June 15, 2026 5:40 pm

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कब तक सरपंचों, पार्षदों के हक का उपयोग करते रहेंगे पति?

डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में लोकतंत्र की जड़ें केवल संसद, विधानसभा और बड़े राजनीतिक मंचों में नहीं, बल्कि गांवों, कस्बों और नगरों की स्थानीय संस्थाओं में भी गहराई से फैली हुई हैं। पंचायतें और नगर निकाय लोकतंत्र की वह सबसे छोटी लेकिन सबसे जीवंत इकाई हैं, जहाँ जनता अपने प्रत्यक्ष प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन में भागीदारी करती है। इन्हीं संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए संविधान ने आरक्षण का प्रावधान किया, ताकि वे केवल घरेलू दायरे तक सीमित न रहें, बल्कि निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा सकें। लेकिन आज एक कटु सच्चाई यह है कि अनेक स्थानों पर महिला सरपंच और महिला पार्षद केवल नाम की प्रतिनिधि बनकर रह गई हैं, जबकि वास्तविक कामकाज उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य संभाल रहे हैं। यही स्थिति “सरपंच पति” और “पार्षद पति” जैसी संज्ञाओं को जन्म देती है।
यह प्रश्न केवल औपचारिकता का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है। जब कोई महिला निर्वाचित होकर पद संभालती है, तो उसके पीछे जनता का विश्वास, संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक हिस्सेदारी होती है। यदि उसकी जगह कोई और व्यक्ति निर्णय लेता है, बैठकों में भाग लेता है या प्रशासनिक कार्य करता है, तो यह उस जनादेश का अपमान है जिसे मतदाताओं ने दिया था। महिला प्रतिनिधि के नाम पर किसी पुरुष का सत्ता चलाना न केवल लोकतांत्रिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि यह आरक्षण नीति की मूल भावना को भी कमजोर करता है।


73वें और 74वें संविधान संशोधन ने भारत में स्थानीय स्वशासन को नया आयाम दिया। इन संशोधनों के माध्यम से पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया गया। उद्देश्य यह था कि महिलाएं पंचायतों में केवल संख्या के रूप में न दिखें, बल्कि नेतृत्व, प्रशासन, योजना-निर्माण और नीति-क्रियान्वयन में भाग लें। इससे लाखों महिलाएं स्थानीय राजनीति में आईं, जिनमें अनेक ने असाधारण क्षमता, संवेदनशीलता और जनसंपर्क का परिचय दिया। कई महिला सरपंचों ने जल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि अवसर मिलने पर महिलाएं किसी भी तरह पुरुषों से कम नहीं हैं।
फिर भी यह भी सच है कि व्यापक सामाजिक संरचना आज भी पितृसत्तात्मक है। गांवों में, विशेषकर उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में, महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में स्वतंत्र रूप से भाग लेने के लिए पर्याप्त सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती। कई बार वे पढ़ी-लिखी होते हुए भी परंपरागत दबावों, पारिवारिक नियंत्रण और भय के कारण निर्णय लेने से बचती हैं। कुछ जगहों पर तो विवाह के बाद महिला प्रतिनिधि की राजनीतिक पहचान लगभग समाप्त हो जाती है और उसका स्थान पति ले लेता है। परिणामस्वरूप उसका संवैधानिक अधिकार कागज़ पर तो बना रहता है, लेकिन व्यवहार में वह अधिकार परिवार के पुरुष सदस्य के हाथ में चला जाता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
समस्या की जड़ केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और संस्थागत दोनों है। कई परिवारों में यह मानसिकता बन गई है कि महिला प्रतिनिधि का पद वास्तव में “परिवार का पद” है, जिसका संचालन पति या ससुर करेंगे। ऐसा सोचने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि निर्वाचित पद किसी परिवार को नहीं, एक व्यक्ति को मिला होता है। कानून की दृष्टि से भी पदाधिकारी वही होता है जिसे जनता ने चुना है। यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसके नाम पर निर्णय लेने लगे, तो यह प्रतिनिधि शासन की अवधारणा के विरुद्ध है। इससे न केवल महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित होती है, बल्कि यह भविष्य की महिला नेतृत्व पीढ़ी के लिए भी गलत संदेश देता है।
हरियाणा राज्य सूचना आयोग द्वारा इस मुद्दे पर की गई टिप्पणी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आयोग ने स्पष्ट कहा कि महिला सरपंचों की जगह उनके पतियों का सरकारी बैठकों या प्रशासनिक कार्यों में भाग लेना गलत है। यह कथन केवल प्रशासनिक सख्ती का संकेत नहीं है, बल्कि यह इस सच्चाई की ओर भी इशारा करता है कि महिला आरक्षण को अभी भी गंभीरता से लागू करने की आवश्यकता है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि के अधिकार किसी और को सौंपे जाने लगें, तो फिर निर्वाचन प्रक्रिया का अर्थ ही क्या रह जाता है? आयोग की टिप्पणी ने इस बहस को फिर से राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया कि क्या हम वास्तव में महिलाओं को सत्ता दे रहे हैं, या केवल उनका नाम इस्तेमाल कर रहे हैं?
