April 6, 2026 8:24 am

April 6, 2026 8:24 am

आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

मैन्ने शेर की मां कहया करेंगे हिंदुस्तान मैं,
सौ सौ पड़े मुसीबत बेटा मर्द जवान मैं
पंजाब में आप को कई गाड़ियंो के शीशे के पीछे भगत सिंह की फोटो के साथ ये लाइन अक्सर पढने को मिली होगी.. लगदा ए फेर आणा पैणा या लगता है कि फिर आना पड़ेगा। भगत सिंह की फोटो को गाड़ियंो पर लगाने वाले बहुत से इन युवाअंो को उनकी कुर्बानियंो, उनकी शख्सियत-व्यक्तित्व के बारे में ज्यादा सी जानकारी नहीं होती। वो ऐसा सा सोचते भर हैं कि कोई ऐसा सा शख्स है कि अगर वो जिंदा होता तो सरकार का सारा सिस्टम एक झटके में दुरूस्त कर देता। आप ने ये भी अक्सर सुना होगा कि भगत सिंह दूसरे के परिवार में ही शोभा देता है। अपने परिवार में भगत सिंह नहीं होना चाहिए। इसका भाव ये है कि भगत सिंह जैसा साहसी,क्रांतिकारी और निडर इंसान अपने यहां होने से परिवार वाले डरते हैं। ऐसा क्यंो सोचा और कहा जाता है..आज ये जानने समझने की कोशिश करते हैं। अभी इसी 23 मार्च को भगत सिंह का शहादत दिवस भी था। 28 सितंबर,1907 को बंगा,मौजूदा पाकिस्तान में जन्मे भगत सिंह के बारे में जितना कहा जाए, उतना ही कम है। उनके पिता सरदार किशन सिंह संधू और चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह ने भी आजादी की लड़ाई में भरपूर योगदान दिया था। उनके चाचा अजीत सिंह ने अंग्रेजंो के खिलाफ पगड़ी संभाल जटटा आंदोलन का नेतृत्व किया था। कुल मिलाकर भगत सिंह का पूरा परिवार देशभक्त्तंो का था जिस कारण से बचपन में ही उन में क्रांतिकारी विचार पनपने लगे थे।

लाहौर में हुई थी पढाई
उनकी शुरूआती शिक्षा बंगा के प्राइमरी स्कूल में हुई और फिर आगे की पढाई लाहौर के प्रसिद्ध डीएवी स्कूल से की। 1923 में उन्हंोने लाहौर के नेशनल कालेज में दाखिला लिया। यहां उन्हंोने इतिहास और राजनीति शास्त्र का अध्ययन किया। वो हिंदी,संस्कृत,पंजाबी,अंग्रेजी और उर्दू भाषा का ज्ञान रखते थे। जब परिवार वाले उन पर शादी का दबाव डालने लगे तो उन्हंोने पढाई छोड़ दी और वो परिवार को छोड़ कर कानपुर चले गए ताकि देश सेवा को समर्पित हो सकें।

जलियांवाला बाग में बेकसूरंो की हत्या से हिल गए भगत सिंह
उन्हंोने आजादी की लड़ाई में खुद को झौंक दिया। 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग में सैकड़ो बेकसूर लोगंो की अंग्रेज शासकंो के हत्या करने के कांड ने उनको अंदर तक झकझौर दिया था। उन्हंोने 1925 में नौजवान सभा का गठन किया। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए उन्हंोने इसके हत्यारे जेपी सांडर्स की हत्या की। उसके बाद दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बुटकेश्वर दत्त के साथ बम भी फेंका। भगत सिंह कहते थे कि अंग्रेजो की गंूगी और बहरी सरकार को सुनाने के लिए ही उन्हंोने बम फेंका था। अंग्रेज सरकार ने इन्हीं दो कामंो के कारण भगत सिंह को 23 मार्च,1931 को लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी दे दी थी। उनके साथ राजगुरू और सुखदेव को भी फांसी दी गई थी।

