May 23, 2026 8:54 pm

May 23, 2026 8:54 pm

पेट्रोल बचत का ज्ञान, सरकारी गाड़ियों में खानदान

डॉ. प्रियंका सौरभ
देश में जब भी पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ती हैं, तब अचानक सरकारों, अधिकारियों और नेताओं को “ईंधन बचत” की चिंता सताने लगती है। टीवी चैनलों पर संदेश चलने लगते हैं, अखबारों में विज्ञापन छपते हैं और मंचों से जनता को समझाया जाता है कि अनावश्यक वाहन प्रयोग बंद करें, कार पूलिंग अपनाएँ, कम दूरी पैदल तय करें और राष्ट्रहित में ईंधन की बचत करें। सुनने में यह सब बहुत आदर्शवादी और जिम्मेदार लगता है, लेकिन जैसे ही आम आदमी सड़क पर उतरता है, उसे इस आदर्शवाद का दूसरा चेहरा दिखाई देने लगता है।
एक तरफ आम नागरिक पेट्रोल पंप पर हर बढ़े हुए रुपये का हिसाब लगाता है, दूसरी तरफ सरकारी गाड़ियों का काफिला सत्ता के रुतबे की तरह सड़कों पर दौड़ता दिखाई देता है। जनता को बचत का पाठ पढ़ाने वाले वही लोग अक्सर अपने परिवार की छोटी-छोटी निजी जरूरतों के लिए भी सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल करते देखे जाते हैं। बच्चों को स्कूल छोड़ना हो, पत्नी को बाजार जाना हो, रिश्तेदारों को लाना-ले जाना हो या निजी कार्यक्रम में शामिल होना हो—सरकारी वाहन हर समय सेवा में तैयार रहते हैं। तब जनता के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आखिर ईंधन बचाने का बोझ केवल आम आदमी के हिस्से में ही क्यों आता है?

वास्तव में यह समस्या केवल पेट्रोल या डीज़ल की नहीं है, बल्कि मानसिकता की है। हमारे यहाँ सत्ता और पद को अक्सर सेवा नहीं, विशेषाधिकार समझ लिया जाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति बड़े पद पर पहुँचता है, उसके आसपास सुविधाओं का ऐसा घेरा बन जाता है जिसमें सरकारी संसाधनों को निजी जीवन का हिस्सा मान लिया जाता है। सरकारी गाड़ी फिर केवल प्रशासनिक कार्य का माध्यम नहीं रहती, बल्कि प्रतिष्ठा और प्रभाव का प्रतीक बन जाती है। यही कारण है कि कई बार सरकारी वाहन कार्यालय से अधिक परिवार की सुविधाओं के लिए दौड़ते दिखाई देते हैं।

विडंबना देखिए कि जिस देश में करोड़ों लोग रोज़ाना महँगे पेट्रोल के कारण अपनी यात्राएँ सीमित कर रहे हैं, वहाँ जनता के टैक्स से चलने वाली गाड़ियों का निजी उपयोग सामान्य बात मान ली जाती है। आम आदमी अपने बच्चे की फीस भरने और पेट्रोल डलवाने के बीच संतुलन बैठाता है, जबकि सत्ता के गलियारों में सरकारी ईंधन पर पारिवारिक आराम चलता रहता है। यही दृश्य जनता के भीतर असंतोष पैदा करता है, क्योंकि त्याग का उपदेश वही दे रहा होता है जो स्वयं त्याग करने को तैयार नहीं दिखता।

इतिहास गवाह है कि समाज केवल भाषणों से नहीं बदलता, उदाहरणों से बदलता है। यदि नेता और अधिकारी वास्तव में ईंधन बचत को लेकर गंभीर हैं, तो सबसे पहले उन्हें स्वयं अपने घर से शुरुआत करनी चाहिए। यदि सरकारी गाड़ियाँ केवल सरकारी कार्यों तक सीमित हो जाएँ, यदि बच्चों के स्कूल आने-जाने और शॉपिंग जैसी निजी गतिविधियों में उनका प्रयोग बंद हो जाए, तो यह किसी बड़े अभियान से अधिक प्रभावशाली संदेश होगा। जनता वही अपनाती है जो वह अपने नेतृत्व में देखती है।

आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि सत्ता और जनता के बीच नैतिक दूरी बढ़ती जा रही है। जब जनता देखती है कि उसे सादगी और बचत का पाठ पढ़ाने वाले लोग स्वयं विलासिता और विशेषाधिकार में जी रहे हैं, तब उसका विश्वास कमजोर होता है। लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं चलता, बल्कि नैतिक विश्वसनीयता से भी चलता है। यदि शासन करने वाले लोग स्वयं नियमों का पालन न करें, तो जनता से अनुशासन की अपेक्षा करना केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।

