October 28, 2026 10:25 am

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चंडीगढ़ मे सीबीआई रेड के बाद रणजीत मिश्रा का बड़ा दावा, 1000 करोड़ के आउटसोर्सिंग भर्ती घोटाले की जांच में वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका खंगालने की मांग

आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती और वेतन भुगतान में कथित अनियमितताओं का मामला गरमाया; एक ही परिवार से जुड़ी चार कंपनियों पर उठाए सवाल, सालाना 200 करोड़ रुपये के टेंडरों की जांच की मांग

बाबूगिरी न्यूज़
चंडीगढ़, 17 अक्तूबर। चंडीगढ़ प्रशासन और नगर निगम में आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती, तैनाती और वेतन भुगतान से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला लगातार तूल पकड़ रहा है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की छापेमारी के बाद इस मामले में शिकायतकर्ता एवं एजुकेशन डिपार्टमेंट ग्रुप-डी यूनियन तथा यूटी चंडीगढ़ सबऑर्डिनेट सर्विस फेडरेशन के प्रधान रणजीत मिश्रा ने जांच का दायरा बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने चंडीगढ़ प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान करीब 1000 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जांच केवल आउटसोर्सिंग कंपनियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में जिम्मेदार पदों पर तैनात अधिकारियों की भूमिका की भी गहन पड़ताल होनी चाहिए।
रणजीत मिश्रा ने आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया, विभिन्न विभागों में उनकी तैनाती, ठेकेदारों को किए जाने वाले भुगतान और टेंडर आवंटन की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि एक ही परिवार से जुड़ी चार कंपनियों के नेटवर्क की जांच से मामले की कई अहम कड़ियां सामने आ सकती हैं। उनके अनुसार, इन कंपनियों के माध्यम से हासिल किए गए ठेकों और प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच करना जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी ठेकों के आवंटन और उनके क्रियान्वयन में निर्धारित नियमों का पालन किया गया था या नहीं।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और कथित अनियमितताओं में संबंधित कंपनियों अथवा अधिकारियों की भूमिका का निर्धारण जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही हो सकेगा।

सालाना 200 करोड़ रुपये के टेंडर जांच के दायरे में लाने की मांग
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रणजीत मिश्रा ने आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती और तैनाती से जुड़े करीब 200 करोड़ रुपये सालाना के टेंडरों पर सवाल उठाए। उन्होंने मांग की कि इन टेंडरों की शुरुआत से लेकर उनके आवंटन, कर्मचारियों की तैनाती और भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया की जांच की जाए।
मिश्रा के अनुसार, जांच एजेंसियों को यह पता लगाना चाहिए कि विभिन्न विभागों में आउटसोर्स कर्मचारियों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों ने टेंडर हासिल करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए थे। कंपनियों की पात्रता, अनुभव प्रमाणपत्र, कार्यादेश, कर्मचारियों की वास्तविक संख्या और वेतन भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड का मिलान भी किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि किसी कंपनी ने टेंडर हासिल करने के लिए गलत जानकारी या संदिग्ध दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। इसी तरह, यदि किसी विभाग में कर्मचारियों की वास्तविक तैनाती और बिलों में दर्शाई गई संख्या के बीच अंतर पाया जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सरकारी खजाने से जारी होने वाली राशि के बदले वास्तव में कितने कर्मचारी तैनात किए गए और उनके वेतन का भुगतान किस प्रक्रिया के तहत किया गया। इसका जवाब संबंधित विभागों के रिकॉर्ड, कंपनियों के बिलों और बैंकिंग लेनदेन की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा।

एक ही परिवार से जुड़ी चार कंपनियों के संबंधों की जांच की मांग
रणजीत मिश्रा ने दावा किया कि एक ही परिवार से जुड़ी चार कंपनियों के आपसी संबंधों की जांच की जानी चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि कंपनियों के बीच संबंधों और टेंडर हासिल करने के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों की गहन पड़ताल से पूरे मामले की महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है।
इस संबंध में जांच एजेंसियों से यह पता लगाने की मांग की गई कि संबंधित कंपनियों के संचालकों, निदेशकों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के बीच क्या संबंध हैं। साथ ही, यह भी जांचा जाना चाहिए कि क्या इन कंपनियों ने अलग-अलग टेंडरों में भाग लेते समय अपनी पात्रता और अनुभव से संबंधित सभी जानकारियां नियमों के अनुरूप प्रस्तुत की थीं।
टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कंपनियों की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों, तकनीकी पात्रता, वित्तीय प्रस्तावों और कार्यादेशों का परीक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, एक ही परिवार से जुड़े होने या आपस में कारोबारी संबंध होने मात्र से किसी कंपनी की गैरकानूनी गतिविधि साबित नहीं होती। इसके लिए जांच एजेंसियों को दस्तावेजी साक्ष्यों और अन्य तथ्यों के आधार पर किसी संभावित अनियमितता का पता लगाना होगा।

 

वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी हो जांच
रणजीत मिश्रा ने मामले में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग करते हुए कहा कि सरकारी ठेकों की प्रक्रिया में कई स्तरों पर निर्णय लिए जाते हैं। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि टेंडर तैयार करने, तकनीकी और वित्तीय प्रस्तावों का मूल्यांकन करने, कंपनियों को काम सौंपने तथा भुगतान मंजूर करने की प्रक्रिया में किन अधिकारियों की जिम्मेदारी थी।
उन्होंने कहा कि यदि जांच के दौरान किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है या उसके खिलाफ अनियमितता में संलिप्तता के प्रमाण मिलते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
इस मांग के तहत टेंडर से संबंधित फाइलों, विभागीय टिप्पणियों, स्वीकृति आदेशों, भुगतान मंजूरियों और अन्य सरकारी रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि संबंधित निर्णय निर्धारित नियमों के अनुसार लिए गए थे या उनमें किसी प्रकार की अनियमितता हुई थी।
मिश्रा ने स्पष्ट रूप से व्यापक और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया। हालांकि, फिलहाल किसी वरिष्ठ अधिकारी की संलिप्तता को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यह जांच एजेंसियों का काम है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधित व्यक्तियों की भूमिका निर्धारित करें।
सीबीआई की छापेमारी से बढ़ी मामले में हलचल
मामले में सीबीआई की ओर से एफआईआर दर्ज किए जाने और चंडीगढ़ में चार ठिकानों पर छापेमारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। छापेमारी के दौरान दस्तावेजों के साथ लैपटॉप और कंप्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए जाने की भी जानकारी दी गई है।

जांच के इस चरण में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में मौजूद डिजिटल रिकॉर्ड, ई-मेल, टेंडर से संबंधित फाइलें, भुगतान का विवरण और अन्य दस्तावेज महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। इनके विश्लेषण से संबंधित कंपनियों के कामकाज, विभागों के साथ हुए पत्राचार और सरकारी ठेकों से जुड़े लेनदेन के बारे में जानकारी मिल सकती है।
इसके अलावा, कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित रिकॉर्ड और वेतन भुगतान के दस्तावेजों का वास्तविक स्थिति से मिलान भी जांच का अहम हिस्सा हो सकता है।
सीबीआई की कार्रवाई के बाद अब इस बात पर नजर रहेगी कि जांच में कौन-कौन से तथ्य सामने आते हैं और क्या जांच एजेंसी को कथित वित्तीय अनियमितताओं के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं।
यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि छापेमारी या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जब्ती अपने आप में किसी व्यक्ति अथवा कंपनी के दोषी होने का प्रमाण नहीं है। अंतिम निष्कर्ष जांच में सामने आने वाले तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

1000 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं का दावा, राशि की पुष्टि जरूरी
रणजीत मिश्रा ने करीब 1000 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच की मांग उठाई है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सीबीआई की जांच से मामले की पूरी तस्वीर सामने आएगी और यदि सरकारी धन के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होगी।
वहीं, आउटसोर्स कर्मचारियों की तैनाती से जुड़े करीब 200 करोड़ रुपये सालाना के टेंडरों का उल्लेख भी किया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 1000 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं का आकलन किस अवधि के आधार पर किया गया है और इसका सालाना टेंडर राशि से क्या संबंध है।
इस संबंध में उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन दोनों राशियों के बीच प्रत्यक्ष संबंध की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। इसलिए जांच में संबंधित अवधि के टेंडरों, वास्तविक भुगतान, कंपनियों के बिलों और कथित वित्तीय नुकसान का अलग-अलग आकलन महत्वपूर्ण होगा।
यदि जांच में किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता सामने आती है, तो उसकी वास्तविक राशि और जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए दस्तावेजी साक्ष्यों का सत्यापन आवश्यक होगा।

मार्च से विजिलेंस के पास शिकायत लंबित रहने का दावा
रणजीत मिश्रा ने यह भी दावा किया कि उन्होंने इस मामले को लेकर मार्च महीने से विजिलेंस के समक्ष शिकायत दी हुई थी, लेकिन उस पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने शिकायत के बाद जांच एजेंसियों की कार्रवाई शुरू होने का उल्लेख करते हुए मामले की विस्तृत जांच की मांग दोहराई।
इस दावे के संबंध में शिकायत की तारीख, उसमें लगाए गए आरोपों, संबंधित विभाग की ओर से की गई कार्रवाई और शिकायत पर हुई प्रगति की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड से किया जाना आवश्यक है।
यदि शिकायत लंबे समय से लंबित थी, तो यह भी जांच का विषय हो सकता है कि संबंधित अधिकारियों ने उस पर क्या कार्रवाई की और शिकायत में उठाए गए मुद्दों की प्रारंभिक जांच की गई थी या नहीं।
हालांकि, शिकायत पर कार्रवाई में देरी के संबंध में भी संबंधित दस्तावेजों और विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

जांच के निष्कर्षों पर टिकी निगाहें
आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती और वेतन भुगतान से जुड़ा यह मामला चंडीगढ़ प्रशासन की ठेका व्यवस्था, टेंडर प्रक्रिया और सरकारी धन के इस्तेमाल से संबंधित महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। शिकायतकर्ता की ओर से उठाए गए मुद्दों के मद्देनजर जांच में कंपनियों के आपसी संबंधों, टेंडर हासिल करने की प्रक्रिया, कर्मचारियों की वास्तविक तैनाती और भुगतान के रिकॉर्ड की पड़ताल अहम होगी।
इसके साथ ही, यदि किसी विभागीय अधिकारी की भूमिका सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी भी साक्ष्यों के आधार पर निर्धारित करनी होगी।
रणजीत मिश्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मांग की कि जांच को व्यापक बनाया जाए और मामले में किसी भी स्तर पर अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो।
फिलहाल, करीब 1000 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं, चार कंपनियों के नेटवर्क और वरिष्ठ अधिकारियों की संभावित भूमिका से जुड़े आरोप जांच के दायरे में उठाए गए सवाल हैं। इन आरोपों की पुष्टि, कथित वित्तीय नुकसान की वास्तविक राशि और किसी व्यक्ति या कंपनी की जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच के निष्कर्षों तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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