अपने सारे कर्त्तव्यों से मुझको रत्ती भर भी इंकार नहीं
पर..स्वाभिमान मेरा उड़ता पक्षी,बंधन मुझ को स्वीकार नहीं
सारे समझौते तब तक हैं,जब तक होती तकरार नहीं
बात स्वाभिमान पर आए जब,कोई समझौता स्वीकार नहीं
स्वाभिमान श्रेयस्कर होता है,पर यह होता अहंकार नहीं
सम्मान सदा देना चाहे, अपमानित होना स्वीकार नहीं
सारे बंधन काटंू जिस से इस से बढकर तलवार नहीं
स्वाभिमान मारकर जीना हो तो ऐसा जीवन स्वीकार नहीं
राजनीति में कामयाब होने की पहली अनिवार्य शर्त ये है कि इसमें आपको अपने स्वाभिमान का दमन करना होता है। अगर आप इस मौलिक योग्यता से महरूहम हैं तो फिर आपके कामयाब होने की संभावनाएं क्षीण बनी रहती है। आप देखिए कि अलग अलग राजनीतिक पार्टियों में काफी कुछ ऐसा होता रहता है जिस पर किसी भी स्वाभिमानी इंसान का खून खौल सकता है। मगर है कोई जो जरा भी चंू करता हो। जानते सब हैं, मगर इस नाजुक मसले पर बोलना खुद के लिए आफत आमंत्रित करने जैसा है। जैसे कि सत्तारूढ दल हरियाणा भाजपा की ही बात करें। यहां कदम कदम पर ऐसे विषय मिल जाएंगे जिस से ये साबित होता है कि कार्यकर्त्ताओं की ही नहीं, विधायकों, सांसदों मंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों तक की सरकार में पूछ नहीं हो रही। ऐसा पता सबको है, मगर बोलता कोई नहीं। गुरूग्राम के सांसद और केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीज के अंतरमन ने अचानक से उनको ललकारा। यंू तो उनको समय समय पर अपने अंदर से ये ललकार मिलती रहती है,लेकिन पहले वो इसे दमन कर लेते थे। दो दिन पहले उन्होंने अचानक से अहसास कराया कि वे नेता होने के साथ साथ मर्द भी हैं। उनकी इस अदा को सिलैक्टिव स्वाभिमान कह सकते है। ये किसी खास अवसर पर जागृत होता है और फिर कार्य संपन्न कर वापस पंूछ दाब लिया करता है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन मौजूदगी में राव इंद्रजीत दो दिन पहले प्रदेश सरकार पर हमलावर हो गए। उन्होंने मंच से साफ साफ कहा कि सरकार में उनकी और उन जैसों की सुनवाई नहीं हो रही। ये तो भला हो सोशल मीडिया कि उनका ये बयान उनके कहने से पहले ही दसों दिशाओं में वायरल हो गया। ज्यादातर अखबारों में इसका जिक्र नहीं था। ऐसे घटनाक्रम को होता देख हम अखबार वाले ऐसे ही हो जाते हैं जैसे बिल्ली को देखकर कबूतर अपनी आंख बंद कर लेता है। मतलब ये कि पूंछ दाबने में हमारा भी मुकाबला नहीं है। राव इंद्रजीत के कहे बाद कुछ अन्य नेताओं की नथनियों और धमनियों में रक्त प्रवाह ने जोर पकड़ा है। वो भी कुछ नेता होने की फीलिंग लेना चाह रहे हैं। वो भी किसी उपयुक्त अवसर पर ऐसे ही जौहर दिखाना चाह रहे हैं। मगर फिलहाल वो पार्टी अनुशासन के लबादे को ओढे हुए हैं। उनका कहना है सब को यहां एक उपयुक्त अवसर का इंतजार है जब वो अपनी सारी भड़ास निकालेंगे। अभी तो वो विवश है। लाचार है। इनका कहना है कि हमारा बाहर जो तामझाम दिखता है और जो हकीकत है, उसमें दिन रात का अंतर है। पब्लिक को हमारे बारे में बहुत गलतफहमी है। कुछ हमारा भी इस गलतफहमी को बढाने में योगदान रहता है। अब ऐसे कैसे हर किसी को को