April 5, 2026 12:21 pm

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आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

मुझ से मत पूछ मेरे दिल की कहानी हमदम
इस में कुछ पर्दा नशीनों के नाम भी आते हैं

आप ने परमीश वर्मा का वो गीत तो सुना ही होगा…सब फड़े जाणगें,सारे फड़े जाणगें। मगर हम कह रहे हैं कि किसी बड़े आदमी का कुछ नहीं बिगड़ेगा। कोई नहीं पकड़ा जाएगा। खरोंच तक नहीं आएगी। जब कभी सरकारों के लोग कहते हैं कि दोषी चाहे कितना ही बड़ा क्यों ना हो वो बख्शा नहीं जाएगा तो इसका एक मतलब ये भी लोग निकालते हैं कि अगर दोषी बड़ा है तो पकड़ा नहीं जाएगा और अगर छोटा है तो छोड़ा नहीं जाएगा। हम बात कर रहे हैं कि हरियाणा में आईडीएफसी फर्स्ट बैंक,एयू स्माल बैंक और पंचायत महकमे में हुए वित्तीय गोलमाल की। हरियाणा ने इसके लिए विजिलेंस की जांच मुकर्रर कर दी है। वित्त विभाग वालों को अगुवाई में अलग से टीम को जांच के लिए लगा दिया है। हालांकि इसमें बहुत ज्यादा सा दिमाग लगाने-ध्यान लगाने की जरूरत नहीं है। सब साफ साफ है। अब तो एआई का युग है। आईटी का युग है। ये युग नहीं था तब ही सरकार वालों को तो अपने अगल बगल वालों का पता रहता ही था कि कौन क्या है और अब तो फिर कहना ही क्या? असल में ये अफसर भी बेचारे करें तो करें क्या? ये निजी बैंक वाले इनको ना इधर का छोड़ते और ना उधर का। क्या कुछ नहीं देते इनको। जो जो आप सोच सकते हो वो भी और जो आप कल्पना नहीं कर सकते हो वो भी..सब कुछ ही बिछाने और बिछे रहने के लिए ये लोग तत्पर रहते हैं। रिश्वत,विदेशी टूर,दारू पार्टी,हर तरह से खुश रखना समेत ये निजी बैंक वाले किस्म किस्म की कृपा बरसाने के लिए आतुर रहते हैं। इनको तो बस सरकारी फंड चाहिए। पैसा चाहिए। एफडी चाहिए। अपने बैंक में सरकार से एक तरह का निवेश चाहिए ताकि ये ब्याज से पैसा कमा सकें। बैंक के जो कर्मचारी और अधिकारी सरकार से फंड दिलाते हैं उनकी बैंक प्रबंधन में भी अलग ही साख होती है। ठाठ होती है। इनको जल्दी इंक्रीमेंट मिलती है। इंसेटिंव मिलते हैं। गिफ्ट मिलते हैं। फेवर मिलते हैं। तरक्की मिलती है। और भी बहुत कुछ मिलता है। बहुत से होशियर बैंक अधिकारी अपने यहां ऐसी महिलाओं और लड़कियों को भी इस काम पर रखते हैं कि उनकी भोली मुस्कान पर ये अफसर एक झटके में फिदा हो जाएं। ये भी कुछ कुछ इस अंदाज में सरकार के लोगों के समक्ष पेश आती हैं कि…इस कनीज को एक दफा मौका तो दीजिए, हुजूर। उनकी इन साधी सादी भोली भाली नाजुक सी अदनी सी डिमांड को कोई पत्थर दिल वाला भी ना न कर पाएं। ऐसी फिजां में बहुत से विभागाध्यक्षों और प्रशासकीय सचिवों ये होड़ रहती है कि इन निजी बैंक वालों के हितों का ध्यान रखा जाए। और बदले में इनकी सेवा और सेवादारों का लुत्फ लिया जाए।
कसूरवारों का पता लगाना सरकार के लिए निहायत आसान
अगर हरियाणा सरकार वाकई कसूरवारों को पकड़ने के लिए व्याकुल हुई जा रही है तो एक छोटे से काम से सरकार की ये मुराद पूरी हो सकती है। हालांकि ये गोलमाल तो कई सरकारों और बरसों बरस से चलता आ रहा है,लेकिन फिलहाल तो पिछले पांच बरस का ही डाटा जांच ले कि हरियाणा सरकार के विभागों,बोर्ड,निगमों ने आईडीएफसी फर्स्ट और अन्य बैंकों को कब कब किन हालात में कितना पैसा दिया है। वित्त विभाग की ये हिदायतें हैं कि जब भी किसी विभाग को ऐसा कार्यक्रम करना हो तो उनको कोटेशन आमंत्रित करनी होंगी। जो बैंक सर्वाधिक ब्याज देगा, उसी में सरकार अपना पैसा जमा करवाएगी। सब शीशे की तरह साफ हो जाएगा कि किस अफसर ने सरकारी हिदायतों की अवहलेना की। इस नेक काम में एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं,दो दर्जन से ज्यादा आईएएस अधिकारी शामिल होंगे। हमें तो खैर बिना जांच के ही पता है कि ये अफसर कौन कौन हैं। नीचे से ऊपर तक सभी लोग इस धंधे में संलिप्त हैं। अब किसी के बारे में क्या कहना। सभी अपने लोग हैं। सभी शरीफ लोग हैं। वैसे सरकार को भी बिना जांच किए पता है कि इस बहती गंगा में किस किस ने हाध धोया है। पुण्य कमाया है। सरकार में किसी से कुछ नहीं छिपा होता। यहां एक अलिखित नियम सा होता है कि तुम मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी खुजाऊंगा। यानी हम दोनों एक हैं, एक साथ हैं, पास पास हैं और हम दोनों एक दूसरे के हितों का ख्याल रखेंगे। इस तरह ये सिलसिला चलता रहता है,कारवां बनता रहता है और बढता भी रहता है। अब चंूकि हम सब हरियाणा के सारे लोग एक ही हैं। सभी अपने हैं तो फिर किस पर तोहमत लगाएं?नाराज हो जाएंगे। सब खा कमा रहें हैं। कमाने दो। इस खेल में शामिल ऐसे महात्मा भी हैं कि अगर किसी गरीब,शोषित का जायज काम भी हो तो उसका काम में अड़चन डालने के लिए कई तरह के नियम कानून लागू कर देंगें। यही अगर किसी निजी बैंक को सरकारी फंड देना हो तो फिर यही अफसर हैं कि बगल में खुद ही फाइल दबाए भागते फिरेंगे। कुछ तो दिखने में इतने शरीफ से हैं कि इनको देख कर शराफत भी शरमा जाए,लेकिन जितने भी विभागों का दायित्व इनके पास अतीत में रहा या अब रहा वहां इन्होंने बेशर्मी से कांड किया। फिर ईमानदारी और पाखंड का ढोंग अलग से। नियमों के खिलाफ जा कर निजी बैंक वालों पर सरकारी खजाना लुटाया। जमा कराया।

