June 29, 2026 2:36 pm

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क्या हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी साहित्यकारों की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही है?

(सम्मान की गरिमा, साहित्यिक गतिविधियों का ठहराव और व्यवस्था पर उठते प्रश्न)
— डॉ. सत्यवान सौरभ
साहित्य किसी राष्ट्र की आत्मा का सबसे निर्मल स्वर है और साहित्यकार उस स्वर के अनथक साधक। वे शब्दों में समय का इतिहास लिखते हैं, संवेदनाओं को संस्कृति का आकार देते हैं और समाज की चेतना को दिशा प्रदान करते हैं। उनकी लेखनी केवल रचना नहीं करती, बल्कि पीढ़ियों के विचारों का संस्कार भी करती है। इसलिए साहित्यकार का सम्मान किसी सरकारी कार्यक्रम की औपचारिकता नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक परिपक्वता और संवेदनशीलता का सार्वजनिक उद्घोष होता है।
इसी संदर्भ में हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की वर्तमान कार्यप्रणाली अनेक प्रश्नों के घेरे में दिखाई देती है। लंबे समय से प्रतीक्षारत साहित्यकारों को अंततः सम्मानित तो किया गया, किंतु जिस प्रकार यह प्रक्रिया संपन्न हुई, उसने प्रसन्नता से अधिक निराशा को जन्म दिया। अनेक सम्मानित साहित्यकारों से बातचीत के दौरान जो अनुभव सामने आए, वे केवल व्यक्तिगत असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं थे, बल्कि उस व्यवस्था की ओर संकेत कर रहे थे जहाँ संवेदना पर औपचारिकता और आत्मीयता पर प्रशासनिक प्रक्रिया भारी पड़ती दिखाई देती है।
सम्मान का मूल्य उसके साथ मिलने वाली राशि से नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित आदर से आँका जाता है। एक सम्मान-पत्र केवल कागज़ का दस्तावेज़ नहीं होता; वह समाज की ओर से किसी रचनाकार की वर्षों की साधना को दिया गया सार्वजनिक प्रणाम होता है। इसलिए उसके प्रत्येक शब्द, प्रत्येक हस्ताक्षर और प्रत्येक औपचारिकता का अपना सांकेतिक महत्व होता है।
सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ सम्मान-पत्रों ने अनेक साहित्यकारों को आश्चर्यचकित किया। उन पर किसी सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर दृष्टिगोचर नहीं हुए। केवल नाम और पदनाम मुद्रित कर देना प्रशासनिक आवश्यकता पूरी कर सकता है, परंतु सम्मान की आत्मीय गरिमा का स्थान नहीं ले सकता। हस्ताक्षर केवल स्याही की रेखाएँ नहीं होते, वे संस्था की स्वीकृति, उत्तरदायित्व और सम्मान-बोध के जीवंत प्रतीक होते हैं। जब वही अनुपस्थित हों, तो सम्मान की गरिमा कहीं अधूरी-सी प्रतीत होती है।
यदि इसके पीछे कोई प्रशासनिक अथवा विधिक कारण रहा हो, तो अकादमी का दायित्व था कि वह साहित्यकारों के समक्ष उसे स्पष्ट करती। संस्थाएँ केवल निर्णयों से नहीं, संवाद से भी विश्वास अर्जित करती हैं। संवाद का अभाव प्रायः अविश्वास को जन्म देता है और अविश्वास किसी भी सांस्कृतिक संस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती होता है।
हरियाणा का साहित्यिक समाज आज भी उन अवसरों को स्मरण करता है जब राज्यपाल भवन में गरिमामय वातावरण के बीच साहित्यकारों का सम्मान किया जाता था। वहाँ पुरस्कार केवल प्रदान नहीं किए जाते थे, बल्कि साहित्य की प्रतिष्ठा का उत्सव मनाया जाता था। मंच पर उपस्थित प्रत्येक साहित्यकार स्वयं को राज्य की सांस्कृतिक चेतना का सम्मानित प्रतिनिधि अनुभव करता था। आज भव्यता से अधिक आत्मीयता का अभाव महसूस होता है और यही पीड़ा साहित्यकारों के मन को उद्वेलित करती है।
चिंता केवल सम्मान समारोह तक सीमित नहीं है। पिछले चार वर्षों के दौरान अकादमी की साहित्यिक सक्रियता को लेकर भी अनेक प्रश्न उठे हैं। वर्ष 2023, 2024, 2025 और वर्तमान वर्ष 2026 तक न तो पुरस्कारों एवं सम्मानों की नियमित प्रक्रिया दिखाई दी, न पांडुलिपियों के आमंत्रण की निरंतरता बनी रही, न व्यापक साहित्यिक कार्यशालाएँ आयोजित हुईं, न युवा रचनाकारों के लिए योजनाबद्ध कार्यक्रम सामने आए और न ही प्रदेशव्यापी साहित्यिक संवाद का कोई सशक्त वातावरण निर्मित हो सका। यदि किसी साहित्य अकादमी के प्रांगण में रचनात्मक गतिविधियों का प्रवाह मंद पड़ जाए, तो स्वाभाविक है कि साहित्यिक समाज चिंता व्यक्त करेगा।