जेल में 300 पुस्तकें पढी भगत सिंह ने
ये 23 मार्च,1931 की शाम का वक्त था। भगत सिंह से उनके वकील प्राण नाथ मेहता मिलने आए। भगत सिंह ने उन से पूछा कि क्या वो रशियन क्रांतिकारी व्लादिमीर लेनिन की जीवनी रवोल्यूशनरी लेनिन पूस्तक लाए हैं? वकील ने उनको पुस्तक पकड़ा दी। भगत सिंह पुस्तक पढने इंतिहाई दर्जे के शौकीन थे। वो किताबी कीड़ा थे। जेल आने से पहले वो करीब ढाई सौ पुस्तक पढ चुके थे। जेल में करीब दो बरस रहने के दौरान उन्हंोने करीब 300 पुस्तकें पढ डाली। जैसे ही भगत सिंह ने लेनिन की पुस्तक को देखा उनकी आंखंो में चमक आ गई। वो तुरंत इसे पढने में जुट गए। मेहता ने बाद में अपने सस्मरणंो में लिखा कि जब वो भगत सिंह से मिलने गए तो वो जेल की कोठरी में में चक्कर काट रहे थे। ऐसा लग रहा था कि कोई शेर जंगल में विचरण कर रहा है। मेहता ने पूछा कि क्या वो देश को कोई संदेश देना चाहेंगे। भगत सिंह ने किताब से मुंह हटाए बिना कहा-सिर्फ दो संदेश हैं। साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और इंकलाब जिंदाबाद। उन्हंोने मेहता को कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचवा दें जिन्हंोने मेरे केस में गहरी रूचि ली थी। अभी कुछ ही देर हुई थी कि जेल के वार्डर चरत सिंह ने लाहौर जेल में बंद कैदियंो को कहा कि सभी अपनी अपनी कोठडियंो-बैरकंो में चले जाएं। उन्हंोने इसका कोई कारण नहीं बताया। जेल कैदी ये फुसफुसा ही रहे थे कि इसका कारण क्या है तो चरत सिंह ने कहा कि ऐसा ऊपर से आदेश आए हैँ। इसके कुछ देर बाद जेल का नाई बरकत सभी बैरकंो के आगे से धीमे आवाज में ये कहता हुआ निकला कि आज रात भगत सिंह,राजगुरू और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है। इसके बाद बहुत से कैदियंो ने बरकत से ये गुहार की कि वो कोई भी भगत सिंह की चीज ला सकें जिस से वो कभी अपने पौते-पौतियंो को ये बता सकें कि वो भी भगत सिंह के साथ जेल में रहे थे। भगत सिंह का सामान पाने के लिए कैदियंो में इतनी मारामारी थी कि वहां जूतम पैजार होते होते बची और बाद में ड्रा निकाल कर इन चीजंो को कैदियंो को दिया गया था।

अंग्रेजी हकूमत से माफी मांगने के खिलाफ थे
भगत सिंह चाहते तो अंग्रेज सरकार से माफी मांग सकते थे। खुद को जेल से रिहा करवा सकते थे। उनके साथ जेल में बंद रहे आजादी सेनानी भगत सिंह सच्चर ने कभी उन से पूछा था कि उन्हंोने अदालत में अपना बचाव क्यंो नहीं किया तो भगल सिंह ने बुलंद आवाज में जवाब दिया-इंकलाबियंो को मरना ही होता है,क्यंोकि उनके मरने से ही उनका अभियान मजबूत होता है,अदालत में अपील से नहीं। भगत सिंह को जेल की कोठरी नंबर 14 में रक्खा गया था। उसमें इतनी ही जगह थी कि भगत सिंह का पांच फुट 10 इंच का शरीर मुश्किल ही उसमें समा सकता था। भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढने में जुटे ही थे कि जेल अधिकारियंो ने उनको बताया कि अब उनके जाने का समय हो गया है। उनको सुबह 6 बजे की बजाय आज शाम यानी 12 आवर पहले ही फांसी दे दी जाएगी। जब जेल अधिकारी भगत सिंह को फांसी के लिए लेने आए तो वो किताब पढने में तन्मयता से जुटे थे। उन्हंोने जेल अधिकारियंो को कहा कि क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी खत्म नहीं करने देंगे? इतना कह कर भगत सिंह जिस पन्ने को पूरा पढा फिर उस किताब का अगला पन्ना मोड़ा फिर कहते हुए उठ कर चल दिए कि एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिलने आ रहा है। चल दिए। भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफाई कर्मचारी बेदो से कहा था कि वो उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले अपने यहां से उनके लिए खाना लेकर आए,लेकिन उनकी ये इच्छा अधूरी रह गई थी क्यंोकि उनको तय समय से पहले ही फांसी दे दी गई थी। बेदो को उस दिन जेल के गेट के अंदर आने ही नहीं दिया गया था।

