गरीब लहरों पे पहरे बिठाए जाते हैं
समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता
कभी कार्ल मार्क्स ने लिखा था कि धर्म से बड़ी अफीम नहीं है। नशा नहीं है। हमारे शासक लोग धर्म की मनचाही व्याख्या करते रहते हैं। इसका मनचाहे तरीके से सदुपयोग-दुरूपयोग करते हैं। मामला अयोध्या के राममंदिर से जुड़ा है। अयोध्या में राममंदिर के कर्मचारियों ने इस गीत के शब्दों-भाव को काफी गंभीरता से ले लिया.. मेरी झोपड़ी के भाग आज खुल जाएंगे..राम आएंगे। उन्होंने ये मान लिया कि जब हमारा प्रभु श्रीराम जी से डायरेक्ट वास्ता है और इनको अयोध्या में स्थापित करने वाले हम लोग हैं तो फिर हमारे पास इनसे जुड़े सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। हम इनके नाम पर-इनकी आड़ में कुछ भी करें। हमारी मर्जी। श्रीराम से जुड़े सभी कापीराइट हमारे पास हैं। इनका लाईसैंस हमारे पास है। ऐसा लगता है कि अयोध्या मंदिर में कार्यरत इन कर्मचारियों और मंदिर प्रबंधन में लगे कुछ लोगों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर चंदा-दान-चढावे पर पहले दिन से हाथ साफ करना शुरू कर दिया। सरकार ने इस चोरी-डकैती की जांच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है। अभी मामले की जांच चल रही है। जांच के शुरूआती रूझानों में साफ आया है मंदिर में आ रहे धन की गिनती का पुण्य कार्य पाने के लिए भारी भरकम सिफारिशें लगाई गई। मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों ने दूर से ही भांप लिया था कि इस बिजनैस माडल में काफी संभावनाएं हैं, लिहाजा उन्होंने अपने लोगों को यहां थोक के भाव फिट कर दिया। एसआईटी की जांच पूरी होने के बाद ही पता लगेगा कि ये स्कैंडल कितना बड़ा है। लेकिन ये तो अब साबित हो गया कि हमने तरक्की खूब ही की है। पहले हम मंदिरों से जूते-चप्पल चोरी कर खुश हो जाते थे और अब हालात ये है कि करोड़ों-अरबों रूपए डकार कर भी हमारा पेट नहीं भरता। सवाल है कि जो ईश्वर सर्वशक्तिशाली है, जो हम सबको देता है-जिसके दरवाजे पर हम सब नतमस्तक होते हैं तो उनको चढावा चढाने की जरूरत क्या है? जो सबको देने वाला है, उसको हम तुच्छ प्राणी क्या भेंट कर सकते हैं? हम जो भी,जितना भी भेंट करें, वो कम ही होगा। एक तरफ तो हम ये कहते हैं कि कण कण में भगवान हैं और दूसरी तरफ हम मूर्तियों के सामने हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। क्या हमें इस पर विचार नहीं करना चाहिए कि हमें धार्मिक प्रतिष्ठानों में चढावा चढाने की बजाय किसी जरूरतमंद की मदद करने पर ज्यादा फोकस करना चाहिए? उस पैसे से किसी गरीब को भोजन कराया जा सकता है। किसी बच्चे की स्कूल की फीस दी जा सकती है। किसी बीमार का इलाज करवाया जा सकता है। ये तो अयोध्या मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगे थे कि चोरी-डैकती पकड़ में आ गई। आप कल्पना कीजिए कि अगर यहां सीसीटीवी नहीं होते तो क्या ये सब पकड़ में आता? साथ ही ये भी विचारणीय है कि जिन धार्मिक प्रतिष्ठानों में सीसीटीवी नहीं लगे हैं, वहां