कतरा कतरा शबनम गिन कर क्या होगा
दरियाओं की दावेदारी किया करो,
रोज वही इक कोशिश जिंदा रहने की
मरने की भी कुछ तैयारी किया करो
बहुत दफा हम जिन चीजों को जरूरत से ज्यादा महत्व दे रहे होते हैं वो असल में हमारे किसी काम की नहीं होती। हम जिस आभासी दुनिया में जी रहे होते हैं, वो आभासी लोग मौके पर कहीं नहीं दिखते और कभी काम नहीं आते। हम में से बहुत से लोग इन आईएएस और आईपीएस अफसरों को खुदा बरोबर समझने लग जाते हैं उनमें से कईयों का जीवन इतना पीड़ादायक होता है.. इतना कष्टदायक होता है कि उस से बेहतर जीवन एक दिहाड़ीदार मजदूर जी रहा होता है। हरियाणा के मुख्य सचिव रहे विजयवर्धन ने एक सीनियर आईएएस अफसर से जुड़ी एक दुखदायी घटना का मैसेज मुझे व्हाटसअप पर भेजा। इस से अफसरों के असल दुख का और जीवन का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस घटना ने मुझे झकझोर दिया।
किस्सा कुछ यूं है…
एक समय दिल्ली की सड़कों पर ब्लू लाइन बसों का एक छत्र राज था। ये चलती फिरती मौत का ताबूत थी। ये खूब ध्वनि और वायु प्रदूषण फैलाती थी। इनकी जहरीली हवा-काले धुएं में लोगों का सांस लेना मुश्किल होता जा रहा था। इन बसों को दिल्ली से चलता करने और उस जमाने में दिल्ली का कायाकल्प करने में एक शख्स से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनका नाम है राकेश मेहता। 1975 बैच के आईएएस अधिकारी। राकेश जी कमाल के अधिकारी थे। होते भी क्यों न.. सेंट स्टीफंस दिल्ली, जेएनयू दिल्ली और फिर लंदन स्कूल आफ इकोनिमक्स से जो पढे थे। उन्होंने दिल्ली सरकार में शीर्ष पदों पर अपनी सेवाएं दी। नगर निगम दिल्ली के कमिश्नर रहे। डीटीसी के सीएमडी रहे। शीला दीक्षित जब दिल्ली की सीएम थी तो वर्ष 2007 से 2010 तक वो मुख्य सचिव भी रहे। वो शीला दीक्षित के सबसे भरोसेमंद अफसरों में थे। उनको तेज तर्रार और विजनरी अधिकारी माना जाता था। उनके एक इशारे पर दिल्ली का प्रशासन हिल जाता था। जिस शख्स ने एक समय पर दिल्ली पर राज किया हो.. जिसने वर्ष 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों से पहले दिल्ली को दुल्हन की तरह सजा दिया हो.. जिस ने दिल्ली को दिल्ली बना दिया हो.. वही राकेश मेहता..
वही राकेश मेहता के जीवन का आखिरी अध्याय काफी कष्टदायी रहा। वो काफी समय से नोएडा के सेक्टर-82 में केंद्रीय विहार में एक किराए के फ्लैट में अकेले रह रहे थे। उनकी बीवी जो खुद एक आईएएस अधिकारी रही हैं वो अपने बेटे के साथ देहरादून में रहती हैं। बेटी लंदन में सैटलड हैं। बेटा और बेटी दोनों ही कामयाब। कुल मिला कर ये कह सकते हैं कि परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं। उन राकेश मेहता ने 74 बरस की आयु में आत्महत्या कर ली। इसी 5 सितंबर को उन्होंने आखिरी दफा पत्नी से फोन पर बात की। जब राकेश मेहता का फोन नहीं उठा तो सिक्योरिटी गार्ड को उनके फ्लैट पर भेजा गया। तभी ये राज खुला कि राकेश मेहता अब नहीं रहे। एक पन्ने के अपने सुससाइड नोट में उन्होंने लिखा कि