्ञापनों, फिल्मों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर महिलाओं को अक्सर आकर्षण की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनकी योग्यता से अधिक उनके रूप-रंग, पहनावे और निजी जीवन पर चर्चा होती है। यह प्रवृत्ति केवल मनोरंजन जगत तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति, खेल और कॉर्पोरेट जगत में भी देखने को मिलती है। यह मानसिकता न केवल महिलाओं के साथ अन्याय करती है, बल्कि समाज की सोच को भी संकीर्ण बनाती है।
इस स्थिति को बदलने में शिक्षा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यदि बचपन से ही लड़कों और लड़कियों को समानता, सम्मान और संवेदनशीलता के मूल्य सिखाए जाएँ, तो समाज में सकारात्मक बदलाव संभव है। पाठ्यक्रमों में महिलाओं की उपलब्धियों को स्थान मिलना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी उन्हें प्रेरणा के रूप में देख सके। यह समझ विकसित करना जरूरी है कि स्त्री केवल एक संबंध नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है।
कार्यस्थलों पर भी समानता और सम्मान की आवश्यकता है। महिलाओं को उनकी योग्यता और कार्यकुशलता के आधार पर अवसर और पहचान मिलनी चाहिए। समान वेतन, सुरक्षित वातावरण और निर्णय लेने में भागीदारी—ये केवल नीतियाँ नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज की बुनियाद हैं। जब महिलाएँ बिना भेदभाव के कार्य कर सकेंगी, तभी समाज अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच पाएगा।
परिवार भी इस बदलाव का महत्वपूर्ण आधार है। यदि बेटियों को भी वही स्वतंत्रता, शिक्षा और अवसर दिए जाएँ जो बेटों को मिलते हैं, तो असमानता की जड़ें कमजोर पड़ेंगी। साथ ही बेटों को यह सिखाना भी उतना ही आवश्यक है कि सम्मान, साझेदारी और संवेदनशीलता ही मजबूत समाज की नींव हैं।
स्त्री का सम्मान केवल औपचारिक अवसरों तक सीमित नहीं होना चाहिए। महिला दिवस पर शुभकामनाएँ देना पर्याप्त नहीं, यदि दैनिक जीवन में भेदभाव बना रहे। वास्तविक सम्मान का अर्थ है—उसकी बात सुनना, उसके निर्णयों का आदर करना और उसके अस्तित्व को स्वीकार करना। यह बदलाव सोच, व्यवहार और व्यवस्था—तीनों स्तरों पर होना चाहिए।
समय आ गया है कि हम स्त्री को देह से आगे देखें—एक विचार के रूप में, एक सृजनशील शक्ति के रूप में, एक संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में और एक सक्षम नेतृत्वकर्ता के रूप में। जब समाज इस व्यापक दृष्टि को अपनाएगा, तभी वास्तविक समानता और प्रगति संभव होगी। स्त्री को सम्मान देना केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक परिपक्व और विकसित सभ्यता की पहचान है।












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