August 5, 2026 4:36 am

August 5, 2026 4:36 am

आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

जिनमें हो जाता है अंदाज-ए- खुदाई पैदा
हम ने देखा है कि वो बुत तोड़ दिए जाते हैं
किसी बड़ी घटनाक्रम को कवर करने के लिए जर्नलिज्म में एक चैप्टर होता है-व्हाट इज नैक्सट। यानी इसके बाद अब क्या होगा? जो भी संभावित सवाल पाठक के दिमाग में हो सकते हैं, उन सबके जवाब तलाशना। जिज्ञासा शांत करना। जैसे कि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के घोटाले में सीबीआई-अदालत ने कई अफसरों को जेल के अंदर ठूंस दिया। मामले में कई अन्य आईएएस भी आरोपी हैं। अब सवाल ये है कि जो बच गए हैं इन सबके साथ क्या होगा?क्या इनको भी जेल में जाना पडेगा या फिर यू ही बात बन जाएगी? मामला सुलट जाएगा? या इनको क्लीन चिट मिल जाएगी? वैसे हो तो बहुत लिया अब। रहने ही दिया जाए बाकियों को। क्यों ज्यादा रायता फैलाया जाए? हरियाणा में पहले ही अब अफसरशाही में डर का साम्राज्य उत्पन्न हो चुका है। रही सही कसर इन आरोपियों ने भी नहीं छोड़ी और कुछ ने तो ऊपर वालों के कान में भी ये हल्के से सरका दिया कि हमारे पास आप सबका भी भरपूर मसाला है। हमीं नहीं,बल्कि आपके भी कुछ जगह दस्तख हैं। ऐसा लगता है कि अब इस मामले का कुछ कुछ रूख बदल सा रहा है। हरियाणा में विपक्ष के एक तेजतर्रार नेता इस मसले पर सरकार और सीबीआई को घेरना चाह रहे थे। कहने लगे कि मुझे ऐसा लगता है कि इस मामले में कुछ डील हो गई है। जो कुछ होना था हो लिया। अब मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा। हमने इन नेता जी को कहा कि पहले ही इन अफसरों के साथ बहुत हो लिया। जो बचे हुए हैं, वो भी डर के साए में सांस ले रहे हैं। अत: आपको हरियाणा के हित में-मानवता के हित में अपने बढे हुए कदमों को वापस खींच लेना चाहिए। अब इस मामले में प्रैस कांफ्रेस नहीं करनी चाहिए। सरकार को चक्रव्यूह में हरगिज नहीं फंसाना चाहिए। हो लिया.. बहुत हो लिया। कोर्ट-कचहरी देख लेगी कि किस के साथ क्या करना है और क्या नहीं। आप को इन सब पर अब रहम करना चाहिए। पहले ही ये परमात्मा के सताए हुए लोग हैं। इन को ओर नहीं सताना चाहिए। ऐसा लगता है कि उनको भी ये सलाह जंच गई है और उन्होंने अपने बढे कदम वापस खींच लिए हैं। म्यान में तलवार रख दी है। वो एक अलग मसला है कि इन अफसरों में से कुछ ने अपनी चलती में कसर नहीं छोड़ी थी। कुछ तो ऐसे थे जो कि आदमी को आदमी नहीं समझ रहे थे। मेरे पास इन अफसरों के कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जिस से ये साबित होता है कि ये कितने हवा में थे। तौबा..तौबा। बस पूछिए मत। एक तो ऐसा किस्सा है कि अपने एक अधनीस्थ अदने से व्यक्ति को एक अधिकारी ने पावर के नशे में जानबूझकर इतना प्रताड़ित किया कि वो डिप्रैशन में चला गया और आत्महत्या करने तक के विचार उसके दिलो दिमाग में आने लगे। तब मैंने उन व्यक्ति को दिलासा देते हुए कहा था कि ईश्वर अपने तरीके से न्याय करता है। आप ईश्वर पर भरोसा रखिए.. जो ये अधिकारी आज आपको बेरहमी से सता रहा है, समय इनके साथ इंसाफ करेगा। जरूर करेगा। तब वो व्यक्ति कहने लगे कि ऐसा कुछ नहीं होता और आप ये सब मुझे तसल्ली देने के लिए ही कह रहे हैं। मैंने उनको कहा कि आप मेरा यकींन करें। आप भी यहीं हैं और मैं भी यहीं हंू। एक दिन ऐसा आएगा इनको अपनी करनी का फल यहीं भुगतना पड़ेगा। खैर मुझे ये तो पता था कि परमात्मा किसी दिन इंसाफ करेगा, लेकिन ये नहीं पता था कि इतनी जल्दी करेगा। और आखिरकार वो दिन आया कि जब ये अधिकारी कानून के फंदे में फंसे। हालांकि गिरफ्तार तो नहीं हुए,लेकिन जिस तरह से अब इनकी जिंदगी कट रही है या तो ये जानते हैं या फिर इनका खुदा जानता है। फिर भी मेरी इन से पूरी पूरी सहानुभूति है। पावर में रहते हुए इन्होंने जिन जिन का जो भी नुकसान किया मैं ईश्वर से यही कहता हंू कि वो सब इनको माफ कर दें। जैसा कि जब जीसस क्राइस्ट को फांसी पर लटकाया जा रहा था तो इस अपराध में शामिल लोगों के लिए उन्होंने कहा था-ईश्वर इनको माफ कर देना, क्योंकि इनको ये नहीं पता कि ये क्या कर रहे हैं। ठीक इसी तरह से मेरा भी कहना है कि इनको शायद खुद को खुदा होने का इतना वहम हो गया था कि…। इंसान को हमेशा ये याद रखना चाहिए कि वक्त की ये प्रकृति है कि ये जैसा भी हो बदलता जरूर है। एक लम्हे में व्यक्ति आसमान से जमीन पर आ जाता है और जमीन से आसमान में पहुंच जाता है। ऐसे अनंत उदाहरण हैं और राजनीति में तो ऐसा होता रहता है। अपने हरियाणा के ही दो ताजे और जीवंत उदाहरण मनोहरलाल खटटर और नायब सिंह सैनी को ही देख लो। पहले कहां थे और अब कहां पहुंचे हुए हैं। सो कभी गुरूर-घमंड नहीं करना चाहिए। इतिहास से हमेशा सीखना चाहिए। ये साल 1985 का किस्सा है। पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक ने एक फरमान जारी कर औरतों के साड़ी पहनने पर पाबंदी लगा दी थी। पाकिस्तान की मशूहर गायिका इकबाल बानो ने करीब 50 हजार लोगों के सामने फैज अहमद फैज की ये चर्चित नज्म गाई थी कि.. सब ताजा उछाले जाएंगे,सब तख्त गिराए जाएंगे। ये नज्म कुछ यू है..
हम देखेंगे…लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है,जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ओ सितम के कोह ए गिरां, रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव तले,जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हम के सिर ऊपर,जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से,सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम,मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का, उठेगा अनल हक का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खल्क-ए-खुदा जो मैं भी हूं और तुम भी हो

