बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
मोहाली, 14 जुलाई 2026। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, एस.ए.एस. नगर (मोहाली) ने उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी को शिकायतकर्ता की जमा राशि ब्याज सहित वापस करने तथा मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी के खर्च के लिए ₹50,000 मुआवजा देने के आदेश दिए हैं। आयोग का यह निर्णय वित्तीय संस्थाओं के लिए भी स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि उपभोक्ताओं की जमा पूंजी के साथ लापरवाही या अनुचित व्यवहार स्वीकार नहीं किया जाएगा।
आयोग द्वारा पारित आदेश के अनुसार संबंधित क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी को शिकायतकर्ता की ₹26,000, ₹29,380 और ₹12,00,000 की जमा राशि संबंधित तिथियों से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटानी होगी। आयोग ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर संपूर्ण भुगतान किया जाए।
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि सोसायटी निर्धारित 30 दिनों की अवधि के भीतर भुगतान करने में विफल रहती है, तो बकाया राशि पर वास्तविक भुगतान होने तक 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा। इस प्रावधान का उद्देश्य आदेश के समयबद्ध पालन को सुनिश्चित करना और उपभोक्ता के हितों की रक्षा करना है।
मानसिक पीड़ा और मुकदमेबाजी के लिए भी मिला मुआवजा
सिर्फ जमा राशि लौटाने का आदेश ही नहीं, बल्कि आयोग ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता को लंबे समय तक अपनी ही जमा राशि प्राप्त करने के लिए मानसिक तनाव, आर्थिक असुविधा और कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। इसे ध्यान में रखते हुए आयोग ने मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और मुकदमेबाजी के खर्च के लिए ₹50,000 का अतिरिक्त मुआवजा देने के आदेश भी दिए।
अधिवक्ता मेनका गुप्ता ने की प्रभावी पैरवी
इस मामले में शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता मेनका गुप्ता ने आयोग के समक्ष प्रभावी ढंग से पक्ष रखा। उन्होंने दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर यह साबित किया कि शिकायतकर्ता अपनी जमा राशि पाने का हकदार है और सोसायटी द्वारा भुगतान न करना सेवा में कमी (Deficiency in Service) की श्रेणी में आता है। आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।
उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन हजारों निवेशकों और जमाकर्ताओं के लिए राहत भरा संदेश है, जो विभिन्न क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटियों या वित्तीय संस्थाओं में अपनी मेहनत की कमाई जमा करते हैं। यदि किसी संस्था द्वारा भुगतान में अनावश्यक देरी की जाती है या उपभोक्ता के साथ अनुचित व्यवहार किया जाता है, तो प्रभावित व्यक्ति उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटा सकता है।
जवाबदेही तय करने की दिशा में अहम फैसला
उपभोक्ता अधिकारों के जानकारों के अनुसार आयोग का यह निर्णय न केवल शिकायतकर्ता को न्याय दिलाने वाला है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि वित्तीय संस्थाओं को अपने ग्राहकों के प्रति पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखनी होगी। आदेश का समय पर पालन नहीं करने की स्थिति में अधिक ब्याज का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि संस्थाएं न्यायिक आदेशों की अनदेखी न करें।
यह फैसला उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा, वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देने और सेवा में कमी बरतने वाली संस्थाओं के प्रति सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।










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