नेता और अफसर दोनों ही शामिल
हरियाणा के दो आईएएस अफसरों का ही किस्सा लें। इन दोनों की बीवियां दो बड़े निजी बैंकों में काम करती हैं। ये नौकरियां बदलती रहती हैं। कभी इस बैंक की डाल पर कभी उस बैंक की डाल पर। ये जिस भी बैंक में जाती हैं इनके आईएएस पतियों का एक काम ये भी हैं अपनी बीवियों के बैंकों को हरियाणा सरकार से फंड दिलवाएं। एफडी करवाए। खाते में धन जमा करवाए। अब ऐसा नहीं है कि ये सारा कांड अफसर ही करते हैं। नेताओं को भी इस धंधे से एलर्जी नहीं है। जैेसे कि पिछली कांग्रेस सरकार के समय में रहे एक श्रम मंत्री ने हरियाणा श्रमिक कल्याण बोर्ड के सैंकड़ों करोड़ रूपए एक बड़े निजी बैंक के खाते में ट्रांसफर करवा दिए। ऐसा कहा जाता है कि बैंक वालों ने इसके एवज में उनकी पुत्रवधू को अपने यहां उच्च पद पर मौटी सैलरी पर झट से नौकरी दे दी।

बिल्ली को दूध की रखवाली तो नहीं बिठा दिया?
कहते हैं कि हरियाणा विजिलेंस,वित्त विभाग के अलावा इंकम टैक्स और ईडी भी इस गोलमाल की जांच कर रही है। ये जो जांच हो रही हैं इसमें कई छोटे लोगों को बलि का बकरा बनाया जाएगा,लेकिन जो बड़े लोग हैं उन का कुछ नहीं बिगड़ेगा..लिख कर ले लीजिए। सरकारों में ये जांच वांच का कोई फंड होता। ये किसी एक सरकार की नहीं,हर सरकार की बात होती है। जांच के नाम पर बिल्ली को दूध की रखवाली बिठाया जाता है। जांच करने वाले ही हो सकता है कि इस में कुछ बड़े लोगों से फिरौती वसूल लें। डरा धमका कर उगाही कर लें। कहते हैं ना कि इंसाफ होने से ज्यादा महत्वपूर्ण है इंसाफा होता हुआ दिखाई दे। इसलिए ये जांच वांच इसलिए बिठाई जाती है कि जनता में ये मैसेज जाए कि सरकार इस मामले में बहुत गंभीर हैं। चुन चुन कर छांट छांट कर गुनाहगारों को पाताल से भी ढूंढ लाएगी। हकीकत में हमने तो कभी किसी बड़े का कुछ बिगड़ते देखा नहीं है। और बिगड़े भी तो कैसे.. नीचे से ऊपर तक सभी तो मिले हुए होते हैं। ऐसे हालात पर कहा जा सकता है..
ऐस माहौल में दवा क्या है,दुआ क्या है
जहां कातिल ही पूछे कि हुआ क्या है

