October 28, 2026 12:47 pm

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आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

तेरी आंखों में हमने क्या देखा,कभी कातिल कभी खुदा देखा
गजब अंदाज तेरे चलने का, वक्त को भी रूका रूका देखा
ये उस समय का वक्त था..जब दसों दिशाओं में भजनलाल..भजनलाल की गंूज थी। तब भजनलाल हरियाणा के सीएम होते थे। प्रधानमंत्री होते थे नरसिम्हा राव। राजीव गांधी की हत्या के कारण नरसिम्हा राव की पीएम पद पर लाटरी लगी थी। ये वही नरसिम्हा राव थे जिन्हें 1991 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने टिकट देने लायक भी नहीं समझा था कि अब उनकी उम्र सक्रिय राजनीति के लायक नहीं रही। हालात बदले। राव पीएम तो बने,लेकिन सरकार को पूर्ण बहुमत नहीं था। भजनलाल ने अल्पमत वाली नरसिम्हा राव सरकार के लिए बहुमत का जुगाड़ करने का करिश्मा किया था। अपने इस अंदाज से भजनलाल ने खुद को न केवल फिर से राजनीति का पीएचडी साबित किया, बल्कि नरसिम्हाराव कोे भी लगभग अपना गुलाम सा बना लिया था। सारे देश में भजनलाल का सिक्का चल रहा था। ठीक उसी वक्त..ठीक उसी वक्त भजनलाल के हरियाणा में कुछ और ही चल रहा था। चंडीगढ स्थित हरियाणा सचिवालय की चौथी मंजिल पर तत्कालीन मुख्य सचिव हनुमानदास बंसल एक सरकारी मीटिंग में तत्लीनता से जुटे हुए थे। प्रदेश के विकास को दिशा देने में लगे हुए थे। तभी एक युवा विधायक का मुख्य सचिव कार्यालय पर प्रवेश होता है। चपरासी उनको ये कहते हुए रोकता है कि अंदर साहब मीटिंग में बिजी हैं,लेकिन ये युवा विधायक उन चपरासी को लगभग धकियाते हुए मुख्य सचिव आफिस में दाखिल हो जाते हैं। अचानक से ये सब होता देख बंसल चौंक उठते हैं और पूछते हैं कि आप को किसने अंदर आने दिया? ये युवा विधायक उनको अपना परिचय देते हुए कहते हैं..मैं करन सिंह दलाल हंू,पलवल से हरियाणा विकास पार्टी का एमएलए हु। अभी करन दलाल की बात पूरी नहीं हुई थी कि मुख्य सचिव के अंदर का अधिकारी जाग गया और उन्होंने विधायक को लगभग अपमानित करते हुए पूछा कि.. अगर आप एमएलए हैं, तो मैं क्या करूं? इतना सुनते हुए करन दलाल आपा खो बैठे। वो बाक्सिंग के नैशनल चैंपियन रह चुके थे। उनका अंदर का बाक्सर जागृत अवस्था में आ चुका था। वो मुख्य सचिव एचडी बंसल को कुर्सी से खींच कर सचिवालय की बालकानी में ले गए और उनको नीचे गिराने का प्रयास करने लगे। करन दलाल का ये अपराधिक कृत्य देख मीटिंग में शामिल लोगों को बीच बचाव