ये कह दें कि हमारी सरकार में हमारे पल्ले ही दाणे नहीं हैं। हमारे कहने से कोई काम नहीं होते। हमारे कहने से चपरासी तक का तबादला नहीं होता। बाहर वालों के सामने तो हमें अपना औरा-आभामंडल स्थापित करना पड़ता ही है। भले ही ये कृत्रिम होता है। भले ही इसमें कोई चमक दमक नहीं होती, लेकिन अपना अपमान किस किस को सुनाएं और किस किस को बताएं। श्री लाल शुक्ला जी ने कभी राग दरबारी में लिखा था कि अपनी बेइज्जती में अगर किसी दूसरे को भी शामिल कर लिया जाए तो ये आधी हो जाती है। अब हमारी विडंबना ये है कि हम इस नेक कार्य में किसी को शामिल करना भी चाहें तो वो पास नहीं फटकता। इसलिए ये विराट बोझ हमें खुद ही उठाना पड़ता है। मैंने भी इन सब पुण्य आत्माओं को दिलासा दिया कि बड़े होने पर इस तरह के दुख और दर्द तोहफे में साथ ही मिलते हैं। जो इनके साथ जीने की आदत डाल गया उसका जीवन संवर गया और जो इस हुनर को नहीं अपना पाया वो जीवन की दौड़ में पीछे छूट गया। इस मर्ज का यही उपाय है कि कभी कभी फंू फंूा कर लेनी चाहिए। जैसी राव इंद्रजीत ने की है। इस से जी हल्का हो जाता है। दूसरों को भी प्रेरणा मिल जाती है और खुद को ये अहसास होता रहता है कि अभी दीये में तेल बाकी है। बाकि आज का युग ऐसा है कि इसमें ज्यादा सी क्रांति की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। ऐसा सोचने से कई तरह की मानसिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं जो बाद में शारीरिक विकारों में परिवर्तित होकर आखिर में आर्थिक विकारों में परिवर्तित होकर थमते हैं। बड़े लोगों को न्यारे ही दुख होते हैं। किसी गरीब को रोजी रोटी का संकट है तो बड़े लोगों के ये गम है कि इनके लिए स्टेज पर उचित प्रोटोकाल की पालना नहीं की गई। इनको प्रोटोकाल के हिसाब से बिठाया नहीं गया। प्रोटोकाल के हिसाब से बुलवाया नहीं गया।

शायद इसी हालात पर वसीम बरेलवी ने कभी कहा होगा कि कि..
क्या दुख है समंदर को बता भी नहीं सकता
आंसू की तरह आंख तक आ भी नहीं सकता
तू छोड़ रहा है तो खता इस में तेरी क्या
हर शख्स मेरा साथ निभा भी नहीं सकता
प्यासे रह जाते हैं जमाने के सवालात
किस के लिए जिंदा हंू बता भी नहीं सकता
घर ढूंढ रहे हैं मेरी रातों के पुजारी
मैं हंू कि चरागों को बुझा भी नहीं सकता
वैसे तो इक आंसू ही बहा कर मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफान हिला भी नहीं सकता
पुलिस का डंडा
पिछले दिनों एक अजीब मामला हुआ। एक पागल आवारा कुत्ते ने कई लोगों को काट लिया। इसी कार्यक्रम को वो कुत्ता एक अन्य व्यक्ति पर भी आजमाने की फिराक में था कि उस व्यक्ति ने आत्मरक्षा में उस कुत्ते पर लटठ से प्रहार कर दिया। कुत्ता इस हमले के लिए तैयार नहीं था। जैसे ही उसकी लटठ से मुलाकात हुई कुत्ते के प्राण पखेरू उड़ गए। किसी ने सोशल मीडिया पर ये वीडियो प्रचारित और प्रसारित कर दिया। बात बढते बढते ऊपर तक पहुंच गई। दिल्ली में ऊपर की एक महिला इस सारे घटनाक्रम से क्रोधित हो गई। उस ने जिले के एसपी को फोन किया और एक्शन लेने को कहा। फोन सुन कर एसपी का कर्त्तव्य बोध जाग गया और उन्होंने उस