शक्ति शर्मा की फोन रिकॉर्डिंग और चैट से खुल सकते हैं कई राज, सीबीआई चार अधिकारियों से कर सकती है पूछताछ; विज्ञापन शाखा के फैसले भी जांच के घेरे में
बाबूगिरी न्यूज़
चंडीगढ़, 12 अक्तूबर। नगर निगम में डंपिंग ग्राउंड के 1.40 करोड़ रुपये के बिलों को मंजूरी दिलाने के बदले 14 लाख रुपये की रिश्वत मांगने के मामले में जांच का दायरा बढ़ने के संकेत हैं। इस मामले में सैनिटरी इंस्पेक्टर शक्ति शर्मा की फोन रिकॉर्डिंग और चैट को जांच की अहम कड़ी माना जा रहा है। इन रिकॉर्डिंग और बातचीत से मामले से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका स्पष्ट होने की संभावना है।
मामले में ज्वाइंट कमिश्नर बलबीर राज सिंह, एसीएफए संदीप सेठी, सैनिटरी इंस्पेक्टर नितिन और चीफ सैनिटरी इंस्पेक्टर कुलबीर सिंह के नाम भी एफआईआर में शामिल बताए गए हैं। ठेकेदार प्रशांत भदौरिया की शिकायत के आधार पर दर्ज इस मामले में सीबीआई इन अधिकारियों से पूछताछ कर सकती है। हालांकि, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और आरोपों की पुष्टि जांच के निष्कर्षों के बाद ही हो सकेगी।
इस बीच, ज्वाइंट कमिश्नर बलबीर राज सिंह के पास जेल से जुड़ा अतिरिक्त प्रभार होने के कारण उनके इस प्रभार को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। दूसरी ओर, नगर निगम की विज्ञापन शाखा से जुड़े कुछ फैसले भी सवालों के घेरे में बताए जा रहे हैं। इन फैसलों से निजी कंपनियों को फायदा पहुंचने और नगर निगम को राजस्व का नुकसान होने के आरोप हैं।
विज्ञापन नीति में बदलाव पर उठे सवाल
नगर निगम की सितंबर में हुई सदन की बैठक में सार्वजनिक शौचालयों पर विज्ञापन लगाने के लिए निर्धारित लाइसेंस फीस कम करने का प्रस्ताव सामने आया था। बताया गया कि प्रस्ताव का मुख्य विषय सार्वजनिक शौचालयों पर विज्ञापन था, लेकिन इसमें यूनीपोल को भी शामिल कर लिया गया।
इस फैसले के पीछे तर्क दिया गया कि विज्ञापन स्थलों के लिए तीन बार निविदाएं जारी करने के बावजूद कंपनियों ने पर्याप्त रुचि नहीं दिखाई थी। इसके अलावा, निविदा से पहले आयोजित बैठक में कंपनियों ने लाइसेंस फीस को अधिक बताते हुए आपत्तियां भी उठाई थीं।
इसके बाद संबंधित विज्ञापन स्थलों को नगर निगम की वेबसाइट पर उपलब्ध कराने और पहले आवेदन करने वाली कंपनी को आवंटन देने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई। इस व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि इससे विज्ञापन स्थलों के आवंटन में प्रतिस्पर्धा कितनी बनी रहेगी और नगर निगम को मिलने वाले राजस्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
आलोचकों की आशंका है कि यदि लाइसेंस फीस कम होती है या आवंटन की प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा सीमित रहती है, तो नगर निगम की आय प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इस संबंध में किसी अनियमितता की पुष्टि जांच या आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही की जा सकती है।
सीटीयू बसों के विज्ञापन टेंडर पर भी सवाल
नगर निगम की विज्ञापन शाखा से जुड़ा दूसरा मामला चंडीगढ़ परिवहन उपक्रम (सीटीयू) की बसों पर विज्ञापन लगाने के लिए जारी किए गए टेंडर का बताया जा रहा है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, टेंडर जारी करने से पहले नगर निगम आयुक्त से लाइसेंस फीस की मंजूरी लेने का मुद्दा उठा है। यह भी बताया गया है कि विज्ञापन का ठेका हासिल करने वाली कंपनी अपने स्तर पर नगर निगम में फीस जमा कर रही है, लेकिन नगर निगम की कर शाखा के अनुसार भुगतान की स्थिति को लेकर स्पष्टता नहीं है।