अखबारंो में निरंतर लिखते थे लेख
भगत सिंह यूरोपीय,ब्रिटिश और रशियन साहित्य को चाव से पढते थे। वो तब के लोकप्रिय अखबारंो कीर्ति,अकाली,वीर अुर्जन और प्रताप में निरंतर लेख लिखते थे। वो कहते थे..
सूरा सो पहचानिए,
जो लड़े दीन के हित
पुर्जा पुर्जा कट मरे
कभी न छोड़े खेते।
अपने एक लेख में उन्हंोने लिखा कि ये कितना महान आदर्श है। हर किसी को अपना हो जाने दो। कोई भी अजनबी ना हो।वो कैसा सुंदर समय होगा,जब इस दुनिया से पराएपन का भाव हमेशा के लिए मिट जाएगा। वो दिन जब यह आदर्श स्थापित होगा,उस दिन यह कह सकेंगे कि दुनिया ने अपनी ऊंचाई को छू लिया है।
एक अन्य जगह उन्हंोने लिखा कि दुनिया के सभी गरीब लोग चाहे किसी भी जाति,नस्ल,धर्म या देश के हंो, सभी के वही अधिकार हैं। ये तुम्हारे फायदे में हैं कि धर्म,रंग,नस्ल और राष्ट्रीयता को लेकर भेदभाव बंद हो सके और सरकार की पावर तुम्हारे हाथंो में हो।
भगत सिंह ईश्वर को नहीं मानते थे। अपने एक लेख में उन्हंोने लिखा कि हम भारतीय, हम क्या कर रहे हैं? पीपल की एक टहनी कहीं कट जाती है और हिंदुअंो की धार्मिक भावना आहत हो जाती है। कागज की मूर्ति हो या ताजिया का एक कोना टूट जाता है और अल्लाह को गुस्सा आ जाता है। इंसान की जानवरंो से ज्यादा अहमियत होनी चाहिए और फिर भी,यहां भारत में वे पवित्र जानवारंो के नाम पर एक दूसरे का सिर फोड़ देते हैं। लोगंंो को आपस में लड़ने से रोकना है तो उन्हें अमीर-गरीब का एहसास हिलाना होगा। गरीब मजदूरंो और किसानंो को ये समझना होगा कि उनके असल दुश्मनी पंूजीवादी है।
एक अन्य लेख में भगत सिंह ने लिखा है-
दे मे किल मी बट कननोट किल माई आइडियाज। दे कैन क्रश माई बोडी बट दे विल नोट एबल टू क्रश माई स्पिरट।

क्रांति बम-पिस्तौल से नहीं,विचारंो से आती है
भगत सिंह लाहौर जेल में करीब दो बरस रहे। वो जेल में निरंतर अपनी डायरी लिखते थे। दूनिया भर के महान क्रांतिकारियंो और विचारकंो के कोटस लिखते थे। वो कार्ल मार्क्स और फ्रेडिरक एंगेल्स से प्रभावित थे। वो समाजवाद,आर्थिक समानता और मजूदरंो के हक की बात करते थे।थामस पेन की प्रसिद्ध किताब राइटस आफ मैन का भगत सिंह पर गहरा असर था जो मानवीय अधिकारंो की वकालत करती थी। वे फ्रांसीसी लेखक विक्टर हूगो के उपन्यास भी चाव से पढते थे। भारतीय विचारकंो में वो स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर के विचारंो का सम्मान करते थे। भगत सिंह का मानना था कि बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आती,क्रांति के विचार की धार अध्ययन के पत्थर पर रगड़ने से आती है। एक अन्य स्थान पर भगत सिंह ने लिखा- मेरी कलम भी वाकिफ है मेरे जज्बातंो से मैं इश्क भी लिखना चाहंू तो इंकलाब लिखा जाता है।

