सेक्टर-16 में कर्मचारी के सरकारी मकान का किया दौरा,
टूटे दरवाजे और खुली बिजली की तारें देखकर जताई नाराजगी;
इंजीनियरिंग विंग के अधिकारियों को दी धरने पर बैठने की चेतावनी
रमेश गोयत
चंडीगढ़, 11 अक्तूबर। शहर में सरकारी कर्मचारियों को आवंटित मकानों की मरम्मत और रखरखाव को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर के कई सरकारी मकानों की दयनीय हालत और कर्मचारियों को पेश आ रही समस्याओं को लेकर नगर निगम के मेयर सौरभ जोशी ने नाराजगी जताई है। उन्होंने सरकारी मकानों के रखरखाव पर खर्च किए जा रहे करोड़ों रुपये के बजट की जांच कराने की मांग उठाते हुए सवाल किया कि आखिर यह पैसा कहां खर्च हो रहा है और कर्मचारियों को बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं मिल रही हैं।
रविवार को मेयर सौरभ जोशी ने सेक्टर-16 स्थित एक सरकारी मकान का दौरा किया। इस दौरान मकान की हालत देखकर उन्होंने संबंधित अधिकारियों के कामकाज पर सवाल उठाए। मकान में टूटे दरवाजे और बिजली की खुली तारें जैसी समस्याएं सामने आईं। इन हालात ने सरकारी आवासों के रखरखाव और मरम्मत व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कर्मचारी बोलने में असमर्थ, छोटे बेटे ने बताई मकान की समस्याएं
मेयर सौरभ जोशी जिस कर्मचारी के सरकारी मकान का निरीक्षण करने पहुंचे, वह कर्मचारी हाईकोर्ट में नौकरी करता है और बोलने में असमर्थ है। ऐसे में कर्मचारी के छोटे बेटे ने मेयर को मकान की समस्याओं से अवगत कराया।
मकान में टूटे दरवाजे और बिजली की खुली तारों जैसी समस्याओं को लेकर परिवार को हो रही परेशानियों का मामला सामने आने के बाद मेयर ने संबंधित विभाग की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई। सरकारी आवासों में रहने वाले कर्मचारियों को यदि मरम्मत जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी परेशानी उठानी पड़ रही है, तो यह व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।
सरकारी मकानों का रखरखाव संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। मकानों में दरवाजों, बिजली की तारों और अन्य जरूरी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं का समय पर समाधान होना चाहिए, ताकि कर्मचारियों और उनके परिवारों को सुरक्षित रहने का वातावरण मिल सके।
करोड़ों का बजट, फिर भी सरकारी मकानों की हालत खराब
मेयर सौरभ जोशी ने सरकारी मकानों की मरम्मत के लिए आवंटित बजट के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि कर्मचारियों के मकानों की हालत खराब है, तो इसकी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि मरम्मत के लिए निर्धारित राशि का लाभ शहर के सभी जरूरतमंद सरकारी मकानों को मिल रहा है या नहीं। उनका आरोप है कि मेंटेनेंस के लिए उपलब्ध करोड़ों रुपये का बजट शहर के चुनिंदा मकानों पर ही खर्च किया जा रहा है, जबकि दूसरे मकानों में रहने वाले कर्मचारियों की समस्याओं की सुनवाई नहीं हो रही।
इस मामले में अब यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि सरकारी मकानों की मरम्मत के लिए पिछले वर्षों में कितना बजट आवंटित किया गया, उसमें से कितनी राशि खर्च हुई और किन-किन मकानों में मरम्मत के कार्य करवाए गए। यदि मरम्मत के लिए राशि खर्च की गई है, तो संबंधित मकानों की मौजूदा स्थिति और किए गए कार्यों का भी सत्यापन होना चाहिए।
हालांकि, बजट के कथित असमान इस्तेमाल और चुनिंदा मकानों पर अधिक खर्च किए जाने के आरोपों की स्वतंत्र जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
मेंटेनेंस बजट की विजिलेस जांच की मांग
मेयर सौरभ जोशी ने सरकारी मकानों के रखरखाव पर खर्च किए जा रहे बजट की विजिलेंस से जांच कराने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि सरकारी मकानों की मरम्मत के नाम पर खर्च होने वाली राशि का पूरा हिसाब सामने आना चाहिए।
जांच के माध्यम से यह पता लगाया जाना चाहिए कि बजट का आवंटन किस आधार पर किया गया, मरम्मत के काम किन ठेकेदारों को दिए गए, काम की गुणवत्ता की निगरानी किसने की और संबंधित अधिकारियों ने कार्यों का निरीक्षण किया या नहीं।
इसके साथ ही यह भी जांच का विषय हो सकता है कि जिन मकानों में लंबे समय से मरम्मत की जरूरत है, वहां शिकायतों के बावजूद काम क्यों नहीं करवाया गया। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या वित्तीय अनियमितता सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय करते हुए नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

इंजीनियरिंग विंग के अधिकारियों को चेतावनी, बोले—मरम्मत नहीं हुई तो धरने पर बैठूंगा
सेक्टर-16 के सरकारी मकान का दौरा करने के बाद मेयर सौरभ जोशी ने इंजीनियरिंग विंग के वरिष्ठ अधिकारियों को चेतावनी दी कि यदि सरकारी मकानों की मरम्मत नहीं करवाई गई, तो वह धरने पर बैठेंगे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों की समस्याओं को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। जिन मकानों में मरम्मत की जरूरत है, वहां समयबद्ध तरीके से काम करवाया जाना चाहिए। उन्होंने लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर ऐसे अधिकारियों को निलंबित करवाने के लिए कदम उठाने पड़ेंगे।
मेयर की इस चेतावनी के बाद इंजीनियरिंग विंग की कार्यप्रणाली और सरकारी आवासों की मरम्मत व्यवस्था पर निगाहें टिक गई हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी इन समस्याओं को दूर करने के लिए क्या कदम उठाते हैं और मरम्मत कार्यों को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना तैयार की जाती है या नहीं।

सरकारी कर्मचारियों को राहत मिलेगी या मामला जांच तक सीमित रहेगा?
सरकारी मकानों की बदहाली का मुद्दा केवल टूटे दरवाजों और खुली बिजली की तारों तक सीमित नहीं है। यह सरकारी आवासों के रखरखाव, बजट के सही इस्तेमाल और अधिकारियों की जवाबदेही से भी जुड़ा है।
यदि मरम्मत के लिए बजट उपलब्ध होने के बावजूद मकानों की स्थिति खराब बनी हुई है, तो इसकी समीक्षा जरूरी है। साथ ही, कर्मचारियों की शिकायतों के निपटारे के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें शिकायत दर्ज होने के बाद उसकी स्थिति और समाधान की समयसीमा का पता चल सके।
सेक्टर-16 में मेयर के दौरे के दौरान सामने आई समस्याओं ने सरकारी मकानों की मरम्मत व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है। अब संबंधित विभाग से यह अपेक्षा होगी कि वह मकान की स्थिति का निरीक्षण कर आवश्यक मरम्मत करवाए और बजट के इस्तेमाल से जुड़े सवालों पर तथ्यात्मक जवाब दे।
फिलहाल, मेयर सौरभ जोशी ने सरकारी मकानों के मेंटेनेंस बजट की विजिलेंस और सीबीआई जांच की मांग करते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर वह पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। यदि मकानों की मरम्मत नहीं हुई, तो उन्होंने धरने पर बैठने की चेतावनी दी है।













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