बाबूगिरी हिंदी न्यूज़
चंडीगढ़, 25 अगस्त। हरियाणा में राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रदेश सरकार ने भिवानी जिला अदालत की प्रियंका धोपरा की राज्य सूचना आयुक्त पद पर नियुक्ति को करीब 14 महीने बाद निरस्त कर दिया है। खास बात यह है कि उनका नाम 23 मई 2025 को जारी नियुक्ति आदेश में शामिल था, लेकिन 26 मई 2025 को आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें पद की शपथ नहीं दिलाई गई थी।
अब हरियाणा के मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी की ओर से जारी आदेश के माध्यम से 23 मई 2025 के नियुक्ति आदेश में प्रियंका धोपरा से संबंधित नियुक्ति को निरस्त किया गया है। यह आदेश 31 जुलाई 2026 को जारी हुआ, जबकि इसकी प्रतियां संबंधित अधिकारियों को 5 अगस्त को भेजी गईं और बाद में मुख्य सचिव कार्यालय की वेबसाइट पर सार्वजनिक की गईं।
नियुक्ति आदेश में नाम, लेकिन शपथ ग्रहण से बाहर
23 मई 2025 को हरियाणा सरकार ने सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं पूर्व मुख्य सचिव टी.वी.एस.एन. प्रसाद को राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा अमरजीत सिंह, कर्मवीर सैनी, नीता खेड़ा, प्रियंका धोपरा और संजय मदान को राज्य सूचना आयुक्त नियुक्त करने के आदेश जारी किए थे।
हालांकि, 26 मई 2025 को आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में प्रियंका धोपरा को शपथ नहीं दिलाई गई। उस समय भी यह सवाल उठा था कि नियुक्ति आदेश में नाम शामिल होने के बावजूद उन्हें संवैधानिक पद की शपथ क्यों नहीं दिलाई गई। सरकार की ओर से लंबे समय तक इस संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।
अब 14 महीने बाद नियुक्ति रद्द होने से यह सवाल और गंभीर हो गया है कि 23 मई 2025 से 31 जुलाई 2026 तक प्रियंका धोपरा की नियुक्ति की वास्तविक कानूनी और प्रशासनिक स्थिति क्या थी?

अधिवक्ता हेमंत कुमार ने मई में उठाया था मामला
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता एवं प्रशासनिक-कानूनी मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने इसी वर्ष मई में इस मामले को लेकर राज्यपाल आशीम कुमार घोष, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी, सामान्य प्रशासन विभाग की प्रशासनिक सुधार शाखा तथा राज्य मुख्य सूचना आयोग को विस्तृत ज्ञापन भेजा था।
हेमंत कुमार ने 2025 में राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग की थी। उन्होंने विशेष रूप से प्रियंका धोपरा के मामले में सरकार से नियुक्ति की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट करने तथा नियुक्ति आदेश को निरस्त या संशोधित करने में हुई देरी का कारण सार्वजनिक करने की मांग की थी।
349 आवेदक, लेकिन चयन प्रक्रिया पर सवाल
हरियाणा सरकार ने मार्च 2025 में राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और सात राज्य सूचना आयुक्तों के पदों के लिए आवेदन करने वाले 349 अभ्यर्थियों की सूची सार्वजनिक की थी। हालांकि, अधिवक्ता हेमंत कुमार का कहना है कि केवल आवेदकों की सूची सार्वजनिक करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सवाल चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता का है।
उन्होंने सरकार से सर्च कमेटी और वैधानिक चयन समिति के गठन आदेश, बैठकों की कार्यवाही, शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की सूची और अंतिम सिफारिशों को सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराने की मांग की है।
उनके मुताबिक यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सर्च कमेटी ने किन उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया, उनके चयन का आधार क्या था और मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने अंतिम नामों का चयन किन मानदंडों के आधार पर किया।
अजय सूरा की नियुक्ति से भी उठा सवाल
इस मामले में 20 अप्रैल 2026 को वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार सूरा को राज्य सूचना आयुक्त नियुक्त किए जाने और 24 अप्रैल 2026 को राज्यपाल आशीम कुमार घोष द्वारा उन्हें शपथ दिलाए जाने के बाद भी एक सवाल सामने आया है।
सवाल यह है कि क्या अजय सूरा का नाम 2025 में ही सर्च कमेटी अथवा वैधानिक चयन समिति के स्तर पर विचाराधीन था? यदि ऐसा था तो 23 मई 2025 के मूल नियुक्ति आदेश में उनका नाम क्यों नहीं था? इसके अलावा यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बाद में अजय सूरा की नियुक्ति प्रियंका धोपरा के स्थान पर की गई। हालांकि, अजय सूरा की नियुक्ति के आदेश में ऐसा कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
अधिवक्ता हेमंत कुमार ने अपने ज्ञापन में अंजलि भारद्वाज बनाम भारत सरकार मामले में फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चयन, शॉर्टलिस्टिंग और चयन समितियों से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करना महत्वपूर्ण है।
उन्होंने यह भी बताया कि हरियाणा सरकार ने जनवरी 2022 में दो सूचना आयुक्तों तथा मार्च 2022 में राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और एक सूचना आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित चयन प्रक्रिया का रिकॉर्ड अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक किया था। ऐसे में सवाल उठता है कि 2025-26 की नियुक्तियों में उसी तरह की पारदर्शिता क्यों नहीं अपनाई गई।
आरटीआई एक्ट की धारा 4(2) का भी उल्लेख
हेमंत कुमार ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4(2) का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक प्राधिकरणों को अधिकतम सूचनाएं स्वतः सार्वजनिक करने की व्यवस्था अपनानी चाहिए, ताकि नागरिकों को प्रत्येक जानकारी के लिए अलग से आरटीआई आवेदन दाखिल न करना पड़े।
उनका कहना है कि राज्य सूचना आयोग स्वयं पारदर्शिता और सूचना के अधिकार की व्यवस्था का प्रहरी है। ऐसे संस्थान में नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर यदि सार्वजनिक रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं होगा तो इससे संस्थागत विश्वसनीयता और जनविश्वास पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब 14 महीने की देरी पर जवाब का इंतजार
प्रियंका धोपरा की नियुक्ति निरस्त होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि 23 मई 2025 को नियुक्ति आदेश जारी होने से लेकर 31 जुलाई 2026 को उसे निरस्त किए जाने तक सरकार की आधिकारिक स्थिति क्या थी?
क्या शपथ नहीं दिलाए जाने के साथ ही नियुक्ति प्रभावहीन हो गई थी या नियुक्ति प्रशासनिक रिकॉर्ड में प्रभावी बनी रही? यदि नियुक्ति प्रभावी नहीं थी तो उसे निरस्त करने में 14 महीने का समय क्यों लगा?
इन सवालों का जवाब अब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य सूचना आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में नियुक्तियों की पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़ा हुआ है।














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