135 भारतीयों की सुरक्षित वापसी, 29 की मौत की पुष्टि; लापता लोगों की तलाश जारी
चंडीगढ़, 2 मार्च। दीपेन्द्र सिंह हुड्डा द्वारा रूस-यूक्रेन युद्ध क्षेत्र में फंसे भारतीय युवाओं की सुरक्षित वतन वापसी का मुद्दा उठाने के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने विस्तृत जानकारी साझा की है।
विदेश मंत्री ने पत्र के माध्यम से बताया कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक 214 भारतीय नागरिकों के रूसी सेना में शामिल होने की खबर है। इनमें से 135 भारतीयों को रूसी सेना के साथ किए गए अनुबंध से मुक्त कराकर सुरक्षित भारत वापस लाने में सरकार ने सफलता हासिल की है।
29 भारतीयों की मौत, 14 लापता
विदेश मंत्री ने स्वीकार किया कि युद्ध के दौरान 29 भारतीय नागरिकों की मृत्यु की सूचना है। मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास मृतकों और घायलों के परिजनों को मुआवज़ा दावे दाखिल करने में सहायता कर रहा है। इसके अलावा 14 लापता भारतीयों का पता लगाने के प्रयास जारी हैं, जबकि 36 अन्य लोगों के स्टेटस अपडेट के लिए रूसी अधिकारियों से लगातार संपर्क साधा जा रहा है।
विदेश मंत्रालय द्वारा डीएनए रिपोर्ट साझा कर परिवारों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है।
नौकरी के नाम पर गुमराह किए गए भारतीय
विदेश मंत्री ने माना कि कई भारतीय नागरिकों को विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर गुमराह किया गया। कुछ मामलों में जेल में सज़ा काट रहे भारतीयों ने सज़ा माफी के सरकारी आदेश का लाभ लेने के लिए रूसी सेना जॉइन की। वहीं कुछ लोग अधिक साइनिंग अमाउंट, वेतन और नागरिकता के लालच में आ गए।
सरकार ने एडवाइजरी जारी कर भारतीय नागरिकों से अपील की है कि वे रूसी सेना में भर्ती के किसी भी प्रस्ताव से सावधान रहें और विदेश में रोजगार तलाशते समय पूरी जांच-पड़ताल करें।
संसद में उठाया था मामला
दीपेन्द्र हुड्डा ने 5 फरवरी को लोकसभा में नियम 377 के तहत यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा कि अनेक युवा छात्र-वीजा पर रूस गए थे, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें बहला-फुसलाकर या धोखे से सेना में भर्ती कर युद्ध क्षेत्र में भेज दिया गया।
हुड्डा ने कहा कि बढ़ती बेरोजगारी के कारण युवा विदेश जाने को मजबूर हुए। कई युवाओं ने बिचौलियों को लाखों रुपये देकर ‘डंकी रूट’ से विदेश का रास्ता अपनाया, जिसके लिए उन्होंने अपना घर-बार तक बेच दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं की इस दुर्दशा के लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है और यदि देश में पर्याप्त रोजगार उपलब्ध होते तो उन्हें विदेश जाने की मजबूरी नहीं होती।
दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि वे संसद, विदेश मंत्रालय और विदेश मामलों की संसदीय समिति में लगातार इस विषय को उठाते रहे हैं और भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।











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