बीपी, शूगर, हाथ पैर में कंपन और अन्य बीमारियों से लड़ता लड़ता अब थक गया हंू। अब मैं दुनिया को अलविदा कह रहा हंू। इसमें किसी का दोष नहीं है। वो हाथ हाथ जिसने दिल्ली सरकार में बड़े बड़े फैसले लिए, जिसके हाथ इन फौलादी फैसले लेते हुए कभी नहीं कंपकंपाए वो आखिरी में अपने ही कांपते हाथों से हार गया। राकेश मेहता का जीवन.. उनका यंू दुनिया से चले जाना हमें बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है। दरअसल हम में से बहुतों का जीवन राकेश मेहता जैसा सा ही है। जरूरी नहीं कि किसी अधिकारी के साथ ही ऐसा हो.. इस तरह के जीवन जीने में..इस तरह का पाप करने में हम में से ज्यादातर लोग शामिल हैं। हमें से ज्यादातर लोग ऐसा ही जीवन तो जी रहे हैं। भले ही हम कुछ कारोबार कर रहे हों, भले ही हम कुछ नौकरी कर रहे हों,लेकिन हमारी सोच, हमारा जीवन जीने का तरीका, हमारा काम करने का तरीका बहुत ज्यादा मशीनी हो गया है। अब हम से कई लोग खाने के मामले में बहुत चूजी हो गए हैं। कितना कार्ब्ज लेना है, कितना प्रोटीन, कितने विटामिन, लिक्विड डाइट, न जाने क्या नहीं करते। क्या नहीं सोचते। जिम में पर्सनल ट्रेनर..हाई रोक्स..मसल्स स्ट्रैंथ ट्रेनिंग क्या नहीं करते। कभी हमारे ग्रामीण देहात के बुर्जुगों को देखिए। उनको फिटनैस की आड़ में चल रहे इन सब धंधों का कुछ नहीं पता। जो मिल जाए..जब मिल जाए..जैसा रूखा सूखा मिल जाए वो चक देते हैं। मीटर खींच देते हैं। ना उनको शूगर होती है ना उनको बीपी है। देसी का पव्वा मिल जाए तो वो..थैली की दारू मिल जाए तो वो एक सांस में पी जाते हैं। लस्सी-चटनी के साथ रोटी खा लेते हैं। कभी कभार त्यौहार पर हलवा पूरी चूरमा खा लेते हैं। ताश खेलते रहेंगे। बैठकों में हुक्का गुड़गुड़ाते रहेंगे। बिना बात की बात करते रहेंगे। बहस करते रहेंगे। एक दूसरे की टांग खिंचाई करते रहेंगे। जीवन का रस ले रहे होंगे। और एक हम लोग हैं.. जो ढाई आखर पढ कर खुद को बहुत ही ज्ञानवान समझ रहे होते हैं। हर जगह हमारा ईगो हम से पहले मुंह बाए खड़ा हो जाता है। उस ने मुझे ऐसा क्यों कहा,उसने मेरे साथ ये क्यों किया। एक तो हमारी इज्जत इतनी नाजुक हो गई है मानो हर कोई उसका चीर हरण कर के चलता बनता है। उस ने मेरी बेइज्जती कर दी। उस ने मुझे इज्जत नहीं दी। एक अजीब सा ही फितूर दिमाग में हावी रहता। हम दिन रात अंधी दौड़ दौड़ते रहते हैं। बच्चों का भविष्य बनाने की फिक्र में। नाम कमाने और पहचान बनाने की फिक्र में। पैसा बनाने,जोड़ने, निवेश करने की दौड़ में। बच्चों को सैटल करने में, बढिया शादी ब्याह करने,मकान बनाने आदि के धंधों में अपना जीवन गला देते हैं। सोचते रहते हैं कि पहले ये सब हो जाए तो फिर हम जीवन जीएंगे। पहले ये कर लंू तो फिर ये करेंगे.. और वो फिर हमारे जीवन में कभी आता ही नहीं। हम ये भूल जाते हैं कि हमें सफर का मजा लेना है। मजा मंजिल में नहीं है। जब तक हम जीने की सोचते हैं तब तक हमारा बुलावा ही आ जाता है। शायद इसी हालात पर कभी शेख इब्राहीम जौक ने लिखा होगा कि..