ईश्वर सोचेगा.. ये भगत सिंह तो बड़ा डरपोक निकला
भगत सिंह,राजगुरू और सुखदेव को जब उनकी कोठरियंो से निकाल कर फांसी के तख्ते की तरफ ले जाया जा रहा था तो इन तीनंो ने आपस में हाथ जोड़ लिए और वो अपना पंसदीदा गीत गाने लगे कि..कभी वो दिन भी आएगा कि जब हम आजाद हंोगे,अपनी ही जमीं होगी ये अपना ही आसमां होगा। तीनंो ने अपना अंतिम स्नान किया। तीनंो को काले कपड़े पहनाए गए। जेल वार्डर चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में कहा कि वो ईश्वर को याद करें। इस पर भगत सिंह ने कहा कि पूरी जिंदगी तो मैंने कभी ईश्वर को याद नहीं किया। मैंने कई दफा गरीबंो के दुख के लिए ईश्वर को कोसा भी है। अगर अब मैं ईश्वर से माफी मागूंगा तो ईश्वर कहेगा कि इस से बड़ा डरपोक कोई नहीं है। चंूकि इसका अंत समय नजदीक आ गया है,इसलिए ये माफी मांग रहा है। भगत सिंह अपने साथियंो के साथ गा उठे.. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। इंकलाब जिंदाबाद। हिंदुस्तान आजाद हो। जेलर ने पूछा कि सबसे पहले किसे फांसी दी जाए। सबसे पहले सुखदेव ने इस काम के लिए खुद को प्रस्तुत किया।फिर भगत सिंह और आखिर में राजगुरू को फांसी दी गई। कुलदीप नैयर ने अपनी किताब विदाउट फियर में लिखा है कि एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उन से मृतकंो की पहचान करने के लिए कहा गया तो उन्हंोने इस से इंकार कर दिया। उसे तभी सस्पैंड कर दिया गया। बाद में एक जूनियर अफसर ने पहचान की। पहले इन तीनंो का अंतिम संस्कार जेल में करना तय किया गया था। बाद में जेल प्रशासन को लगा कि जेल से धुआं उठता देख कर जेल के बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है। इसीलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ कर एक ट्रक अंदर लाया गया और इसमें इन तीनंो क्रांतिकारियंो के शवंो को बेहद अपमानजनक तरीके से ट्रक में फेंक दिया गया। सतलुज नदी के किनारे इन शवंो को जलाने का फैसला लिया गया। उनके पार्थिक शरीर को फिरोजपुर के पास सतलुज के किनारे लाया गया। तब तक रात के 10 बजे का वक्त हो चुका था। इसी बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन एक पुजारी को बुला लाए। अभी इन तीनंो के शवंो को आग लगाई ही गई थी कि लोगंो को इसके बारे में पता लग गया। जैसे ही ब्रिटिश सैनिकंो ने लोगंो को अपनी तरफ आते देखा वो वहां से भाग निकले। अगले दिन लाहौर के जिला मैजिस्ट्रेट ने शहर के कई हिस्संो ये पोस्टर लगवाए कि इन तीनंो का हिंदू और सिख रीति रिवाज से अंतिम संस्कार कर दिया गया है। हालांकि लोगंो ने इस पर कतई भरोसा नहीं किया। इन तीनंो के सम्मान में लाहौर के नीला गुबंद से जलूस शुरू हुआ। सभी ने हाथ में काले झंडे लिए हुए थे। जब ये तीनंो के शव लाहौर पहुंचे तो लोग अपने आंसू नहीं रोक पाए। भगत सिंह की फांसी के बाद जेल वार्डर चरत सिंह धीमे धीमे कदमंो से वापस आए और फफक फफक कर रोने लगे। अपनी 30 बरस की नौकरी में उन्हंोने कईयंो को फांसी होते हुए देखा था,लेकिन किसी ने भी मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया जितना भगत सिंह और उनके दो कामरेड दोस्तंो ने लगाया था। 23 बरस की उम्र में फांसी के फंदे को यंू हंसते हंसते चूम कर इसे अपने हाथंो से अपने गले में डालने वाले भगत सिंह ने अपनी मां विद्यावती को दिया हुआ वो वचन पूरा किया कि वो फांसी के तख्ते से इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाएंगे। धन्य है विद्यावती जिन्हंोने अपने सपूत भगत सिंह की शहादत पर अपनी भावनाअंो पर काबू रखते हुए इसे एक उत्सव की तरह लिया।

BabuGiri Hindi
Author: BabuGiri Hindi

बाबूगिरी हिंदी

virender chahal

Our Visitor

2 9 1 4 3 0
Total Users : 291430
Total views : 493773

शहर चुनें