June 5, 2026 8:07 am

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दोबारा लौट रहे लोग लकड़ी की खाट पर आधुनिक जीवनशैली के बीच परंपरा, स्वास्थ्य और पर्यावरण का पुनर्जागरण

– डॉ. सत्यवान सौरभ
एक समय था जब भारतीय घरों, आँगनों, चौपालों और खेतों में लकड़ी की खाट जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी। सुबह की चाय से लेकर रात की नींद तक, खाट केवल एक फर्नीचर नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक जीवन का केंद्र थी। लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता का प्रभाव बढ़ा, शहरीकरण ने गति पकड़ी और बाजार में नए-नए प्रकार के बेड, सोफा-कम-बेड तथा महंगे गद्दे आने लगे, खाट धीरे-धीरे घरों से गायब होने लगी। इसे पुरातन, ग्रामीण और पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया गया। परंतु समय का चक्र एक बार फिर घूम रहा है। आज लोग दोबारा लकड़ी की खाट की ओर लौट रहे हैं। यह वापसी केवल एक पारंपरिक वस्तु की वापसी नहीं है, बल्कि जीवन के प्रति बदलती सोच, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और प्रकृति के साथ संतुलन की तलाश का प्रतीक भी है।

भारतीय समाज में खाट का इतिहास बहुत पुराना है। इसे चारपाई, मंजी या खटिया जैसे नामों से भी जाना जाता है। लकड़ी के मजबूत ढाँचे और रस्सियों या पट्टियों से बुनी हुई यह संरचना सदियों तक भारतीय जीवन का आधार रही। गाँवों में चौपाल की पहचान खाटों से होती थी। परिवार के बुजुर्ग खाट पर बैठकर निर्णय लेते थे, किसान दिनभर के श्रम के बाद खाट पर विश्राम करते थे और बच्चे उसी पर खेलते-कूदते बड़े होते थे। यह केवल आराम का साधन नहीं थी बल्कि सामाजिक संवाद का मंच भी थी। आज भी ग्रामीण भारत में खाट पर बैठकर होने वाली चर्चाएँ लोकतांत्रिक संवाद की सबसे सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति मानी जाती हैं।

पिछले कुछ दशकों में जीवनशैली में बड़े बदलाव आए। लोगों ने आधुनिक फर्नीचर को प्रगति और समृद्धि का प्रतीक मान लिया। बड़े-बड़े बेड, मोटे गद्दे और आकर्षक डिज़ाइन वाले फर्नीचर घरों की आवश्यकता बन गए। विज्ञापनों ने भी लोगों को यह विश्वास दिलाया कि आराम केवल महंगे गद्दों और आधुनिक बिस्तरों में ही संभव है। परिणामस्वरूप खाट धीरे-धीरे घरों से बाहर होती चली गई। लेकिन अब जब लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, बढ़ते तनाव और कृत्रिम जीवनशैली के दुष्प्रभावों का सामना कर रहे हैं, तब वे उन पारंपरिक विकल्पों को नए दृष्टिकोण से देखने लगे हैं जिन्हें कभी उन्होंने स्वयं ही त्याग दिया था।
लकड़ी की खाट की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य संबंधी लाभ हैं। आधुनिक जीवनशैली में कमर दर्द, गर्दन दर्द और रीढ़ से जुड़ी समस्याएँ तेजी से बढ़ी हैं। बहुत अधिक मुलायम गद्दों पर सोना कई लोगों के लिए असुविधाजनक साबित हुआ है। इसके विपरीत खाट का ढाँचा शरीर को संतुलित सहारा देता है। रस्सियों से बुनी खाट शरीर के भार को समान रूप से वितरित करती है, जिससे रीढ़ पर अनावश्यक दबाव कम पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक बुजुर्ग वर्षों तक खाट पर सोने के कारण बेहतर शारीरिक स्थिति में दिखाई देते हैं। यद्यपि हर व्यक्ति की स्वास्थ्य आवश्यकताएँ अलग होती हैं, फिर भी खाट को प्राकृतिक और संतुलित विश्राम का साधन माना जाता है।

गर्म जलवायु वाले भारत में खाट की उपयोगिता और भी अधिक है। फोम और स्प्रिंग वाले गद्दे अक्सर शरीर की गर्मी को रोक लेते हैं, जिससे गर्मियों में असुविधा बढ़ जाती है। इसके विपरीत खाट के नीचे और ऊपर दोनों ओर से हवा का प्रवाह बना रहता है। यह प्राकृतिक वेंटिलेशन शरीर को ठंडक प्रदान करता है और नींद की गुणवत्ता में सुधार करता है। बिजली की बढ़ती खपत और एयर कंडीशनर पर निर्भरता के इस दौर में खाट का यह गुण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी खाट का महत्व बढ़ रहा है। आज दुनिया टिकाऊ विकास और पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है। आधुनिक फर्नीचर उद्योग में प्लास्टिक, सिंथेटिक फोम और रासायनिक पदार्थों का व्यापक उपयोग होता है, जिनका पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत लकड़ी और प्राकृतिक रस्सियों से बनी खाट अपेक्षाकृत पर्यावरण-अनुकूल होती है। यह लंबे समय तक चलती है, आसानी से मरम्मत की जा सकती है और इसके अधिकांश हिस्से पुनर्चक्रित या प्राकृतिक रूप से नष्ट हो सकते हैं। ऐसे समय में जब लोग पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहे हैं, खाट उन्हें एक टिकाऊ विकल्प के रूप में दिखाई देने लगी है।