विमान क्रैश में गई थी जिया उल हक की जान
जिन जिया उल हल की एक जमाने में पाकिस्तान में तूती बोलती थी उन्हीं जिया का विमान संदेहपूर्ण हालात में क्रैश हो गया था। 17 अगस्त,1988 को पाकिस्तान के बहावलपुर एयरबेस पर दोपहर 3 बज कर 46 मिनट पर जब अमेरिका में बने हरकुलीस सी-130 विमान ने टेक आफ के लिए दौड़ना शुरू किया तब उसमें बादशाह इस्टाइल में बैठे जिया को ये दूर दूर तक भी अहसास नहीं था कि ये उनकी आखिरी उड़ान साबित होने जा रही है। इसी विमान में पाकिस्तान ज्वाइंट चीफ आफ स्टाफ के प्रमुख जनरल अख्तर अब्दुल रहमान,पाकिस्तान में अमेरिका के राजदूत अर्नाल्ड रफेल,पाकिस्तान में अमरीकी एड मिशन के प्रमुख जनरल हरबर्ट वासम और पाकिस्तानी सेना के अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। जनरल जिया अमरीकी टैंक एमआई अब्राम्स का परीक्षण देखने जा रहे थे।वो शुरू में वहां नहीं जाना चाहते थे। पाकिस्तानी सेना के ही कुछ अधिकारियों ने उन पर बार बार जोर डाला कि वो जरूर जाएं। जिया उल हक को कुछ अनहोनी की आशंका शायद पहले से होने लगी थी। इसलिए उन्होंने अपने नजदीकी लोगों से कहा भी था कि पता नहीं क्यों ये अफसर मुझे रोज फोन कर जोर डाल रहे हैं कि इस परीक्षण में मेरा पहुंचना निहायत ही जरूरी है,जबकि वहां पर डीजी मिलट्री आपरेशन, या डीजी टेक्निकल ट्रेनिंग या वाइस चीफ आफ आर्मी स्टाफ भी जा सकते हैं। इस हरकुलिस सी-130 विमान के काकपिट की कमान संभाली हुई थी विंग कमांडर माशूद हसन ने। उनको इस जिम्मेदारी के लिए खुद जिया उल हक ने ही चुना था। जैसे ही विमान पूरी तरह से हवा में आया बहावलपुर के कंट्रोल टावर ने विंग कमांडर हसन से एक रूटीन सवाल पूछा-अपनी पोजीशन बताइए। माशूद हसन ने जवाब दिया पाक वन, स्टैंड बाय। इसके बाद हसन चुप हो गए। कंट्रोल टावर की तरफ से हसन से दोबारा सम्पर्क करने की कोशिश की गई,लेकिन सब बेकार। टेक आफ करने के कुछ मिनटों के अंदर पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण विमान लापता था। इसी बीच एयरबेस के करीब 18 किलोमीटर दूर कुछ गांव वालों ने देखा कि एक विमान रोलर कोस्टर अंदाज में हवा में कभी उऊपर तो कभी नीचे जा रहा है। विमान जल्द ही रेगिस्तान में नाक के बल गिरा और चारों तरफ आग के गोले में बदल गया। समय था 3 बज कर 51 मिनट। पांच मिनट में ही सब जमींदोज हो गए। इस हादसे के कुछ ही मिनटों में दुनिया भर में ये खबर आ गई कि जिया उल हक का विमान क्रैश हो गया है। विमान में मौजूद सभी 30 लोग मारे गए। इस विमान क्रैश की जांच के बारे में बीबीसी ने अपनी विवेचना में विस्तार से बताया है कि अमेरिकी खुफिया एजैंसी सीआईए,रूस की ख्ुाफिया एजैंसी केजीबी और भारतीय एजैंसी रा पर भी शक किया गया। एक थ्योरी ये है कि जिया उल हक के साथी फौजी अफसरों ने ये सारी साजिश रची। विमान में पहले से बम रख दिया गया था। ये भी एक थ्योरी है कि जिया के विमान में आम की पेटियों के साथ वी एक्स नर्व गैस रख दी गई थी,जिस से पायलट बेहोश हो गया और विमान से उसका नियंत्रण खत्म हो गया।