बड़े गुनहगार गिरफ्त से बाहर
आईडीएफसी फर्स्ट और एयूी स्माल बैंक को हरियाणा के विभिन्न विभागों,बोर्ड निगमों से नियमों के खिलाफ पैसा जमा करवाया। इसके अलावा विकास व पंचायत विभाग में अलग से खेल हुआ। इस गोलमाल में मुख्यत तीन किरदार-कसूरवार अभी सामने आए हैं। ये हैं ऋषभ रवि, विक्रम वधवा और नरेश बुआनीवाला। ऋषभ और नरेश को विजिलेंस ने गिरफ्तार कर लिया है, जबकि विक्रम अभी फरार है। ऐसा माना जाता है कि इन तीनों की मोबाइल काल डिटेल, मैसेज और चैट से सब खुलासा हो जाएगा कि इनके सम्पर्क में हरियाणा के कौन कौन से अफसर थे। किस तरह से ये लोग अफसरों की हर सुख सुविधा का ख्याल रखते थे। हितों का ख्याल रखते थे। साथ साथ पार्टियां करते थे। विदेश यात्रा करते थे। कहां कहां-कैसे कैसे गुड टाइम्स गुजारते थे। लेकिन इसमें क्या गुनाह है? अफसरों को और नेताओं को सेवादार चाहिए ही होते हैं। ये भी तय मानिए कि कोई सेवादार अपने पल्ले से किसी पर चवन्नी खर्च नहीं करेगा। एक हाथ से लेना और दूसरे से देना। इन सेवादारों को ऐसे लोग चाहिए होते हैं जो इनको पैसा कमवा दें और जो लोग इनको पैसा कमवाते हैं, उनको भी ऐसे सेवादारों-ताबेदारों की जरूरत रहती है। जो उनके लिए दलाली कर सकें। उनके लिए काम ला सकें। ये दोनों पक्षों के लिए विन विन सिचुएशन होती है। ये कौन लोग हैं,कहां से आते हैं,क्या करते हैं, ये सब ओपन सीक्रेट है। सरकार के बड़े लोगों से कुछ नहीं छिपा। सब उनके ही तो हैं। मांस से नाखून कभी दूर होते हैं। इसलिए किसी का कुछ नहीं होना। कुछ नहीं बिगड़ना। इसीलिए कहा जा सकता है..
किस किस को देखिए,किस किस को रोइए
आराम बड़ी चीज है,मुंह ढक के सोइए

कल्पना से परे का गोलमाल है
निजी बैंकों को सरकारी पैसा दिए जाने के मामले में इतना गदर फंड हैं, इतना गोल माल है कि अगर इसकी ठीक से जांच हो जाए और इसके गुनाहगारों को सजा मिल जाए तो हरियाणा के कई बड़े लोगों को एक खटोला जेल के भीतर और एक खटोला जेल के बाहर डालना पड़ सकता है। ये गोलमाल कई बरसों से और कई सरकारों से चला आ रहा है। अब तो इसने गति ज्यादा ही पकड़ ली है। उदाहरण के तौर पर बिजली विभाग में लंबे समय तक तैनात रहे एक आईएएस अधिकारी अपने कर्मचारियों की पीएफ के पैसे को बैंक वालों को देने में खूब ही बंदरबांट करते रहे। जहां से भी उनकी मनचाही सेवा हो जाती उसी बैंक वाले को ये पैसा देते रहे। ये सब काम वो इतनी जल्दी, इतनी मुस्तैदी और इतनी होशियारी से करते रहे कि हर समय ही वारे न्यारे करते रहे। अपनी मनचाही करते रहे। सारे सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाते रहे। मजे की बात ये है कि सरकार को भी ऐसे कर्मठ अफसरों की जरूरत रहती है और इसीलिए इस तरह के अफसरों को बड़े चाव से रखा जाता है। पाल पोस कर पलकों पर बिठा कर रखा जाता है। इनके अनुभव का फायदा लिया जाता है और हमेशा ही ठीक ठाक पदों पर रखा जाता है। इन होशियार अफसरों की होशियारी को नमन करते हुए इनके लिए इतना ही कहा जा सकता है..
दरिया तलाशना,कहीं सहरा तलाशना
मुश्किल है खुद के जैसी ही दुनिया तलाशना
देखे हुए से ख्वाब सा एक ख्वाब देखना
फिर ख्वाब में भी ख्वाब के जैसा तलाशना