अगर इस तरह की लूट हो रही होगी तो वो कैसे पकड़ में आएगी? हमारे बहुत से धार्मिक प्रष्ठिानों में इतना चढावा आता है-इतना धन,सोना, चांदी आता है कि इस से सैकड़ों स्कूल,कालेज,हस्पताल बनाए जा सकते हैं। अब समय आ गया है कि सरकारों को जरूर ये विचार करना चाहिए कि सभी धर्मो के प्रतिष्ठानों को होने वाली इस आय को जनकल्याण में किस तरह से खर्च किया जा सकता है? किस तरह से इस आय से नागरिकों का फायदा हो सकता है? धार्मिक आस्था से खिलवाड़ कर इस तरह की संगठित लूट पर अंकुश लगाने के लिए कठोर कानून भी बनना चाहिए। जिस तरह से बड़े बड़े उद्योगपति,नेता,खिलाड़ी,अधिकारी,एक्टर,डाक्टर इन धार्मिक प्रतिष्ठानों पर समय समय पर नतमस्तक होते हैं तो इस से गरीब लोगों को भी उनके ही तरह आचरण करने की प्रेरणा मिलती है। वो भी अपनी खून पसीने की कमाई में से कुछ हिस्सा दानपेटियों में इस आस में दे आते हैं कि शायद ऐसा उपक्रम करने से ही उनके भाग्य संवर जाएंगे।आस्था के इस कारोबार में कभी घाटा नहीं होता। हमारे यहां ईश्वर के नाम जो व्यापार होता है-जो धंधा होता है,और उस से जो मुनाफा होता है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमने ईश्वर को भी सरेआम बेच दिया है। वीआईपी दर्शनों के नाम अलग से मंदिरों में शुल्क लिया जाता है। जिसके पास चढावा चढाने के लिए कुछ नहीं है उसको तो मंदिर में भी दुत्कारा जाता है। जिसके पास पैसा है उसके लिए अलग से ईश्वर से मिलवाया जाता है। ऐसे लोगों के लिए स्पैशल मंदिर के कपाट खोल दिए जाते हैं। आप सोचिए कि क्या ईश्वर अपने भक्त्तों में गरीब-अमीर के आधार पर भेदभाव करते होगें? ये भेदभाव हम सब इंसानों की तरफ से किया गया है। इधर अयोध्या राम मंदिर में ये गदर मचा हुआ कि वहां के स्टाफ सोना चांदी पर आए दिन हाथ साफ कर रहे हैं। उधर हमारे हरियाणा में कुछ और ही कहानी चल रही है। झज्जर जिले के बेरी स्थित भीमेश्वरी देवी में कार्यरत कई लोगों को कई महीने से वेतन का संकट खड़ा हो गया है। ये वहीं लोग हैं जो सीधे आस्था के कारोबार से जुड़े हैं,लेकिन इन से अपना निजी संकट तक दूर नहीं हो रहा। वो अपना हक तक नहीं ले पा रहे। हमें ये मानना चाहिए कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं और कर्म से बड़ी कोई पूजा नहीं। समय से बड़ा कोई शिक्षक नहीं। इसके अलावा और जो कुछ है वो आडंबर है। पाखंड है। गीता में कहा गया है कि काम,क्रोध और लोभ पाप के द्वार हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हमें अपना काम प्रेम,करूणा,विनम्रता और भक्ति भाव से करना चाहिए। अंहकार और ईर्ष्या से दूर रहना चाहिए। ये हमारा दुर्भाग्य है कि हम में अधिकांश का पोरा पोरा ईर्ष्या,अहंकार और काम वासना मे लिप्त है। अयोध्या में ये डकैती बताती है कि हम इंसान अंदर से कितने खोखले हो चुके हैं। अगर हम भगवान के घर में ही ये जुल्म ढहा रहे हैं तो बाकि स्थानों पर क्या गदर नहीं मचा रहें होंगे? राम मंदिर में चंदे-चढावे को डकारने वाले लोगों की महिमा और पुरूषार्थ को नमन करते हुए कहा जा सकता है कि..