खाट की वापसी का एक कारण आर्थिक भी है। महंगे फर्नीचर और ब्रांडेड गद्दों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। दूसरी ओर, स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाई गई खाट अपेक्षाकृत सस्ती और टिकाऊ होती है। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में आज भी खाट कम लागत में उपलब्ध है। यह वर्षों तक उपयोग में आ सकती है और आवश्यकता पड़ने पर उसकी रस्सियाँ बदलकर उसे फिर नया बनाया जा सकता है। इस प्रकार खाट केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी व्यवहारिक विकल्प है।

दिलचस्प बात यह है कि खाट की वापसी केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। बड़े शहरों में भी लोग इसे नए रूप में अपना रहे हैं। इंटीरियर डिज़ाइनरों ने पारंपरिक खाट को आधुनिक सौंदर्यबोध के साथ प्रस्तुत करना शुरू किया है। आज कई घरों में खाट को बालकनी, गार्डन, टैरेस या लिविंग स्पेस में सजावटी और उपयोगी वस्तु के रूप में रखा जा रहा है। रिसॉर्ट, कैफ़े और होमस्टे भी अपने परिसर में खाट का उपयोग कर रहे हैं ताकि ग्राहकों को देसी और पारंपरिक अनुभव मिल सके। यह दिखाता है कि परंपरा और आधुनिकता का मेल किस प्रकार संभव है।

सोशल मीडिया ने भी खाट की लोकप्रियता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज “सस्टेनेबल लिविंग”, “स्लो लाइफ”, “देसी लाइफस्टाइल” और “रूट्स की ओर वापसी” जैसे विषय युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। लोग अपने घरों और फार्महाउसों में खाट के साथ तस्वीरें साझा करते हैं। अनेक युवा, जो कभी खाट को केवल गाँवों की वस्तु मानते थे, अब उसे जीवनशैली और पहचान का हिस्सा समझने लगे हैं। यह परिवर्तन बताता है कि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को नए नजरिए से देख रही है।
खाट का सांस्कृतिक महत्व भी कम नहीं है। भारतीय साहित्य, लोकगीतों और फिल्मों में खाट का उल्लेख बार-बार मिलता है। यह ग्रामीण जीवन, आत्मीयता और सामूहिकता का प्रतीक रही है। जब परिवार के सदस्य एक साथ खाट पर बैठकर बातचीत करते थे, तब संवाद स्वाभाविक रूप से विकसित होता था। आज डिजिटल युग में जहाँ लोग एक ही घर में रहते हुए भी मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं, वहाँ खाट जैसे सामूहिक बैठने के स्थान फिर से सामाजिक निकटता का माध्यम बन सकते हैं।

हालाँकि खाट की वापसी का अर्थ यह नहीं है कि आधुनिक फर्नीचर पूरी तरह अप्रासंगिक हो गया है। आधुनिक जीवन की आवश्यकताएँ अलग हैं और कई परिस्थितियों में आधुनिक बेड अधिक सुविधाजनक भी हो सकते हैं। लेकिन खाट की बढ़ती लोकप्रियता यह संकेत अवश्य देती है कि लोग केवल सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी महत्व देने लगे हैं। वे ऐसे विकल्प खोज रहे हैं जो जीवन को अधिक संतुलित और स्वाभाविक बना सकें।
वास्तव में खाट का पुनरागमन उस व्यापक सामाजिक बदलाव का हिस्सा है जिसमें लोग अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रयास कर रहे हैं। चाहे पारंपरिक भोजन हो, जैविक खेती हो, मिट्टी के बर्तन हों या लकड़ी की खाट—लोग अब यह महसूस कर रहे हैं कि विकास का अर्थ केवल नई तकनीक अपनाना नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ उन परंपराओं को भी समझना है जो समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं और जिनमें जीवन को सरल, स्वस्थ और संतुलित बनाने की क्षमता है।
आज जब दुनिया तेज़ी से बदल रही है और जीवन पहले से अधिक जटिल होता जा रहा है, तब लकड़ी की खाट हमें सादगी का संदेश देती है। वह याद दिलाती है कि आराम केवल महंगे साधनों से नहीं, बल्कि प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली से भी प्राप्त किया जा सकता है। खाट की ओर लौटते कदम इस बात का संकेत हैं कि समाज अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों, पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरणीय समझ को फिर से महत्व देने लगा है।
संभव है कि आने वाले वर्षों में खाट फिर कभी हर घर का मुख्य फर्नीचर न बने, लेकिन उसका पुनर्जागरण यह अवश्य सिद्ध करता है कि परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती। जब आधुनिक जीवन की चुनौतियाँ बढ़ती हैं, तब समाज अक्सर अपनी जड़ों में समाधान खोजता है। लकड़ी की खाट की वापसी इसी खोज की कहानी है—एक ऐसी कहानी जिसमें स्वास्थ्य है, पर्यावरण है, संस्कृति है और जीवन को अधिक मानवीय बनाने की आकांक्षा भी।

यही कारण है कि आज लोग दोबारा लकड़ी की खाट पर लौट रहे हैं। वे केवल एक पुराने फर्नीचर को नहीं अपना रहे, बल्कि एक ऐसे जीवन-दर्शन को पुनर्जीवित कर रहे हैं जो सादगी, संतुलन, आत्मीयता और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित है। यही इस वापसी का सबसे बड़ा अर्थ और सबसे बड़ी उपलब्धि है।
– डॉ. सत्यवान सौरभ

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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