June 13, 2026 1:10 pm

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CHANDIGARH: सहकारिता विभाग में बाबूगिरी का खेल! इंस्पेक्टर कर रहे क्लर्क का काम, अपनी ही फाइलों पर खुद बन बैठे जांचकर्ता

सहकारिता विभाग में अजब व्यवस्था: इंस्पेक्टर कर रहे बाबूगिरी, अपनी ही फाइलों की शिकायतों का खुद कर रहे निपटारा

रमेश गोयत
चंडीगढ़,12 जून। यूटी चंडीगढ़ के सहकारिता विभाग में जारी नए कार्य वितरण आदेशों ने विभागीय कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग में जिन अधिकारियों को निरीक्षण, जांच और नियामक कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने चाहिए, वे अब अपनी ही फाइलों की बाबूगिरी करते नजर आ रहे हैं। इतना ही नहीं, कई मामलों में अधिकारियों को उन्हीं शिकायतों और विवादों को निपटाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है, जिनसे संबंधित फाइलों पर वे पहले से काम करते रहे हैं।
विभाग के हालिया आदेशों के अनुसार विभिन्न हाउस बिल्डिंग सोसाइटियों, शिकायतों, जीबीएम, चुनाव, एनओसी, कोर्ट केस और अन्य मामलों की फाइलें संबंधित इंस्पेक्टरों और कर्मचारियों के बीच बांटी गई हैं। हैरानी की बात यह है कि शिकायतों की जांच और फाइलों के निस्तारण का जिम्मा भी उन्हीं अधिकारियों के पास है जो संबंधित मामलों को पहले से देख रहे हैं। ऐसे में निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इंस्पेक्टर का काम निरीक्षण या बाबूगिरी?

यूटी चंडीगढ़ के सहकारिता विभाग द्वारा हाल ही में जारी किए गए कार्य वितरण आदेश ने विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग में किए गए नए कार्य बंटवारे के अनुसार कई इंस्पेक्टरों और अधिकारियों को न केवल सोसाइटियों से संबंधित फाइलों का रखरखाव, नोटिंग और पत्राचार सौंपा गया है, बल्कि उन्हीं मामलों से जुड़ी शिकायतों, विवादों और कानूनी प्रक्रियाओं के निपटारे की जिम्मेदारी भी दे दी गई है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यह व्यवस्था भविष्य में हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) का बड़ा कारण बन सकती है।

सहकारिता विभाग का मूल उद्देश्य हाउस बिल्डिंग सोसाइटियों, क्रेडिट सोसाइटियों और अन्य सहकारी संस्थाओं की निगरानी करना, नियमों का पालन सुनिश्चित करवाना तथा शिकायतों का निष्पक्ष समाधान करना है। इसके लिए विभाग में इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है, जिनका मुख्य कार्य निरीक्षण, जांच और नियामकीय कार्रवाई करना होता है। लेकिन नए आदेशों को देखने पर तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।

आदेशों के अनुसार कई इंस्पेक्टरों को सोसाइटियों की फाइलों का पूरा प्रबंधन सौंप दिया गया है। इनमें शिकायतें, जनरल बॉडी मीटिंग (GBM), चुनाव, एनओसी, कोर्ट केस और अन्य प्रशासनिक कार्य शामिल हैं। यानी जो अधिकारी किसी सोसाइटी की फाइल को संभाल रहा है, वही उस फाइल से जुड़ी शिकायतों और विवादों की प्रक्रिया में भी शामिल रहेगा। यही बिंदु अब विवाद का कारण बन रहा है।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी विभाग में शिकायतों की जांच और फाइल संचालन की जिम्मेदारी अलग-अलग अधिकारियों के पास होना बेहतर माना जाता है। ऐसा इसलिए ताकि शिकायतकर्ता को निष्पक्ष सुनवाई मिल सके और जांच प्रक्रिया पर किसी प्रकार का प्रभाव न पड़े। लेकिन यहां स्थिति उलट दिखाई दे रही है। यदि किसी सोसाइटी के सदस्य को विभागीय कार्यप्रणाली या किसी अधिकारी के निर्णय पर आपत्ति है तो उसकी शिकायत अंततः उसी सिस्टम के भीतर जाएगी, जहां संबंधित अधिकारी पहले से फाइल को देख रहा है।

