डॉ. विजय गर्ग
आज का बचपन एक अजीब दोहरी दुनिया में रह रहा है। एक तरफ वास्तविकता की मिट्टी की खुशबू, दूसरी ओर कल्पना की चमकदार स्क्रीन। घर के अंगण के खेल अब मोबाइल के खेलों में बदल गए हैं, कहानी की किताबों को एनिमेटेड वीडियो द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है। परिणाम यह है कि बचपन वास्तविक दुनिया और काल्पनिक दुनिया के बीच उलझा हुआ है।
कल्पना बच्चे के विकास के लिए आवश्यक है। यह उसकी रचनात्मकता को बढ़ावा देता है, उसे सपने देखने का साहस प्रदान करता है। परी कथाएं, लोक कथाएँ और हास्य पात्र बच्चे के मन को विस्तार देते हैं। लेकिन जब कल्पना वास्तविकता से अधिक हावी हो जाती है, तो समस्या शुरू होती है। बच्चे रील और रियल के बीच अंतर समझने में असमर्थ रहते हैं।
डिजिटल मीडिया ने बच्चों के लिए एक ऐसी दुनिया तैयार कर दी है जहां सब कुछ तुरंत मिलता है। त्वरित मनोरंजन, तत्काल सफलता और तत्काल मान्यता। इस काल्पनिक दुनिया में नायक हमेशा जीतता है, कठिनाइयां केवल कुछ ही मिनटों में खत्म हो जाती हैं। जब बच्चा वास्तविक जीवन में संघर्ष का सामना करता है, तो वह निराशा और हताशा महसूस करता है। उसे लगता है कि जीवन भी फिल्मों की तरह आसान होना चाहिए।
वास्तविकता बच्चे को धैर्य, संघर्ष और सहनशीलता सिखाती है। मिट्टी में खेलना, दोस्तों के साथ झगड़ा करके फिर मनाना, हारने पर भी दोबारा कोशिश करना। ये सभी अनुभव जीवन के सच्चे पाठ हैं। यदि बचपन केवल कल्पना पर आधारित होगा, तो वह वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं होगा।
माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका यहां बहुत महत्वपूर्ण है। उन्हें बच्चों को कल्पना की उड़ान भी देनी चाहिए और वास्तविकता के साथ जमीन से जुड़ना चाहिए। किताबें पढ़ने की आदत, प्रकृति से संपर्क, खेल में हिस्सा लेना और पारिवारिक बातचीत ये सभी तरीके बचपन को संतुलित बनाते हैं।
बचपन की दुनिया हमेशा से ही कहानियों, परियों और जादुई किस्सों से भरी रही है। लेकिन आज के डिजिटल युग ने बच्चों की कल्पना को एक नया लेकिन बहुत जटिल मोड़ दे दिया है। जहां पहले बच्चे दादी-नानी की कहानियां सुनकर अपने मन में एक काल्पनिक दुनिया बनाते थे, वहीं आजकल बच्चे वीडियो गेम और सोशल मीडिया के माध्यम से बनाई गई कल्पना में रह रहे हैं। कल्पना का प्रभाव बच्चों के लिए कल्पना केवल खेल नहीं है, बल्कि सीखने का एक माध्यम है। जब कोई बच्चा किसी सुपरहीरो की तरह व्यवहार करता है, तो वह वास्तव में साहस और शक्ति की अवधारणा को समझने की कोशिश कर रहा होता है। हालांकि, जब यह कल्पना “आभासी वास्तविकता” का रूप ले लेती है, तो बच्चा वास्तविक दुनिया के रिश्तों और भावनाओं से दूर होने लगता है। वास्तविकता से टकराव आज के बच्चों को कभी-कभी वास्तविकता को स्वीकार करने में कठिनाई होती है। इसके मुख्य कारण हैं: डिजिटल दुनिया: मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चमकीले रंग और तुरंत मिलने वाली खुशी (वास्तविक जीवन की धीमी गति को उबाऊ बना देती है) सामाजिक दूरी: बच्चे मैदान में खेलने के बजाय वीडियो गेम में दोस्त बनाना अधिक पसंद करते हैं, जिससे उनका सामाजिक विकास प्रभावित होता है। संतुलन की आवश्यकता यह कहना गलत होगा कि कल्पना बुरी है। कल्पना ही रचनात्मकता की जननी है। लेकिन चुनौती यह है कि बच्चों को समझाया जाए कि स्क्रीन की दुनिया और जमीनी वास्तविकता में अंतर है। माता-पिता को अपने बच्चों को प्रकृति से जोड़ने, उन्हें किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करने और उनके साथ बातचीत करने की आवश्यकता है ताकि वे अपने मन की उलझन को सुलझा सकें। निष्कर्ष: बचपन का असली आनंद कल्पना की उड़ानों में है, लेकिन इन उड़ानों की जड़ें वास्तविकता की धरती पर होना बहुत जरूरी है।
अंततः, कल्पना और वास्तविकता दोनों ही बचपन के आवश्यक अंग हैं। कल्पना सपने देती है, वास्तविकता उन्हें साकार करने का मार्ग दिखाती है। यदि हम बच्चों को यह संतुलन सिखाते हैं, तो वे न केवल अच्छे सपने देखेंगे, बल्कि उन्हें सच बनाने की क्षमता भी रखेंगे।
डॉ. विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट पंजाब











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