कई लोगों का तर्क होता है कि ग्रामीण महिलाएं अक्सर अशिक्षित, अनुभवहीन या सामाजिक दबाव में होती हैं, इसलिए उनके पति प्रशासनिक काम संभाल लेते हैं। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। किसी महिला की कमजोरी के कारण उसका अधिकार उससे छीन लेना न्यायसंगत नहीं हो सकता। यदि कोई महिला पढ़ी-लिखी नहीं है, तो उसे शिक्षा दी जानी चाहिए। यदि उसमें प्रशासनिक अनुभव की कमी है, तो उसे प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यदि सामाजिक दबाव है, तो समाज और प्रशासन को उसे सुरक्षा और सहयोग देना चाहिए। समस्या का इलाज अधिकार हस्तांतरण नहीं, बल्कि अधिकार-सशक्तिकरण है।
यहीं पर राज्य और समाज की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को कार्यप्रणाली, वित्तीय प्रबंधन, कानून, ग्रामसभा संचालन, विकास योजनाओं और शिकायत निवारण की उचित जानकारी दी जाए। केवल चुनाव कराकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। यदि महिलाओं को नियमित प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग मिले, तो वे आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व कर सकती हैं। कई राज्यों में महिला सरपंचों के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए हैं, जिनसे सकारात्मक परिणाम भी आए हैं। इससे स्पष्ट है कि महिलाएं नेतृत्व करने में सक्षम हैं, बस उन्हें अवसर और वातावरण दोनों चाहिए।
लेकिन केवल प्रशासनिक उपाय ही पर्याप्त नहीं होंगे। जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक “सरपंच पति” और “पार्षद पति” की संस्कृति बनी रहेगी। गांवों और छोटे शहरों में अक्सर राजनीतिक शक्ति को पुरुष प्रभुत्व से जोड़ा जाता है। महिला को पद मिलता है, लेकिन उसे निर्णयों में अंतिम शब्द कहने की अनुमति नहीं होती। कई बार बैठक में वह उपस्थित रहती है, पर बोलता उसका पति है। कभी-कभी अधिकारी भी महिला प्रतिनिधि की बजाय पति से संवाद करना अधिक सुविधाजनक समझते हैं। यह सुविधा लोकतंत्र के लिए हानिकारक है, क्योंकि इससे गलत प्रथा को अप्रत्यक्ष वैधता मिलती है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल कुर्सी पर बैठना नहीं होता। इसका मतलब है जनता की समस्याओं को समझना, प्राथमिकताओं को तय करना, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण करना और जवाबदेही निभाना। जब महिला प्रतिनिधि की जगह कोई पुरुष यह सब करने लगता है, तो महिला की राजनीतिक पहचान क्षीण हो जाती है। इसका दीर्घकालिक प्रभाव यह होता है कि समाज में यह धारणा मजबूत होती है कि महिलाएं नेतृत्व के लिए उपयुक्त नहीं हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि महिलाएं अधिक संवेदनशील, व्यावहारिक और जनहितोन्मुख नेतृत्व भी दे सकती हैं। अनेक शोध और स्थानीय अनुभव बताते हैं कि महिला नेतृत्व कई बार पारदर्शिता और सामाजिक सरोकारों को बढ़ाता है।
यह भी याद रखना चाहिए कि महिला आरक्षण किसी दया या कृपा का परिणाम नहीं है। यह ऐतिहासिक अन्याय को संतुलित करने का संवैधानिक उपाय है। सदियों तक महिलाओं को राजनीति, सार्वजनिक जीवन और संपत्ति-संबंधी निर्णयों से दूर रखा गया। उन्हें परिवार और घर की सीमाओं तक बांध दिया गया। आरक्षण उसी असमानता को कम करने का प्रयास है। इसलिए यदि आरक्षण के नाम पर पुरुष नियंत्रण जारी रहता है, तो यह ऐतिहासिक अन्याय को बनाए रखने जैसा है। वास्तव में, “सरपंच पति” की संस्कृति आरक्षण की उपलब्धि को खोखला कर देती है।