कुत्ते की जान लेने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी। अब सवाल ये है कि क्या एसपी का ये काम जायज है? कानून की नजर में तो कतई नहीं। भारतीय न्याय संहिता बीएनएस और पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता-आईपीसी की धारा 100 के अनुसार गंभीर और जानलेवा परिस्थितियों में आत्मरक्षा के अधिकार में हमलावर की जान भी ली जा सकती है। इस कानून के मुताबिक गंभीर खतरे की आशंका, गंभीर चोट का डर, बलात्कार, तेजाब फेंकना, जबरन बंधक बनाने जैसी वारदात के प्रयास में सैल्फ डिफैंस के अधिकार के प्रयोग में किसी की जान भी ली जा सकती है। बेहतर होता कि एसपी साहब उन महिला नेता को ये समझाते कि इस तरह के मामलों में जो एक्शन लिया जाना था वो पहले ही उस व्यक्ति ने कुत्ते के खिलाफ ले लिया है। अगर ये खंूखार पागल कुत्ता उन महिला या उनके परिजन या परिचितों पर हमलावर होता तो क्या तब भी वो यंू ही एक्शन लिए जाने की वकालत करती? पुलिस वालों को ये वर्दी सिर्फ गरीब,निरीह,लाचार और बेचारे लोगों पर कानून का डंडा चलाने के लिए नहीं मिली है। उनका फर्ज है कि जब कभी ऊपर से कोई फोन आए तो वो इन ऊपर की कुर्सी वालों को खुश करने के लिए किसी की भी जान लेने पर ना तुल जाएं। उनका ये दायित्व है कि वो विनम्रता से बताएं कि इस मामलें में कानूनन क्या हो सकता है और क्या नहीं? अब जिस व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई,भले ही वो अदालत से बरी हो जाए, लेकिन पुलिस वालों की कायरता के चलते उसका तो बिना बात ही उत्पीड़न हो गया। सरकारी रिकार्ड और उस व्यक्ति के निजी रिकार्ड में तो ये सदा के लिए दर्ज हो गया कि उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है। सो पुलिस वालों को ये मुस्तैदी जहां दिखानी चाहिए, वहां दिखाएं। यंू बेकसूर लोगों को बलि का बकरा मत बनाएं। थोड़े थोड़े ही सही..कहीं तो..कभी तो वो भी दम दिखाएं। ये ऊपर के लोग और ऊपर के फोन बड़े जालिम होते हैं। अगर ऊपर से कभी किसी बेकसूर को जेल के अंदर देने का फोन आ जाए तो मुझे तो नहीं लगता कि हरियाणा में कोई एसपी ऐसा होगा कि जो इस आदेश को लागू करने में रत्ती भर भी कोताही करेगा। उनको अपना ये रवैया और ये व्यवस्था बदलने की जरूरत है। ऊपर वाला तो कह के निकल लेता है और फिर खामियाजा भुगतना पड़ता है नीचे वालों को। सो पुलिस वालों से यही कहना है कि थोड़ी सी रीढ की हडडी कायम रखें। ऊपर वाले ऊंची आयटम होते हैं। जब ये आपको बैठने की कहें तो आप पसर मत जाया करो।
इस हालात पर फरत अहसास ने कभी लिखा था कि..
कैसे इंसान हैं हम रीढ की हडडी के बगैर
लिए फिरती हैं हवाएं हमें मर्जी के बगैर
ठीक आता नहीं मुझ पर कोई दुनिया का लिबास
आसमान वाले मेरी नाप के दर्जी के बगैर
कोई हकीम दवा ही नहीं देता हम को
ऐ तबीब-ए मरज-ए जां तेरी पर्ची के बगैर
साहिल-ए-इश्क से आगे नहीं जाने का बदन
पार करना है ये दरिया तुम्हें किश्ती के बगैर
जुल्म तेरा इक तर्ज-ए-मोहब्बत भी तो था
खुश रहंू कैसे भला मैं तेरी सख्ती के बगैर















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