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सहकारी समितियों से जुड़े कई लोगों का कहना है कि विभाग में पहले से ही शिकायतों के निपटारे में देरी और पारदर्शिता की कमी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब नई व्यवस्था से यह आशंका और बढ़ गई है कि शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा प्रभावित हो सकता है। लोगों का तर्क है कि जब किसी मामले में प्रारंभिक कार्रवाई, पत्राचार और फाइल प्रोसेसिंग एक ही अधिकारी कर रहा हो तो उसके खिलाफ आने वाली शिकायत की समीक्षा भी पूरी तरह निष्पक्ष दिखाई नहीं देगी।

सूत्रों का कहना है कि सहकारिता विभाग में इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी मूल रूप से सोसाइटियों के निरीक्षण, ऑडिट निगरानी, नियमों के पालन और जांच जैसी जिम्मेदारियों के लिए नियुक्त किए जाते हैं। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में उन्हें फाइलों की प्रोसेसिंग, पत्राचार, नोटिंग और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसे कार्य भी करने पड़ रहे हैं, जो सामान्यतः लिपिकीय स्टाफ के दायरे में आते हैं। इससे न केवल निरीक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है बल्कि विभाग की जवाबदेही भी कमजोर पड़ रही है।
सबसे बड़ा सवाल उन शिकायतों को लेकर उठ रहा है जिनमें संबंधित अधिकारी खुद ही फाइल तैयार कर रहे हैं और बाद में उन्हीं मामलों के निस्तारण की प्रक्रिया का हिस्सा भी बन रहे हैं। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच के लिए जांचकर्ता और फाइल प्रोसेस करने वाले अधिकारी अलग-अलग होने चाहिए, ताकि हितों के टकराव (Conflict of Interest) की स्थिति पैदा न हो।

शिकायतों का निपटारा भी वही, फाइल भी वही संभाल रहे

सहकारी समितियों से जुड़े कई सदस्यों का आरोप है कि वर्षों से लंबित शिकायतों और विवादों के समाधान में पहले ही देरी हो रही है। अब यदि शिकायतों के निस्तारण और जांच का दायित्व भी उन्हीं अधिकारियों के पास रहेगा जो संबंधित फाइलों से जुड़े रहे हैं, तो निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद और कमजोर हो सकती है।
विभाग के अंदर भी इस व्यवस्था को लेकर चर्चा है कि निरीक्षण और नियामक जिम्मेदारियों वाले अधिकारियों से बाबूगिरी करवाने के बजाय उनके मूल कार्यों पर ध्यान केंद्रित कराया जाना चाहिए। इससे सोसाइटियों में पारदर्शिता बढ़ेगी और शिकायतों के त्वरित निपटारे में भी मदद मिलेगी।

बड़ा सवाल यह है कि जब शिकायतों की फाइल तैयार करने वाला, उसकी नोटिंग करने वाला और निस्तारण प्रक्रिया में शामिल अधिकारी एक ही होगा, तो शिकायतकर्ता को निष्पक्ष न्याय कैसे मिलेगा? यही सवाल अब सहकारिता विभाग की नई कार्य प्रणाली पर उठने लगे हैं।

जानकारों का यह भी कहना है कि इंस्पेक्टरों से बाबू स्तर का कार्य करवाने से विभाग की मूल निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। जिन अधिकारियों को फील्ड में जाकर सोसाइटियों के कामकाज की जांच करनी चाहिए, वे कार्यालयों में बैठकर फाइलों की नोटिंग और पत्राचार में व्यस्त हो जाएंगे। इसका सीधा असर सोसाइटियों में होने वाली अनियमितताओं की निगरानी पर पड़ सकता है।

विभाग के भीतर भी इस आदेश को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। कर्मचारियों का मानना है कि यदि जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन किया जाता और शिकायत निवारण प्रणाली को अलग रखा जाता तो पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों मजबूत होतीं। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कई भूमिकाएं एक-दूसरे में घुलती हुई दिखाई दे रही हैं।

सोसायटी सदस्यों में बढ़ी चिंता
सहकारी समितियों से जुड़े कई सदस्यों का कहना है कि विभाग में पहले ही अनेक शिकायतें और विवाद वर्षों से लंबित हैं। ऐसे में यदि शिकायतों की जांच और फाइल संचालन का कार्य भी एक ही अधिकारी के पास रहेगा तो निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कई लोगों का मानना है कि इससे शिकायत निवारण प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच के लिए जांच अधिकारी और फाइल प्रोसेस करने वाले अधिकारी का अलग होना जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या कोई अधिकारी अपनी ही फाइलों से जुड़ी शिकायतों और विवादों के मामलों में पूरी तरह निष्पक्ष रह पाएगा? यदि शिकायतों की जांच और फाइल संचालन का काम अलग-अलग अधिकारियों को नहीं सौंपा जाता, तो विभाग की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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