बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
कैथल, 7 अगस्त 2026। हरियाणा के कैथल जिले के गांव नरड़ के वीर सपूत स्वतंत्रता सेनानी मनीराम गोयत उन महान देशभक्तों में शामिल हैं, जिन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज (आईएनए) में शामिल होकर भारत की आजादी के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए कई मोर्चों पर संघर्ष किया, अनेक बार जेल की यातनाएं झेलीं और काला पानी तक की सजा भुगती, लेकिन राष्ट्रभक्ति के मार्ग से कभी पीछे नहीं हटे। आज भी जिले में उनका नाम गर्व और सम्मान के साथ लिया जाता है।
परिवार का कहना है कि आजादी के 79 वर्ष बाद भी स्वतंत्रता सेनानी मनीराम गोयत के संघर्ष और योगदान को इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं। परिजनों के अनुसार, पिछले करीब 45 वर्षों में लगभग 30 बार विभिन्न विभागों और अभिलेखागार के लिए उनसे दस्तावेज और रिकॉर्ड मांगे गए, लेकिन आज तक उनके जीवन और बलिदान का समुचित इतिहास सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं हो पाया।
20 वर्ष की आयु में सेना में हुए भर्ती
मनीराम गोयत का जन्म 6 जून 1921 को कैथल जिले के गांव नरड़ में हुआ था। देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने मात्र 20 वर्ष की आयु में वर्ष 1941 में सेना जॉइन कर ली। उन्हें सिपाही नंबर-50733 के रूप में नियुक्ति मिली और 13 हांगकांग-सिंगापुर रॉयल तोपखाना में तैनाती दी गई। बाद में उन्होंने गांधी ब्रिगेड की 14वीं कंपनी, नसून कैंप (सिंगापुर) में भी सेवाएं दीं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में लड़ी आजादी की लड़ाई
परिजनों के अनुसार 2 जुलाई 1943 को मनीराम गोयत आजाद हिंद फौज में शामिल हुए। इसके बाद उन्होंने जापान सहित कई मोर्चों पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में लड़ाइयों में हिस्सा लिया। उस दौर में नेताजी नियमित रूप से सैनिक शिविरों में पहुंचकर अपने ऐतिहासिक नारे “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” के माध्यम से सैनिकों का उत्साहवर्धन करते थे। मनीराम गोयत भी उन जांबाज सैनिकों में शामिल थे, जिन्होंने इस आह्वान को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।
जापान, रंगून और काला पानी तक झेली यातनाएं
मनीराम गोयत के पुत्र रमेश गोयत ने बताया कि उनके पिता ने आजाद हिंद फौज में रहते हुए कई बार गिरफ्तारी दी। उन्हें जापान, रंगून, सिओल जेल, गिग्गरगिछा जेल तथा काला पानी जैसी कुख्यात जेलों में अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और देशसेवा का मार्ग नहीं छोड़ा।

भारत सरकार ने ताम्रपत्र और पेंशन से किया सम्मानित
देश की आजादी के बाद भारत सरकार ने उनके अद्वितीय योगदान को सम्मान देते हुए वर्ष 1972 में उन्हें ताम्रपत्र प्रदान किया और स्वतंत्रता सेनानी पेंशन से सम्मानित किया। संयुक्त पंजाब के समय उन्होंने पंजाब पुलिस में सेवाएं दीं तथा वर्ष 1966 में हरियाणा गठन के बाद हरियाणा पुलिस में कार्यरत रहे। वर्ष 1972 में वे हरियाणा पुलिस से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद 28 दिसंबर 1978 को उनका निधन हो गया।

गांव में स्कूल, लाइब्रेरी और सड़क उनके नाम पर
हरियाणा सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी मनीराम गोयत के सम्मान में गांव नरड़ के सरकारी स्कूल, लाइब्रेरी तथा करनाल रोड से गांव नरड़ जाने वाली सड़क का नाम उनके नाम पर रखा है। यह सड़क आज “स्वतंत्रता सेनानी मनीराम गोयत मार्ग” के नाम से जानी जाती है और उनके राष्ट्रप्रेम एवं बलिदान की स्थायी पहचान बनी हुई है।

परिवार ने इतिहास में उचित स्थान देने की उठाई मांग
परिवार का कहना है कि मनीराम गोयत का जीवन देशभक्ति, त्याग और बलिदान की मिसाल है। उनका मानना है कि उनके संघर्ष और योगदान को स्कूलों के पाठ्यक्रम, सरकारी अभिलेखों और इतिहास की पुस्तकों में उचित स्थान मिलना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां ऐसे गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और राष्ट्रप्रेम से प्रेरणा ले सकें।
मनीराम गोयत का जीवन इस बात का प्रमाण है कि भारत की आजादी केवल बड़े नेताओं के प्रयासों से नहीं, बल्कि हजारों ऐसे वीर सपूतों के त्याग, संघर्ष और बलिदान से मिली, जिन्होंने राष्ट्रहित को अपने जीवन से भी ऊपर रखा। उनकी वीरगाथा आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।













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