यह भी सच है कि हर अधिकारी और नेता ऐसा नहीं करता। अनेक लोग ईमानदारी और सादगी से अपना दायित्व निभाते हैं। कई अधिकारी निजी जीवन में सरकारी सुविधाओं का दुरुपयोग नहीं करते और नियमों का पालन करते हैं। लेकिन समस्या यह है कि कुछ लोगों की आदतें पूरी व्यवस्था की छवि खराब कर देती हैं। जनता को वही दिखता है जो सड़क पर दिखाई देता है—लालबत्ती वाली गाड़ियों का रौब, लंबा काफिला और निजी कामों में सरकारी संसाधनों का खुला उपयोग।

सबसे दुखद बात यह है कि सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग को कई बार समाज भी “स्टेटस” मानने लगता है। यदि किसी अधिकारी की पत्नी सरकारी गाड़ी से बाजार जाती दिखाई दे, तो कुछ लोग उसे रुतबे का प्रतीक समझते हैं। यही मानसिकता धीरे-धीरे व्यवस्था को भीतर से खोखला करती है। सरकारी सुविधा सेवा का साधन होनी चाहिए, शान का प्रदर्शन नहीं।

आज पर्यावरण संकट और ऊर्जा संकट दोनों हमारे सामने हैं। दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है। भारत जैसे विशाल देश में ईंधन की बचत केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आवश्यकता भी है। लेकिन कोई भी अभियान तभी सफल होगा जब उसमें समान भागीदारी दिखाई देगी। यदि जनता से कहा जाए कि वह अपनी बाइक कम चलाए, जबकि सत्ता वर्ग निजी कार्यों में सरकारी गाड़ियों का प्रयोग जारी रखे, तो यह संदेश खोखला ही लगेगा।

सरकारी वाहनों के उपयोग को लेकर कठोर और पारदर्शी व्यवस्था बननी चाहिए। हर विभाग में वाहन उपयोग का डिजिटल रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन-सी गाड़ी कब और किस कार्य के लिए गई। निजी उपयोग पाए जाने पर आर्थिक दंड और प्रशासनिक कार्रवाई दोनों होनी चाहिए। तकनीक के इस युग में यह कोई कठिन काम नहीं है। कठिन केवल इच्छाशक्ति है।

इसके साथ ही समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। केवल नेताओं और अधिकारियों की आलोचना कर देना पर्याप्त नहीं है। आम नागरिकों में भी दिखावे और अनावश्यक वाहन प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ी है। छोटी दूरी के लिए भी वाहन निकालना अब आदत बन चुका है। लेकिन नेतृत्व की जिम्मेदारी इसलिए अधिक होती है क्योंकि वही समाज की दिशा तय करता है। यदि ऊपर अनुशासन होगा तो उसका प्रभाव नीचे तक अवश्य पहुँचेगा।

दरअसल लोकतंत्र में सबसे बड़ा नैतिक बल उदाहरण का होता है। जब जनता देखती है कि कोई नेता सादगी से जीवन जी रहा है, अनावश्यक सुविधाओं से दूर है और सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग नहीं करता, तो उसके प्रति सम्मान स्वतः बढ़ जाता है। लेकिन जब वही नेता मंच से बचत की बात करे और उसके परिवार की रोजमर्रा की सुविधा सरकारी पेट्रोल पर चले, तब शब्दों की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है।

यह प्रश्न केवल ईंधन का नहीं, बल्कि टैक्स देने वाले नागरिक के सम्मान का भी है। जनता का पैसा जनता की सेवा के लिए है, किसी परिवार की निजी सुविधा के लिए नहीं। लोकतंत्र में सरकारी गाड़ी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती, बल्कि जनता की ओर से दी गई जिम्मेदारी होती है। जब यह जिम्मेदारी विशेषाधिकार में बदल जाती है, तब व्यवस्था और जनता के बीच विश्वास का संकट पैदा होता है।
आज आवश्यकता बड़े-बड़े नारों की नहीं, छोटे लेकिन ईमानदार कदमों की है। यदि नेता और अधिकारी सचमुच ईंधन बचत को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें अपने परिवारों के निजी उपयोग के लिए सरकारी गाड़ियों का प्रयोग बंद करना चाहिए। इससे न केवल ईंधन की बचत होगी, बल्कि जनता के बीच यह संदेश भी जाएगा कि त्याग केवल आम आदमी के लिए नहीं, सत्ता के लिए भी आवश्यक है।

देश को भाषण देने वाले नहीं, उदाहरण प्रस्तुत करने वाले नेतृत्व की आवश्यकता है। क्योंकि जनता अब केवल सुनना नहीं चाहती, देखना चाहती है। और जब तक सरकारी पेट्रोल पर “खानदान” चलता रहेगा, तब तक “ईंधन बचाओ” का हर अभियान जनता को केवल एक दिखावा ही प्रतीत होगा।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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