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे
तुम ने सोची अगर गैर के घर जाने की
तो इरादे यहां कुछ और ठहर जाएंगे
यूं तो बहुत लोग हैं मेरे मरहम-दां
पर मेरे जख्म नहीं ऐसे भर जाएंगे
शोला-ए-आह को बिजली की तरह चमकाऊं
पर मुझे डर है कि वो देख कर डर जाएंगे
हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझ पर
बल्कि पूछेगा खुदा भी तो मुकर जाएंगे
जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मय खाने में ले आओ संवर जाएंगे
पद रिटायर होता है, व्यक्ति नहीं
हम पूरी जिंदगी कुर्सी को ही-पद को ही अपनी पहचान बना लेते हैं। जब कुर्सी पर होते हैं तो खुद को सम्राट-महराजा अधिराज समझ रहे होते हैं और जैसे ही ये कुर्सी जाती है हम खुद को शून्य समझ रहे होते हैं। हम अंदर से इतने खोखले हो गए हैं कि हम कुर्सी की मनोदशा से बाहर ही नहीं आ पाते। राकेश मेहता जैसे होनहार अधिकारी को रिटायरमेंट के बाद पांच साल तक अकेले फ्लैट में अपना जीवन गुजारने पर विवश होना पड़ा तो सोचिए कि हम कैसा जीवन जी रहे हैं? हमने कैसा जीवन जिया है? हमने क्या पाया और क्या खोया है? कुर्सी पर रहते हुए,कुर्सी से बाहर के दो चार सच्चे रिश्ते,एक मोहल्ला,कुछ यार दोस्त बचा कर रखिए। संभाल कर रखिए। नाजों से पाल कर रखिए। उनको सहेजिए। उनको समय पर खाद,पानी मिटटी दीजिए। उनको तव्वजो दीजिए। ये ना करें कि जब काम हो तो उनको बाप बना लें और जब काम निकल गया तो तू कौण और मैं कोण? ऐसा जुल्म खुद पर मत करिए।
बच्चे ही सब कुछ नहीं
हम कई दफा गर्व से बता रहे होते हैं मेरा बेटा न्यूयार्क में सैटल है और बेटी मुंबई में है। पर क्या उनके सैटल होने से हमारा बुढापा भी सैटल है? बच्चों को उड़ने दीजिए। उनको पंख दीजिए। पर अपने बुढापे का घोसला सिर्फ बच्चों की कामयाबी पर मत टिकाइए। अपना एक छोटा सा..प्यारा सा संसार बनाइए। सुबह की सैर के साथी, शाम की चाय, किताबें, भजन मंडली, टैÑकिंग के दोस्त, सैर सपाटे के यार, दोस्ताना पड़ौसी जरूर बनाइए। इस हालात पर कहा जा सकता है कि..
मिटटी से भी यारी रख
दिल से दिलदारी रख
चोट न पहुंचे बातों से
इतनी समझदारी रख
पहचान हो तेरी हट कर
भीड़ में कलाकारी रख
पल भर ये जोश जवानी का
बुढापे की भी तैयारी रख
दिल सबसे मिलता नहीं
फिर भी जुबान प्यारी रख
अकेलपन से बचें
महान दार्शनिक अरस्तु ने कभी कहा था कि अगर किसी को सजा देनी हो तो उसे अकेला छोड़ दो। डाक्टर हमें बीमरियों..बीपी ओर शूगर की दवा तो दे सकते हैं,लेकिन अकेलेपन की नहीं। आज हमारे घर में मां बाप जिंदा हैं तो हम उनको पूछते नहीं हैं। दो रोटी देते नहीं और फिर उनकी मौत पर लोगों के लिए महाभोज करते फिरते हैं। ऐसा पाखंड मत करें। अपने मां बाप के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं। अपने बच्चों के साथ भी क्वालिटी टाइम बिताएं। दोस्तों के साथ भी महफिल सजाएं। सब में संतुलन बनाएं। राकेश मेहता जी की कहानी हम सब को सोचने पर विवश करती है। इमें सीख लेने पर विवश करती है। हमें ये बताती है कि हमें अपना बुढापा कष्ट में नहीं, मजे में गुजारना है। जिंदगी जिंदादिली से जीनी है। इस पर अकेलेपन को हावी नहीं होने देना। ये तो सही है कि हर किसी को मुकम्मल जहान नहीं मिलता। मगर इस अधूरे जहान में भी अगर हम आज किसी अपने के पास बैठ जाएं,बिना काम के उनके साथ चाय पी लें,उनका हाल चाल पूछ लें तो वही अधूरा जहान उनको मुकम्मल लगने लग जाता है। जिंदगी में कामयाबी के लिए दौड़ना भागना तो अनिवार्य है,लेकिन इस आपधापी के बीच हमें कभी कभार मुड़कर भी देख लेना चाहिए कि कहीं किसी मोड़ पर कोई अपना तो इंतजार नहीं कर रहा। इस हालात पर कहा जा सकता है कि..
सब को रूस्वा बारी बारी किया करो
हर मौसम में फतवे जारी किया करो
रातों का नींद से रिश्ता टूट चुका
अपने घर की पहरेदारी किया करो
रोज कसीदे लिखो गंूगे बहरों के
फुरसत हो तो ये बेगारी किया करो
चांद ज्यादा रौशन है तो रहने दो
जुगनू भईया दिल मत भारी किया करो
जब जी चाहे मौत बिछा दो बस्ती में
लेकिन बातें प्यारी प्यारी किया करो












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