सात सीनियर अफसरों को नजरअंदाज कर चीफ बने थे जिया
रोचक तथ्य ये है कि जिया उल हक ने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुटटो का का तख्ता पलट कर सत्ता हथियाई थी। पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार को हटा कर खुद सत्ता के शिखर पर जा बैठे थे। इन भुटटो ने ही सात वरिष्ठ लेफिटनेंट जनरलों को नजरअंदाज कर जिया उल हक को चीफ आफ आर्मी स्टाफ नियुक्त किया था। ऐसा कहा जाता है कि जिया उल हक को न केवल कम महत्वकांक्षी,बल्कि बेहद आज्ञाकारी माना जाता था। एक दफा भुटटो को उनके एक नजदीकी ने जिया उल हक से सचेत रहने की सलाह भी दी थी,लेकिन उन्होंने उसे मजाक में उड़ा दिया। भुटटो ने कहा था कि जिया उल हक को परखने के लिए वो उनको कई दफा सार्वजनिक तौर पर अपमानित करके भी जांच चुके हैं। जिया उल हक अपने अपमान पर हरदम मुस्कराते रहते थे और कभी प्रतिरोध करके ये दिखाने की कोशिश नहीं कि उनमें रीढ की हडडी भी है। इन्हीं जिया उल हक ने भुटटो को गिरफतार करवाया और उन पर एक राजनीतिक हत्या के मामले में साजिश रचने का मुकदमा चलाया। भुटटो को 4 अप्रैल,1979 में रावलपिंडी की जेल में फांसी दी गई थी। जब अदालत ने भुटटो को फांसी की सजा सुनाई तो दुनिया भर के बड़े नेताओं ने उन की फांसी की सजा माफ करने की अपील की,लेकिन जिया ने उन सब को ठुकरा दिया था।

धनखड़ की पुस्तक
भाजपा के वरिष्ठ नेता ओमप्रकाश धनखड़ अपनी पुस्तक
श्रेष्ठ की अभिव्यक्ति हो पर पंचकूला में पत्रकारों से चर्चा कर रहे थे। प्रभात प्रकाशन की ओर से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 750 रूपए है। पुस्तक में जीवन जीने के सूत्र बताए गए हैं। धनखड़ ने जंतर-मंतर पर हुए हालिया आंदोलन के बारे में भी खुल कर चर्चा की। उनका मानना था कि जिन युवाओं ने सरकार और प्रधानमंत्री के बारे में अपशब्द कहें हैं उनको हमारा समाज स्वीकार नहीं करेगा। धीरे धीरे ऐसे सभी लोग हाशिए पर चले जाएंगे। धनखड़ ने इस पर जरूर सहमति जताई कि लोकतंत्र में असहमित होनी चाहिए। विरोध होना चाहिए,लेकिन शांतिपूर्वक। हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। इस चर्चा में चंद पत्रकार ही पहुंचे हुए थे। एक तो पहले से ही कम पत्रकारों को न्यौता दिया गया था। उस पर हम पत्रकार भी अब किसी के यहां जाने में नफा नुकसान ज्यादा तौलने लगे हैं। अगर कोई बड़ी कुर्सी पर होता है तो अक्सर वहां बिना बुलाए भी हम बेशर्मी से उपस्थित हो जाते हैं। इस हालात पर शेर है..
मेरी जुबान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हंू,मेरा एतबार मत करना

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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