इस मामले में सीटीयू के निदेशक को सात पत्र लिखे जाने की बात सामने आई है। इसके अलावा, ज्वाइंट कमिश्नर की ओर से संबंधित विषय पर बैठक आयोजित करने के लिए भी कहा गया था, लेकिन बैठक नहीं हो सकी।
अब सवाल यह है कि बसों पर विज्ञापन से संबंधित लाइसेंस फीस किस आधार पर तय की गई, नगर निगम को कितनी राशि मिलनी चाहिए और वास्तव में कितनी राशि जमा हुई। इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों के रिकॉर्ड और भुगतान विवरण से ही स्पष्ट हो सकता है।
चूंकि विज्ञापन शाखा और जेल से संबंधित अतिरिक्त जिम्मेदारियां बलबीर राज सिंह के पास होने की बात कही जा रही है, इसलिए इन मामलों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा हो रही है। हालांकि, दोनों मामलों के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि अभी नहीं हुई है।
जेल में शक्ति शर्मा से मुलाकात के आरोप
बलबीर राज सिंह के पास एआईजी जेल का अतिरिक्त प्रभार भी बताया गया है। इसी संदर्भ में आरोप लगाए गए हैं कि उनके किसी करीबी ने जेल में बंद शक्ति शर्मा से मुलाकात की थी। आरोप है कि इस मुलाकात के दौरान उसे सुविधाएं उपलब्ध कराने और मामले में संबंधित अधिकारियों का बचाव करने से जुड़ी बातें कही गईं।
इसके अलावा, यह दावा भी किया जा रहा है कि प्रशासन के दो अधिकारी बलबीर राज सिंह के पक्ष में संपर्क करने में जुटे हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन्हें फिलहाल आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
जेल में मुलाकात से जुड़े आरोपों को लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि ऐसी कोई मुलाकात हुई थी, तो यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि मुलाकात किन नियमों के तहत हुई, संबंधित व्यक्ति कौन था और क्या जेल के रिकॉर्ड में इसका विवरण दर्ज है।
इस संबंध में ज्वाइंट कमिश्नर बलबीर राज सिंह की ओर से कोई जवाब नहीं दिए जाने की बात कही गई है। उनका पक्ष सामने आने पर मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
सीबीआई जांच से सामने आ सकती है अधिकारियों की भूमिका
रिश्वत मामले में फोन रिकॉर्डिंग, चैट, बिलों की मंजूरी से संबंधित दस्तावेज और अधिकारियों के बीच हुई बातचीत जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इन साक्ष्यों के आधार पर यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कथित रिश्वत की मांग किस स्तर पर हुई और बिलों को मंजूरी देने की प्रक्रिया में किन अधिकारियों की क्या भूमिका थी।
साथ ही, विज्ञापन शाखा से संबंधित फैसलों, निविदाओं, लाइसेंस फीस और भुगतान के रिकॉर्ड की जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि नगर निगम को किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान हुआ या नहीं।
फिलहाल, मामले में सामने आए आरोपों और दावों पर जांच के निष्कर्षों का इंतजार है। यदि सीबीआई संबंधित अधिकारियों से पूछताछ करती है, तो रिश्वत मामले के साथ-साथ उससे जुड़े प्रशासनिक पहलुओं पर भी स्थिति स्पष्ट होने की संभावना है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या रिश्वत मामले की जांच के बीच बलबीर राज सिंह से जेल का अतिरिक्त प्रभार वापस लिया जाता है और क्या सीबीआई की जांच में फोन रिकॉर्डिंग, चैट तथा नगर निगम के विज्ञापन संबंधी फैसलों से जुड़े नए तथ्य सामने आते हैं।












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