इस संदर्भ में यह भी आवश्यक है कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के साथ बैठकों में अनिवार्य रूप से उन्हीं की उपस्थिति स्वीकार की जाए। प्रशासन को यह स्पष्ट नियम बनाना चाहिए कि किसी भी सरकारी कार्यवाही, बैठक, दस्तावेज़ी प्रक्रिया या निर्णय-निर्माण में प्रतिनिधि के स्थान पर कोई दूसरा व्यक्ति भाग नहीं ले सकता। यह केवल अनुशासन का प्रश्न नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का प्रश्न है। यदि अधिकारी स्वयं इस नियम का पालन करेंगे, तो गलत परंपराएं कमजोर होंगी। साथ ही, जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति पर जवाबदेही तय की जानी चाहिए, ताकि नाममात्र की भागीदारी का चलन रुके।
महिला सशक्तिकरण केवल भाषणों, नारों या प्रतीकात्मक समारोहों से नहीं आता। यह तब साकार होता है जब महिला को निर्णय लेने, बोलने, असहमति जताने और नेतृत्व करने की स्वतंत्रता मिले। यदि एक महिला सरपंच अपने गांव की योजनाओं, सड़कों, जलापूर्ति, स्कूलों और स्वच्छता पर निर्णय ले सकती है, तो वह केवल प्रतिनिधि नहीं, बल्कि परिवर्तन की वाहक बन सकती है। यह परिवर्तन तब और मजबूत होता है जब समाज उसके अधिकारों को स्वीकार करे। परिवार की भूमिका सहायक होनी चाहिए, नियंत्रक नहीं। पति सहयोगी हो सकता है, लेकिन प्रतिनिधि नहीं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि महिला प्रतिनिधियों को केवल चुनाव जिताने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें शासन की वास्तविक प्रक्रियाओं में दक्ष बनाया जाए। पंचायतों और नगर निकायों में महिला नेतृत्व के लिए विशेष क्षमता-विकास कार्यक्रम, विधिक साक्षरता अभियान, डिजिटल प्रशिक्षण और वित्तीय प्रबंधन शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। इसके साथ-साथ समाज में लैंगिक समानता की सोच विकसित करनी होगी। स्कूलों, कॉलेजों, मीडिया और स्थानीय मंचों पर यह संदेश लगातार जाना चाहिए कि महिला नेतृत्व सामान्य बात है, अपवाद नहीं।
इस मुद्दे पर मीडिया की भी जिम्मेदारी है। जब अखबारों और समाचार चैनलों में “सरपंच पति” जैसे शब्दों का प्रयोग होता है, तो केवल एक प्रथा का वर्णन नहीं होता, बल्कि वह एक सामाजिक बीमारी को भी उजागर करता है। मीडिया को इस विषय पर सतही रिपोर्टिंग के बजाय जिम्मेदार विमर्श खड़ा करना चाहिए। उसे यह दिखाना चाहिए कि कैसे महिलाएं प्रशासन में सक्रिय हो सकती हैं, किन बाधाओं का सामना कर रही हैं, और किन नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है। इससे जनमत बनेगा और सुधार की संभावना बढ़ेगी।
अंततः यह प्रश्न केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता का है। यदि निर्वाचित पदों का संचालन अनिर्वाचित लोग करने लगें, तो फिर जनता की इच्छा का क्या अर्थ रह जाता है? यदि महिला प्रतिनिधियों के अधिकार पुरुषों के हाथों में जाते रहें, तो समानता की संवैधानिक घोषणा केवल कागज़ी बनकर रह जाएगी। इसलिए समय आ गया है कि “सरपंच पति” और “पार्षद पति” जैसी प्रवृत्तियों पर कठोर रोक लगे। महिलाओं को केवल नाम की नहीं, वास्तविक शक्ति की भागीदारी मिले। तभी पंचायतें, नगर निकाय और स्थानीय शासन वास्तव में लोकतांत्रिक बनेंगे।
लोकतंत्र का असली परीक्षण चुनाव परिणामों में नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्र कार्यक्षमता में होता है। जब महिला सरपंच अपने अधिकारों का प्रयोग स्वयं करेगी, जब महिला पार्षद अपनी बात स्वयं रखेगी, जब प्रशासन उनके साथ सीधे संवाद करेगा, तभी हम कह सकेंगे कि भारत में महिला सशक्तिकरण ने वास्तविक आकार लिया है। अन्यथा यह केवल आरक्षण की औपचारिकता रह जाएगी। इसलिए अब समय है कि समाज, प्रशासन और राजनीतिक व्यवस्था मिलकर यह सुनिश्चित करें कि महिला प्रतिनिधियों के हक का उपयोग उनके पति नहीं, स्वयं महिलाएं करें। यही संविधान की भावना है, यही लोकतंत्र की मर्यादा है, और यही सामाजिक न्याय की सच्ची दिशा भी।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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