के लिए मैदान में उतरना पड़ा। किसी तरह से मुख्य सचिव को करन दलाल की गिरफ्त से आजाद करवाया गया। इस वारदात ने मुख्य सचिव को झकझौर दिया। एक झटके में मुख्य सचिव की अफसरी की खुमारी जा चुकी थी। उनकी आवाज और मिजाज का कड़कपन गायब हो चुका था। चंद लम्हे के भीतर वो मोम से ज्यादा नरम हो चुके थे और आवाज शहद से मीठी हो चुकी थी। करन दलाल अपने विधानसभा क्षेत्र से जुड़े एक काम के लिए ही मुख्य सचिव के पास दाखिल हुए थे। बेहतर तो यही होता कि वो समय लेकर मुख्य सचिव के पास जाते,लेकिन पहली पहली दफा विधायक बने करन दलाल का खून गर्म था और वो ऐसा मानते थे कि उनके पास किसी से भी किसी वक्त,किसी भी अवस्था में मिलने का लाईसैंस हैं। इस मामले की मुख्यमंत्री भजनलाल से हरियाणा की अफसरशाही ने शिकायत की। भजनलाल ने हविपा सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल से विधानसभा में मुखातिब होते हुए कहा कि आप को अपने विधायक को समझाना चाहिए-काबू में रखना चाहिए कि वो मुख्य सचिव को सचिवालय में उनके आफिस से नीचे फेंकने की बात करते हैं। लोकतंत्र में इस तरह का आचरण स्वीकार्य नहीं है। पांच दफा के विधायक और मंत्री रहे करन दलाल आज स्वीकार करते हैं कि तब उनको इस तरह का बर्ताव नहीं करना चाहिए था। वो कहते हैं कि पहली पहली दफा एमएलए बनने का कुछ अलग ही जोश था। तब जमाना भी कुछ अलग था। जहां भी जाते थे दरवाजे को ठोकर मार कर अंदर घुसते थे। कायदे कानून नियम किस चिड़िया का नाम है,मालूम ही नहीं था। कौन क्या है, इसका पता नहीं था। खुद को ही सर्वज्ञाता होने का वहम था। वो कहते हैं कि अनुभव से ये समझ में आया कि किसी भी काम के लिए एमएलए को इस हद तक जाने की जरूरत ही नहीं है। एक एमएलए चाहे तो अफसर और कर्मचारी का कई तरह से कई तरीके से इलाज कर सकता है। एमएलए भले ही विपक्ष का हो,लेकिन उसके पास इस तरह के अधिकार व शक्तियां होती हैं कि वो नियमों के दायरे में रहकर काफी कुछ कर सकता है। करवा सकता है। बाद में करन दलाल इतने परिष्कृत हो गए कि उनको अफसरों के साथ ऊंची आवाज में बात करने की कम ही आवश्यकता पड़ी। इस की बजाय उन्होंने सरकारी नियमों-कायदे-कानून के सहारे ही अफसरों के साथ पेश आने-काम लेने की तरजीह दी। उनका ये नुस्खा काफी कारगर साबित हुआ। आज हम इसी नाजुक मुददे पर बात कर रहे हैं कि जनप्रतिनिधियों का अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ किस तरह का सबंध होना चाहिए। किस तरह का बर्ताव होना चाहिए।

