मंदिरों पर सरकारी कब्ज़े को लेकर फिर छिड़ी बहस
बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
प्रकाशपुर-चक्मोह, 22 मई। देशभर में हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। विश्व प्रसिद्ध बाबा बालक नाथ गुफा मंदिर के प्रतिष्ठित वंशज, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पर्यावरणविद् एवं वर्ल्ड हेरिटेज फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ. पी.सी. शर्मा ने राज्य सरकारों के मंदिर प्रबंधन मॉडल पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “भव्य और पवित्र धार्मिक स्थलों को राजनीतिक पार्किंग लॉट में बदल दिया गया है।”
डॉ. शर्मा ने कहा कि मंदिरों पर सरकारी कब्ज़ा मूल रूप से बेहतर प्रबंधन और भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर किया गया था, लेकिन वास्तविकता इसके उलट दिखाई दे रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी नियंत्रण के चलते देशभर में मंदिरों में वित्तीय अनियमितताएं, फंड की हेराफेरी, जमीनों पर कब्ज़े, पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थाओं में दखल और आध्यात्मिक विरासत की अनदेखी जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो गई हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम (HR&CE) जैसे कानूनों के माध्यम से राज्य सरकारों ने मंदिरों के प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण को अपने हाथों में ले लिया, जिसका दुष्परिणाम अब सामने आ रहा है। डॉ. शर्मा के अनुसार, लाखों मंदिर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और कई छोटे मंदिरों में नियमित पूजा-पाठ तक कराना मुश्किल हो गया है।

मंदिर भूमि पर कब्ज़े और संपत्तियों के गायब होने के आरोप
डॉ. शर्मा ने दावा किया कि कई राज्यों में मंदिरों की हजारों एकड़ भूमि पर अवैध कब्ज़े हो चुके हैं। उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां लगभग 47 हजार एकड़ मंदिर भूमि अतिक्रमण की चपेट में बताई जाती है, जबकि कई मंदिरों की संपत्तियों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने कहा कि सरकारी नियंत्रण के कारण मंदिरों की आय का सही उपयोग नहीं हो पा रहा। कई मामलों में मंदिरों की संपत्तियों को बाज़ार मूल्य से कम पर पट्टे पर दिया गया, जबकि प्रशासनिक और ऑडिट फीस के नाम पर मंदिरों की आय का बड़ा हिस्सा खर्च किया जा रहा है।

प्राचीन विरासत और परंपराओं पर खतरा
डॉ. शर्मा ने कहा कि सदियों पुराने मंदिरों की ऐतिहासिक धरोहर और धार्मिक परंपराएं भी खतरे में हैं। उचित रखरखाव के अभाव में कई प्राचीन मंदिर जर्जर हो चुके हैं और बहुमूल्य मूर्तियों की चोरी तथा क्षति की घटनाएं सामने आई हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि कई मंदिरों में ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है जिन्हें धार्मिक परंपराओं और आस्थाओं की समझ नहीं होती, जिसके कारण पवित्र रीति-रिवाजों में अनावश्यक हस्तक्षेप बढ़ रहा है। उन्होंने तिरुमाला के ऐतिहासिक “1000 खंभों वाले मंडपम” के ध्वस्तीकरण जैसे मामलों का भी उल्लेख किया।

“केवल हिंदू मंदिरों पर ही सरकारी नियंत्रण क्यों?”
डॉ. शर्मा और अन्य आलोचकों ने सवाल उठाया कि मस्जिदों, चर्चों और गुरुद्वारों का संचालन संबंधित समुदायों के हाथ में है, जबकि हिंदू मंदिरों पर राज्य सरकारों का नियंत्रण बना हुआ है। उनका कहना है कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के स्व-प्रबंधन के अधिकार का उल्लंघन है।
उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के कई राज्यों में सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में साफ-सफाई, रखरखाव, भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कई बार अव्यवस्था के कारण भगदड़ जैसी घटनाएं भी हुई हैं।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का रुख बना चर्चा का विषय
डॉ. शर्मा ने कहा कि अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट रूप से बताया कि वह मंदिरों पर लंबे समय तक सरकारी नियंत्रण के पक्ष में नहीं है। केंद्र ने कहा कि मंदिरों का संचालन श्रद्धालुओं, वंशानुगत उत्तराधिकारियों और सामुदायिक ट्रस्टों के हाथों में होना चाहिए। इसके बाद देशभर में मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की मांग और तेज हो गई है।
उन्होंने बताया कि अलग-अलग अनुमानों के अनुसार देश में 1 लाख से 4 लाख तक हिंदू मंदिर विभिन्न राज्य सरकारों के अधीन हैं। तमिलनाडु में 36 हजार से अधिक और कर्नाटक में 34 हजार से अधिक मंदिर सरकारी नियंत्रण में बताए जाते हैं। वहीं करीब 651 मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन संरक्षित हैं।
हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें
डॉ. शर्मा ने हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि मंदिर फंड के उपयोग को लेकर वहां भी बड़ा विवाद सामने आया। अक्टूबर 2025 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मंदिरों की आय को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी थी।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि मंदिरों का धन देवता का है, सरकार का नहीं, और इसे सार्वजनिक खजाने में ट्रांसफर करना “विश्वास का उल्लंघन” माना जाएगा। अदालत ने निर्देश दिए कि मंदिरों के फंड का उपयोग केवल धार्मिक, आध्यात्मिक और परोपकारी कार्यों में ही किया जाए।
इसके अलावा, मां चिंतपूर्णी ट्रस्ट और देओटसिद्ध गुफा मंदिर से जुड़े मामलों में अदालत ने उन वाहनों को ट्रस्ट को लौटाने के आदेश दिए, जिनका उपयोग सरकारी अधिकारी कर रहे थे और जिन्हें मंदिर फंड से खरीदा गया था।
37 बड़े मंदिरों को समुदायों को सौंपने की मांग
डॉ. पी.सी. शर्मा और अन्य पारंपरिक वंशजों ने मांग उठाई है कि हिमाचल प्रदेश के करीब 37 प्रमुख मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर संबंधित हिंदू समुदायों और पारंपरिक उत्तराधिकारियों को सौंपा जाए।
उन्होंने कहा कि सरकारी प्रबंधन के कारण प्रशासनिक अक्षमता, मनमानी, भ्रष्टाचार और धार्मिक असमानता बढ़ रही है। मंदिर केवल आर्थिक संस्थान नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विरासत के केंद्र हैं, इसलिए उनका संचालन आस्था से जुड़े समुदायों के हाथों में होना चाहिए।













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