एसओपी की पालना नहीं
कई बरस पहले पंचकूला में एनएचएआई के हाईवे बनाने के लिए की गई जमीन अधिग्रहण के मिले मुआवजे में कुछ राजस्व विभाग के लोगों ने गोलमाल किया। इसकी विजिलेंस जांच हुई। विजिलेंस ब्यूरो के तत्कालीन डीजी एस.एन.वशिष्ठ ने हरियाणा सरकार को भविष्य में इस तरह के गोलमाल न होने देने के लिए स्टैडर्ड ओपरेटिंग प्रौसिजर-एसओपी भी बना कर दिया था। डूज एंड डोंट डू भी बताए। विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी। पर ऐसा लगता है कि सरकार वालों ने इसे रददी की टोकरी में फेंक दिया था। ऐसा नहीं है कि सरकार का पैसा बैंक वालों को देने के लिए सरकार में नियम नहीं है। हिदायते नहीं है। हरियाणा में वित्त सचिव रह चुके संजीव कौशल ने भी इस बारे में एक दफा विस्तृत गाइडलाइन जारी कर सभी विभागों,बोर्ड निगमों को ये लिखित में बताया था कि सरकारी पैसा बैंक को किस प्रक्रिया के तहत दिया जा सकता है। जिस तरह से निजी बैंक वालों को सरकार का पैसा या यंू कहें कि जनता की खून पसीने की कमाई का गाढा पैसा अफसर मौज मस्ती और अय्याशी के लिए देते हैं,उस से साफ है कि इनको सरकार में किसी का डर नहीं है। इन्होंने अपनी राह में अवरोध बनने वाली सभी हिदायतों को डस्टबिन दिखा दिया है। ये सिर्फ एक अकेले आईडीएफसी फर्स्ट की ही कहानी नहीं है। इसमें और भी कई निजी बैंक प्लेयर शामिल है। अंतर इतना सा है कि आईडीएफसी वालों की पोल खुल गई और बाकियों के कारनामे अभी मार्किट में नहीं आए। पता सब को है। और अगर सरकार वाकई में कसूरवारों को सजा देने के लिए कुलबुला रही है,उतावली और बेचैन हुए जा रही है तो एक दिन में ये पता लगा सकती है कि किस किस ने वित्त विभाग की हिदायतों की अवहेलना की। तय प्रक्रिया की पालना नहीं की। लोएस्ट कोटेशन देने वाले बैंक को पैसा नहीं दिया। बहुत से मामलों में तो कोटेशन भी ली ही नहीं जाती। उन सब अफसरों के नाम सार्वजनिक करे। ये बताकि किस अफसर ने, किस पद पर रहते हुए, किस निजी बैंक को सरकारी हिदायतों के खिलाफ जाकर पैसा दिया। सरकारी खजाने को यंू खुल्लेआम चूना लगाने वाले उन सब कसूरवारों के खिलाफ अपराधिक मामला दर्ज करे। हो सकता है कि सरकार इस मामले में वाकई गंभीर हो। हो सकता है कि पारदर्शी सरकार इस मामले में वाकई में बड़ा एक्शल ले ले। बड़े से बड़े लोगों को ना बख्शे। अगर ऐसा हो पाता है तो विपक्ष को भी ये कहने का कतई मौका नहीं मिलेगा कि सरकारी ऐलान जुमलेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं होते। आंखों में धूल झोंकने से ज्यादा कुछ नहीं होते। जो लोग निरंतर ये गोलमाल कर के भी बचे हुए हैं उनको हमारा दिल से सलाम है कि वो ये कार्यक्रम भविष्य में भी यंू ही तीव्र गति से जारी जारी रखें और जो लोग फंस गए,पुलिस के हत्थे चढ गए हैं, उन से हमारी पूरी सहानुभूति है। इन दुखी आत्माओं के लिए यही कहा जा सकता है…
जरूरी नहीं कि जीने का कोई सहारा हो
जरूरी नहीं कि जिसके हम हो, वो भी हमारा हो
कुछ किश्तयां डूब भी जाया करती हैं
जरूरी नहीं कि हर किश्ती के नसीब में किनारा हो

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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