August 28, 2026 12:34 am

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गानों के बहाने गिरता स्तर या समाज का आईना?

सेंसर, सिनेमा और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी पर एक विचार
— डॉ. सत्यवान सौरभ
आज के डिजिटल युग में संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की सोच और संस्कारों को दिशा देने वाली एक प्रभावशाली शक्ति बन चुका है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने गानों की पहुँच को इतना व्यापक बना दिया है कि कोई भी गीत कुछ ही घंटों में लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँच जाता है। ऐसे में गानों के बोल, उनकी प्रस्तुति और उनमें छिपा संदेश पहले से कहीं अधिक असरदार हो गया है।
लेकिन हाल के समय में संगीत के एक वर्ग में जो बदलाव देखने को मिल रहा है, वह चिंता पैदा करता है। गानों में बढ़ती अशालीनता, दोहरे अर्थ वाले शब्द और भड़काऊ दृश्य—ये सब मिलकर यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या हम मनोरंजन के नाम पर अपनी सांस्कृतिक मर्यादाओं से समझौता कर रहे हैं? या यह केवल समय के साथ बदलती अभिव्यक्ति है, जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए?
अक्सर इस बहस में सबसे पहले उंगली Central Board of Film Certification (सीबीएफसी) पर उठती है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि सेंसर बोर्ड की भूमिका सीमित है। वह मुख्यतः फिल्मों को प्रमाणित करता है, जबकि आज अधिकांश गाने सीधे यूट्यूब, ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के जरिए दर्शकों तक पहुँचते हैं, जहाँ पारंपरिक सेंसरशिप का दायरा बहुत कम हो गया है। ऐसे में हर समस्या के लिए सेंसर को जिम्मेदार ठहराना व्यावहारिक नहीं है।
यह भी सच है कि डबल मीनिंग या संकेतों में बात करने की परंपरा नई नहीं है। पुराने दौर के गीतों में भी रूपक और प्रतीक होते थे, लेकिन उनमें एक सादगी और सौंदर्य था। वे भावनाओं को छूते थे, उत्तेजना को नहीं उभारते थे। आज कई गानों में संकेत इतने स्पष्ट और प्रत्यक्ष हो गए हैं कि वे कल्पना की गुंजाइश कम और भौंडेपन की संभावना ज्यादा पैदा करते हैं। यह बदलाव सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि मानसिकता का भी प्रतीक है।
अब सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? केवल गीतकार, निर्माता और कलाकार, या फिर दर्शक भी? सच्चाई यह है कि बाजार वही बनाता है, जिसकी मांग होती है। जब कोई विवादित या उत्तेजक गीत करोड़ों व्यूज बटोरता है, तो यह सिर्फ निर्माता की रणनीति नहीं, बल्कि दर्शकों की पसंद का भी परिणाम होता है। हम जिस कंटेंट को देखते, सुनते और साझा करते हैं, वही धीरे-धीरे मुख्यधारा बन जाता है।
आज का दर्शक केवल उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि वह कंटेंट का प्रचारक भी है। सोशल मीडिया पर एक क्लिक से कोई भी गीत वायरल हो सकता है। ऐसे में जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। अगर हमें बेहतर संगीत चाहिए, तो हमें अपनी पसंद में भी बदलाव लाना होगा। केवल आलोचना से नहीं, बल्कि अच्छे और सार्थक कंटेंट को समर्थन देने से बदलाव आएगा।
सबसे ज्यादा चिंता का विषय बच्चों और युवाओं पर पड़ने वाला प्रभाव है। वे बिना समझ के इन गीतों को गुनगुनाते हैं और उनके शब्दों को दोहराते हैं। बचपन और किशोरावस्था मानसिक और नैतिक विकास का समय होता है। ऐसे में भ्रामक या भड़काऊ सामग्री का लगातार संपर्क उनके व्यक्तित्व पर दीर्घकालिक असर डाल सकता है।


यहाँ यौन शिक्षा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। यह एक संवेदनशील विषय है, जिसे वैज्ञानिक और नैतिक दृष्टिकोण से समझाया जाना चाहिए। लेकिन जब इसे गानों के माध्यम से अशालीन या भ्रामक रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो वह शिक्षा नहीं, बल्कि भ्रम पैदा करता है। इससे समाज में गलत धारणाएँ भी जन्म लेती हैं।
समाधान केवल प्रतिबंध नहीं हो सकता। अत्यधिक सेंसरशिप रचनात्मकता को सीमित कर सकती है। जरूरत है संतुलन की—जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी बनी रहे और सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाई जाए।
इस दिशा में सबसे जरूरी है जागरूकता। दर्शकों को समझना होगा कि वे क्या देख रहे हैं और उसका प्रभाव क्या हो सकता है। अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद करना होगा, जबकि शिक्षण संस्थानों को इस विषय पर जिम्मेदारी से चर्चा करनी चाहिए।
कलाकारों और निर्माताओं को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। कला केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी है। यदि वे चाहें, तो मनोरंजन के साथ सकारात्मक संदेश भी दे सकते हैं।
मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उन्हें केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं, बल्कि कंटेंट की गुणवत्ता और उसके सामाजिक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए उसे बढ़ावा देना चाहिए।
अंततः, संगीत और सिनेमा समाज का आईना हैं। वे वही दिखाते हैं, जो कहीं न कहीं हमारे भीतर मौजूद होता है। अगर इस आईने में हमें गिरावट दिख रही है, तो इसका मतलब है कि हमें खुद के भीतर भी झांकने की जरूरत है।
यह समय केवल आलोचना का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है। हमें यह तय करना होगा कि हम किस प्रकार के समाज का निर्माण करना चाहते हैं। क्योंकि अंत में समाज वही बनता है, जैसा उसका सामूहिक सोच और व्यवहार होता है।
अगर हम एक संवेदनशील, जागरूक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध समाज चाहते हैं, तो हमें अपने मनोरंजन के साधनों और उनकी दिशा पर भी गंभीरता से विचार करना होगा—वरना मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही सामग्री धीरे-धीरे हमारे ही मूल्यों को चुनौती देने लगेगी।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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