करन दलाल के इस अंदाज पर कहा जा सकता है कि..
गुजरती है जो दिल पर वो कहानी याद रखता हूं
मैं हर गुल-रंग चेहरे को जुबानी याद रखता हूं
मैं अक्सर खो सा जाता हंू गली कूचों के जंगल में
मगर फिर भी तेरे घर की निशानी याद रखता हूं
मुझे अच्छे बुरे से कोई निस्बत है तो इतनी है
मैं हर ना-मेहरबां की मेहरबानी याद रखता हूं
कभी जो जिंदगी की बे-सबाती याद आती है
तो सब कुछ भूल जाता हंू जवानी याद रखता हूं
मुझे मालूम है कैसे बदल जाती है तारीखें
इसी खातिर तो मैं बातें पुरानी याद रखता हूं

कार्तिकेय की मीटिंग
ताजा किस्सा ये है कि राज्यसभा के निर्दलीय सांसद कार्तिकेय शर्मा अंबाला में जिला विकास समन्वय और निगरानी समिति-दिशा की मीटिंग ले रहे थे। विदेश से पढे और बड़े सियासी-बिजनैस खानदान से ताल्लुक रखने वाले कार्तिकेय ने इस मीटिंग में लट्ठमार भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने सधे, शिक्षित, संतुलित,व्यवस्थित अंदाज में अपनी बात कही। जहां जहां चूक थी, वहां सबंधित अधिकारियों को फटकार भी लगाई। मसलन पिछले दो बरस से लंबित स्ट्रीट लाइट के मुददे पर उन्होंने नगर निगम आयुक्त से टू द प्वाइंट पूछा कि स्वीकृत छह हजार लाइटों में से अब तक कितनी लगी हैं,कितनी खराब हैं और कितनी लगनी शेष हैं? उन्होंने सांसद निधि से एम्बुलैंस खरीदने के लिए जारी की गई राशि का उपयोग न होने पर भी जवाबतलबी की। अंबाला से कांग्रेसी सांसद वरूण चौधरी ने भी शालीनता से बात की। वरूण के पिता फूलचंद मुलाना पुराने कांग्रेसी हैं और हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष व कई दफा के मंत्री रहे हैं। इन दोनों सांसदों ने अफसरों के साथ इस मीटिंग में आपा नहीं खोया। प्वांइट दर प्वाइंट जवाब तलबी की और अफसरों को दो टूक कह दिया कि जनहित की योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जो भी इस में कोताही करेगा, उसके खिलाफ एक्शन लिया जाएगा। इस मीटिंग का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल है। इसमें लोग कार्तिकेय के अंदाज की जम कर सराहना कर रहे हैं। दरअसल अपने यहां बहुत से अधिकारी जनप्रतिनिधियों को एव्वें ही समझने की गलती कर लेते हैं। अंबाला में पहले दिशा की मीटिंग ऐसी भी होती रही है कि जब इसमें चुटकलेबाजी,किस्सेबाजी और खुद का ही महिमामंडन होता रहता था। अब यहां माहौल बदला हुआ है। अब यहां सिर्फ और सिर्फ काम की बात होती है। एजेंडा पर बिंदुवार बात होती है। जवाबतलबी होती है। जिस गंभीरता से इस तरह से ऐसी मीटिंग होनी चाहिए,उसी तरह से होती है। कई अधिकारी इस गलतफहमी में रहते हैं कि सांसदों-विधायकों के पल्ले क्या है? हमारे सामने इनकी हैसियत ही क्या है? वो हम अफसरों का क्या ही बिगाड़ लेंगे? ऐस वहम पालने वालों एक दफा इस अंबाला दिशा मीटिंग में शामिल अफसरों से अवश्य हालात ए हाजरा पर राय मशविरा कर लेना चाहिए। उनको आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी। उनको ये पता चल जाएगा कि कौन,क्या है और लोकतंत्र में असली बोस कौन है? कहने का आशय महज इतना सा है कि बिना बात ही ईगो का बोझ ठाए ठाए नहीं फिरना चाहिए। सिस्टम में हर किसी की अपनी भूमिका है। अगर अधिकारी महत्वपूर्ण हैं, तो सांसद और विधायक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। एक दूसरे को नीचा दिखा कर या अपमानित कर के या खुद को बड़ा और सामने वाले को छोटा मानने के नजरिए का त्याग कर देना चाहिए। इस सब से सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी का होता है। जनता का होता है। जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक सिस्टम एक दूसरे का पूरक होते हैं। एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी या प्रतिद्वंदी नहीं। समझदार अधिकारी इन जनप्रतिनिधियों से कभी सींग नहीं उलझाते। वो इन से बिगाड़ने की बजाय, बनाने में विश्वास करते हैं। यही फार्मूला जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होता है। वो अफसरों पर धौंस जमाने की बजाय अपनेपन से मनमाफिक परिणाम लाने को तव्वजो देते हैं।

कार्तिकेय शर्मा के अंदाज पर कहा जा सकता है कि..
मैं लोगों से मुलाकातों के लम्हें याद रखता हंू
मैं बातें भूल भी जाऊं तो लहजे याद रखता हंू
सर-ए-महफिल निगाहें मुझ पे जिन लोगों की पड़ती हैं
निगाहों के हवाले से वो चेहरे याद रखता हंू
जरा सा हट के चलता हंू जमाने की रवायत से
जो सहारा देते हैं वो कंधे याद रखता हंू
दोस्ती जिस से की है उसे निभाऊंगा जी जान से
मैं दोस्ती के हवाले से रिश्ते याद रखता हंू

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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