साहित्य अकादमी केवल पुरस्कार बाँटने वाली संस्था नहीं होती। उसका वास्तविक स्वरूप एक जीवंत सांस्कृतिक विश्वविद्यालय का होता है, जहाँ विचारों का आदान-प्रदान होता है, नई प्रतिभाएँ दिशा पाती हैं, वरिष्ठ रचनाकारों के अनुभव नई पीढ़ी तक पहुँचते हैं और भाषा-संस्कृति की निरंतर साधना होती है। यदि यह भूमिका सीमित हो जाए, तो संस्था की उपयोगिता स्वयं प्रश्नों के घेरे में आ जाती है।
एक और गंभीर प्रश्न साहित्यकारों की सहभागिता को लेकर भी उठता है। अनेक रचनाकारों का अनुभव है कि अकादमी की निर्णय-प्रक्रिया में सक्रिय साहित्यकारों की भागीदारी अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देती। किसी भी साहित्यिक संस्था की आत्मा उसके लेखक, कवि, आलोचक, शोधकर्ता और अनुवादक होते हैं। यदि वही निर्णयों से दूर अनुभव करने लगें, तो संस्था का साहित्यिक चरित्र धीरे-धीरे प्रशासनिक स्वरूप में सिमटने लगता है।
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि व्यवस्था के आत्ममंथन का विनम्र आग्रह है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की शक्ति आलोचना को स्वीकार करने और उससे सीखने में निहित होती है। यदि साहित्यकार प्रश्न उठा रहे हैं, तो उन्हें असहमति नहीं, बल्कि सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
आवश्यक है कि अकादमी पुरस्कारों एवं सम्मानों की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाए, सम्मान समारोहों की गरिमा पुनर्स्थापित करे, साहित्यकारों के साथ नियमित संवाद स्थापित करे और पूरे वर्ष की साहित्यिक गतिविधियों का सुविचारित कैलेंडर सार्वजनिक करे। प्रत्येक जिले में साहित्यिक कार्यशालाएँ, पुस्तक चर्चाएँ, युवा लेखक सम्मेलन, लोक-साहित्य महोत्सव, शोधपरक संगोष्ठियाँ और विद्यालय-महाविद्यालय स्तर पर साहित्यिक अभियान आयोजित किए जाएँ। यही किसी सशक्त साहित्य अकादमी की पहचान होती है।
साहित्यकार सम्मान का याचक नहीं होता। वह केवल अपने श्रम, अपनी साधना और अपनी सृजनशीलता के प्रति सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा करता है। उसका सबसे बड़ा पुरस्कार समाज का विश्वास और उसका सबसे बड़ा सम्मान उसकी गरिमा है। यदि वही आहत होने लगे, तो यह किसी एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि समूचे साहित्यिक समाज की वेदना बन जाती है।
हरियाणा की साहित्यिक परंपरा अत्यंत समृद्ध और गौरवशाली रही है। इस भूमि ने ऐसे अनेक साहित्यकार दिए हैं जिनकी लेखनी ने राष्ट्रीय साहित्य को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। ऐसी गौरवशाली परंपरा की साहित्यिक संस्था से अपेक्षा भी उसी स्तर की स्वाभाविक है। आवश्यकता है कि अकादमी प्रशासनिक औपचारिकताओं से ऊपर उठकर साहित्य की आत्मा को समझे, साहित्यकारों के सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दे और स्वयं को केवल एक कार्यालय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के सशक्त केंद्र के रूप में स्थापित करे।
आज आवश्यकता किसी विवाद को जन्म देने की नहीं, बल्कि विश्वास को पुनर्जीवित करने की है। सम्मान केवल प्रदान नहीं किया जाता, उसे अनुभव भी कराया जाता है। जब तक साहित्यकार स्वयं को सम्मानित अनुभव नहीं करेगा, तब तक सबसे भव्य आयोजन भी भीतर से रिक्त प्रतीत होंगे।

आशा है कि हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी इन प्रश्नों को सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार करेगी और आत्ममंथन के माध्यम से ऐसी कार्यसंस्कृति विकसित करेगी जिसमें साहित्यकार का स्वाभिमान, साहित्य की गरिमा और संस्कृति का सम्मान सर्वोच्च स्थान प्राप्त करे। क्योंकि अंततः किसी भी समाज का भविष्य उसकी आर्थिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना से निर्धारित होता है—और उस चेतना का सबसे उज्ज्वल दीप साहित्य ही है।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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