August 28, 2026 9:12 am

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गुजरात के अहमदाबाद स्थित लोथल की ऐतिहासिक यात्रा; हड़प्पाकालीन वैभव का अद्भुत साक्षी — Lothal

रमेश गोयत
अहमदाबाद/ लोथल, (गुजरात): इतिहास की धरोहरों को करीब से जानने और समझने की इच्छा मुझे गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थित प्राचीन स्थल लोथल तक ले गई। यह स्थान न केवल भारत बल्कि विश्व इतिहास में भी विशेष महत्व रखता है। लोथल सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख बंदरगाह नगर था, जो लगभग 2500 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच विकसित हुआ।

1955-62 में हुआ ऐतिहासिक उत्खनन
लोथल के प्राचीन टीले का वैज्ञानिक उत्खनन वर्ष 1955 से 1962 के बीच प्रसिद्ध पुरातत्वविद् S. R. Rao के नेतृत्व में कराया गया। इस उत्खनन में हड़प्पाकालीन नगर के सुव्यवस्थित वास्तु अवशेष प्रकाश में आए, जिन्होंने उस काल की उन्नत नगर योजना और समुद्री व्यापार प्रणाली को उजागर किया।

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दुर्ग और नगर क्षेत्र में विभाजित था शहर
लोथल का आवासीय क्षेत्र मुख्यतः दो भागों में बंटा हुआ था—
1. दुर्ग क्षेत्र
यहाँ समाज के अभिजात वर्ग के लोग निवास करते थे। उनके घर लगभग 3 मीटर ऊँचे चबूतरों पर बने थे।
पक्की ईंटों से बने स्नानागार
ढकी हुई नालियों की व्यवस्था
स्वच्छ जल के लिए कुएं
बाढ़ से सुरक्षा हेतु 3 मीटर मोटी मिट्टी की ईंटों की प्राचीर
यह व्यवस्था दर्शाती है कि उस समय नगर नियोजन अत्यंत उन्नत और वैज्ञानिक था।
2. नगर क्षेत्र
नगर क्षेत्र को भी दो भागों में विभाजित किया गया था—
वाणिज्य क्षेत्र (जहाँ कामगार एवं व्यापारी रहते थे)
आवासीय क्षेत्र

विश्व का प्राचीनतम सुव्यवस्थित बंदरगाह
लोथल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका विशाल जलाशयनुमा बंदरगाह है।
आकार: लगभग 214 x 36 मीटर
पक्की ईंटों से वैज्ञानिक ढंग से निर्मित
जल प्रवाह और दबाव को सहने योग्य संरचना
वर्षभर जल के संचय की अनोखी व्यवस्था
इतिहासकारों के अनुसार यह विश्व के प्राचीनतम ज्ञात डॉकयार्ड (बंदरगाह) में से एक है। यह दर्शाता है कि उस समय समुद्री व्यापार अत्यंत विकसित था।

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विशाल मालगोदाम
दुर्ग के दक्षिण-पश्चिमी किनारे पर स्थित मालगोदाम भी विशेष आकर्षण का केंद्र है।
ऊँचाई: 3.5 मीटर ऊँचा चबूतरा
माप: 49 x 40 मीटर
64 घनाकार मिट्टी के स्तंभों का आधार
संभवतः लकड़ी की छत से ढका हुआ
यहाँ जहाजों से उतारे गए माल को सुरक्षित रखा जाता था, जिससे लोथल के व्यापारिक महत्व का पता चलता है।

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उत्खनन में मिली बहुमूल्य वस्तुएँ
लोथल से प्राप्त अवशेष उस काल की समृद्ध संस्कृति और व्यापारिक संबंधों को प्रमाणित करते हैं—
कीमती पत्थरों के मनके
मुद्राएँ एवं मुद्रांकन
शंख, हाथीदांत और तांबे की वस्तुएँ
पशु एवं मानव आकृतियाँ
बाट (तौल प्रणाली)
शवाधान स्थल

धार्मिक उपयोग की सामग्री
विशेष रूप से फारस की खाड़ी क्षेत्र की मुद्राएँ और मृणमूर्तियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि लोथल का पश्चिम एशिया से सक्रिय व्यापारिक संबंध था।
व्यापार का प्रमुख केंद्र
लोथल की समृद्धि का आधार समुद्री व्यापार था। यहाँ से—
कीमती पत्थरों के मनके
तांबा
हाथीदांत
शंख उत्पाद

कपास से निर्मित वस्त्र
पश्चिम एशिया तक निर्यात किए जाते थे। यह उस समय के भारत की आर्थिक शक्ति और तकनीकी दक्षता का परिचायक है।

इतिहास से साक्षात्कार का अनुभव
लोथल की यात्रा मेरे लिए केवल एक पर्यटन अनुभव नहीं बल्कि इतिहास से प्रत्यक्ष साक्षात्कार था। हजारों वर्ष पूर्व की सभ्यता के अवशेषों को देख यह एहसास होता है कि हमारे पूर्वज कितने उन्नत, वैज्ञानिक सोच वाले और व्यापार में पारंगत थे।
आज भी लोथल भारत की प्राचीन समुद्री शक्ति और नगर नियोजन की अद्भुत मिसाल के रूप में खड़ा है। यह स्थल न केवल पुरातत्व प्रेमियों बल्कि हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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