November 2, 2026 3:59 am

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पंचकूला के सेक्टर-11 लाल क्वार्टर में महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया होई का त्योहार, परिवार की सुख-समृद्धि और बच्चों की लंबी उम्र की कामना की

लोक आस्था, पारिवारिक परंपरा और आपसी भाईचारे का प्रतीक है होई अष्टमी का पर्व; महिलाओं ने सामूहिक रूप से की पूजा-अर्चना, सुनाई होई माता की कथा

बाबूगिरी न्यूज़
पंचकूला, 1 नवम्बर। पंचकूला के सेक्टर-11 स्थित लाल क्वार्टर में महिलाओं ने श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होई का त्योहार मनाया। इस अवसर पर क्षेत्र की महिलाओं ने एकत्रित होकर होई माता की पूजा-अर्चना की और अपने बच्चों की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य तथा लंबी आयु की कामना की। महिलाओं ने परंपरा के अनुसार पूजा की थाली सजाई, धार्मिक विधि-विधान से होई माता का पूजन किया और व्रत से जुड़ी कथा सुनकर त्योहार की परंपरा को आगे बढ़ाया।
इस दौरान महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। त्योहार के अवसर पर पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं ने एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं। सामूहिक पूजा के माध्यम से महिलाओं ने न केवल अपनी धार्मिक आस्था व्यक्त की, बल्कि आपसी मेलजोल, सामाजिक एकता और पारिवारिक संस्कारों का संदेश भी दिया।

क्या है होई का त्योहार और क्यों मनाया जाता है?
होई का त्योहार उत्तर भारत, विशेषकर हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसे सामान्य तौर पर अहोई अष्टमी के नाम से जाना जाता है। यह पर्व कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। दीपावली से लगभग आठ दिन पहले आने वाला यह त्योहार मुख्य रूप से माताओं को समर्पित होता है।
इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुखद भविष्य और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार होई माता की पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

होई माता की कथा में छिपा है पश्चाताप और संतान की रक्षा का संदेश
होई अष्टमी से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक साहूकार की पत्नी दीपावली से पहले घर की मरम्मत और लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी खोदने जंगल गई थी। मिट्टी खोदते समय अनजाने में उसकी कुदाल से एक साही के बच्चे को चोट लग गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
इस घटना से दुखी साही ने साहूकार की पत्नी को श्राप दे दिया। लोककथा के अनुसार इसके बाद उसके बच्चों पर संकट आने लगा। अपने दुख से परेशान महिला ने होई माता की शरण ली और अपनी भूल के लिए पश्चाताप करते हुए पूजा-अर्चना की।
कथा के अनुसार, उसकी श्रद्धा और पश्चाताप से प्रसन्न होकर होई माता ने उसे आशीर्वाद दिया और उसके परिवार में फिर से खुशियां लौट आईं।
इस कथा का मूल संदेश जीव-जंतुओं के प्रति दया, अपनी भूल का पश्चाताप, मातृत्व की भावना और संतान की रक्षा के लिए ईश्वर के प्रति विश्वास से जुड़ा है।

कैसे की जाती है होई माता की पूजा?
होई अष्टमी के दिन महिलाएं सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेती हैं। परंपरागत रूप से कई महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ परिवारों में अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार किया जाता है।
पूजा के लिए घर की दीवार पर होई माता और उनके साथ साही तथा उसके बच्चों की आकृति बनाई जाती है। कई स्थानों पर अब महिलाएं बाजार में मिलने वाले होई माता के चित्र का भी इस्तेमाल करती हैं।
शाम के समय शुभ मुहूर्त में महिलाएं पूजा की थाली सजाकर होई माता की आराधना करती हैं। रोली, चावल, दीपक, फल, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद होई माता की कथा सुनी और सुनाई जाती है।
कुछ क्षेत्रों में तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है, जबकि कुछ परिवारों में चंद्रमा के दर्शन और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा संपन्न की जाती है।

 

नई पीढ़ी तक पहुंच रही हैं धार्मिक परंपराएं
सेक्टर-11 लाल क्वार्टर में महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से होई का त्योहार मनाना इस बात का प्रतीक रहा कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी लोग अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े हुए हैं। ऐसे आयोजन महिलाओं को एक-दूसरे के साथ समय बिताने, अपने अनुभव साझा करने और नई पीढ़ी को त्योहारों के महत्व से परिचित कराने का अवसर देते हैं।
होई अष्टमी केवल एक व्रत या धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक भी है। यह पर्व परिवार की खुशहाली, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और समाज में सकारात्मकता की कामना के साथ मनाया जाता है।
पंचकूला के सेक्टर-11 लाल क्वार्टर में महिलाओं ने भी इसी श्रद्धा और विश्वास के साथ होई माता के चरणों में परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की और पारंपरिक त्योहार को उत्साहपूर्वक मनाया।

 

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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