जो मेरे साथ मोहब्बत में हुई आदमी एक दफा सोचेगा
रात इस डर में गुजारी हम ने कोई देखेगा तो क्या सोचेगा
सरकारी योजना
ऐसा लगता है जमीनी समस्याओं और सरकारी योजनाओं-कल्पनाओं का बहुत दफा एक दूसरे से 36 का आंकड़ा रहता है। जैसे कि चंडीगढ प्रशासन वर्ष 2031 के लिए मास्टर प्लान ला रहा है। ड्राफ्ट प्लान के अनुसार प्रशासन सुखना झील के आसपास के कुछ इलाके में औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने की मंशा पाले हुए है। सुखना झील के आसपास का इलाका पर्यावरण के लिहाज से काफी संवेदनशील है। यहां पर काफी वन्य जीवन है। इस इलाके की साजों संभाल करने-इसे पलकों पर बिठाने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की ओर से कई दफा अपने फैसलों में कहा जा चुका है। हजारों किलोमीटर दूर से साइबेरिया पक्षी भी सुखना में प्रवास करने के लिए आते हैं। प्रशासन ने बहुत पहले आईटी सैक्टर के लिए जो जमीन का अधिग्रहण किया था उसका भी अभी पूरा उपयोग नहीं हो पाया है। उस पर जुल्म ये कि अब नए सिरे से सुखना झील एरिया के आसपास औद्योगिक इकाइयों को बसाने के लिए सुझाव मांगे जा रहे हैं। ऐसे में ये तलाशना निहायत ही मुश्किल है कि ऐसे गजब और उच्चकोटि के आइडिया प्रशासन के लोगों को कहां से आते हैं? बेहतर होगा कि प्रशासन के लोग चंडीगढ को ओर अधिक कंक्रीट का जंगल बनने से रोकने के लिए ठोस और दीर्घकालिक योजना बनाएं। इस पर विचार करें कि यहां किस तरह से हरियाली बढाई जा सकती है। प्रदूषण कैसे कम किया जा सकता है। ट्रेफिक जाम घटाने के लिए क्या किया जा सकता है। किस तरह से चंडीगढ की मोहाली में बने तथाकथित इंटरनैशल एयरपोर्ट से दूरी घटाई जा सकती है? किस तरह से इस एयरपोर्ट से अधिक इंटरनैशनल उड़ाने शुरू की जा सकती है। किस तरह से शहर में बेहतर स्वास्थ्य,खेल, पर्यटन और शिक्षा सुविधाएं बढाई जा सकती हैं? किस तरह से यहां के गावों को चकाचक किया जा सकता है? कैसे रेलवे स्टेशन और पंचकूला की तरफ कैनेक्टिविटी बेहतर की जा सकती है? इन सब मुददों पर ध्यान देने की बजाय यहां बहुत से लोग मटक मटक कर न जाने कौन सी गैर जरूरी उठा पटक में लगे रहते हैं। इस नाजुक मसले के जिम्मेदार लोगों की सोच को नमन करते हुए यही कहा जा सकता है
एक जगह इश्क करना तो दस्तूर है
हर जगह दिल लगाना बुरी बात है
सरकारी फैसला
पिछले दिनों हरियाणा सरकार ने एक नेक काम किया। वो ये कि मंत्रियों के स्टाफ में लगे बहुत से रिटायर्ड लोगों को हटा दिया। अब ये काम हुआ है तो फिर फूलप्रूफ तरीके से होना चाहिए था। इसमें भी पिक एंड चूज करने की जरूरत क्या थी? अभी भी कुछ स्थानों पर रिटायर्ड लोग सरकार की सेवा में जुटे हुए हैं। जनकल्याण में तनमन्यता से जुटे हुए हैं। कई विभागों,सचिवालय,बड़े लोगों के स्टाफ में ऐसे लोग हैं जो रिटायरमेंट के दस बरस बाद भी लगे हुए हैं। जमे हुए हैं। बहुत से मंत्रियों के निजी स्टाफ में उनके विभागों या दूसरे विभागों के लोग भी सेवाएं देने में लगे हुए हैं। उदाहरण के तौर पर शिक्षक को कायदे से तो स्कूल में पढाना चाहिए। हरियाणा में पहले ही शिक्षकों का टोटा है। लेकिन ऐसा भी हो रहा है कि शिक्षक राष्ट्र निर्माण का अपना मूल दायित्व छोड़ कर मंत्री के यहां सरकारी कागजों को इधर उधर करने के अदने से काम से प्रफुल्लित हुए जा रहे हैं। वो एक तरह से राष्ट्र के भविष्य से खिलवाड़ करने में जुटे हुए हैं। वो बच्चों के भविष्य का निर्माण करने,चरित्र निर्माण करने के अवसर गंवा रहे हैं। बेहतर होगा कि सरकार इस मामले में पक्षपात ना करें। तेरा मेरा ना करे। अपने पराये का खेल ना खेले। जो करे एक जैसा करे। सबके साथ इंसाफ करें।













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