बाबूगिरी न्यूज़
चंडीगढ़, 22 अक्टूबर, 2026: हरियाणा के पूर्व वित्त मंत्री एवं इंडियन नेशनल लोकदल के राष्ट्रीय संरक्षक प्रो. संपत सिंह ने हरियाणा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग द्वारा इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को 25 वर्षों के लिए समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस देना राज्य और केंद्र की भाजपा सरकारों द्वारा सुनियोजित तरीके से थोपे गए जनविरोधी फैसले का परिणाम है। उन्होंने आरोप लगाया कि नियामक आयोग ने अपने वैधानिक दायित्वों से मुंह मोड़ लिया है और हरियाणा सरकार की कठपुतली बनकर काम कर रहा है, ताकि मुनाफे का निजीकरण किया जा सके और घाटे का बोझ जनता पर डाला जा सके। अब राज्य सरकार नियामक आयोग की आड़ लेकर अपनी जिम्मेदारी से बच रही है।
सरकार के दोहरे मापदंडों को उजागर करते हुए प्रो. सिंह ने ऊर्जा मंत्री के इस दावे को महज तकनीकी बहानेबाजी करार दिया कि सरकार इस आदेश के खिलाफ अपील दायर करेगी। उन्होंने मांग की कि मुख्यमंत्री तत्काल विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 108 का इस्तेमाल करते हुए जनहित में स्पष्ट लिखित नीतिगत निर्देश जारी करें, ताकि समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस देने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जा सके।
प्रो. सिंह ने कहा कि यह प्रयोग कोई नई पहल नहीं, बल्कि दशकों पुराना वैचारिक आग्रह है। वर्ष 1998 में विश्व बैंक की 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता योजना के साथ जुड़ी शर्तों के तहत सरकार पर उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम के निजीकरण का दबाव बनाया गया था। लेकिन वर्ष 1999 में इनेलो सरकार ने इस निर्णय को पलट दिया, क्योंकि उसका मानना था कि सार्वजनिक उपक्रमों का उद्देश्य जनता की सेवा करना होना चाहिए, न कि निजी कंपनियों को मुनाफा पहुंचाना। इसके बाद वर्ष 2000 में डीएलएफ और इंडिया पावर कॉरपोरेशन प्राइवेट लिमिटेड ने भी आवेदन किए। इनमें से कुछ ने सरकार का रुख देखकर अपने कदम पीछे खींच लिए, जबकि अन्य के प्रस्तावों को मनमाने ढंग से लाभदायक उपभोक्ताओं को चुनने और तकनीकी कमियों के कारण नियामक आयोग ने अस्वीकार कर दिया।
प्रो. सिंह ने नियामक आयोग के फैसले को वित्तीय अनियमितताओं का उदाहरण बताते हुए कहा कि आयोग ने 1 करोड़ रुपये की पूंजी वाली एक नवगठित कंपनी को 4,700 करोड़ रुपये की परियोजना सौंपने का रास्ता साफ कर दिया। इसके लिए कंपनी का काल्पनिक बाजार मूल्य 4,085 करोड़ रुपये स्वीकार किया गया, जबकि उसका वास्तविक ऑडिटेड बही मूल्य केवल 95 करोड़ रुपये था। उन्होंने सवाल उठाया कि हरियाणा के बिजली वितरण नेटवर्क की इस बहुमूल्य परिसंपत्ति को निजी कंपनी के हवाले करने का फैसला आखिर किस आधार पर लिया गया।
उन्होंने कहा कि समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस का यह निर्णय राज्य के बिजली निगमों के कर्मचारियों, अभियंताओं और अन्य हितधारकों के लिए गंभीर परिचालन एवं वित्तीय संकट पैदा करेगा तथा सार्वजनिक बिजली वितरण व्यवस्था के अस्तित्व पर ही खतरा खड़ा कर देगा। लाभ कमाने वाले व्यावसायिक उपभोक्ताओं से होने वाली आय निजी कंपनियों के हाथों में चली जाएगी, जिससे दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड जैसे सार्वजनिक निगम आर्थिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। इसका सीधा असर बिजली अभियंताओं और कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा तथा सेवा स्थिरता पर पड़ेगा। साथ ही, किसानों और ग्रामीण उपभोक्ताओं पर भारी वित्तीय बोझ डाल दिया जाएगा।
प्रो. सिंह ने कहा कि यह आदेश चुनिंदा लाभदायक उपभोक्ताओं को अपने पक्ष में करने की नीति को बढ़ावा देता है। गुरुग्राम, दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम के कुल राजस्व का 42.98 प्रतिशत यानी 9,493 करोड़ रुपये उत्पन्न करता है, जबकि वहां वितरण हानि मात्र 4.7 प्रतिशत है। इसके बावजूद निजी लाइसेंसधारी पहले दो वर्षों में गुरुग्राम शहर में लगभग कोई निवेश करने की योजना नहीं रखता, जबकि ग्रामीण नूंह क्षेत्र के लिए मात्र 304 करोड़ रुपये यानी कुल निवेश का 6.5 प्रतिशत निर्धारित किया गया है।
उन्होंने चेतावनी दी कि इससे क्रॉस-सब्सिडी का एक गंभीर वित्तीय संकट पैदा होगा। आयोग के आदेश के पैरा 13.10 के तहत, एक बार अधिक भुगतान करने वाले कॉरपोरेट उपभोक्ताओं के निजी कंपनी की ओर चले जाने पर उनसे कानूनी रूप से क्रॉस-सब्सिडी अधिभार वसूलना संभव नहीं रहेगा। इसके परिणामस्वरूप दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम को प्रतिवर्ष लगभग 3,000 करोड़ रुपये की क्रॉस-सब्सिडी हानि और संभावित रूप से 4,272 करोड़ रुपये तक के राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, 3,563 करोड़ रुपये का बकाया एफएसए और बिजली नेटवर्क की स्थायी लागत का बोझ किसानों, छोटे दुकानदारों और घरेलू उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाएगा। अंततः करदाताओं, किसानों, ग्रामीण परिवारों और गरीब उपभोक्ताओं को निजी कंपनियों के मुनाफे की रक्षा करने की कीमत चुकानी पड़ेगी, जबकि वास्तव में सरकारी सहायता के सबसे अधिक जरूरतमंद यही वर्ग हैं।
प्रो. सिंह ने कहा कि यह फैसला उन सार्वजनिक बलिदानों के साथ विश्वासघात है, जो बिजली वितरण निगमों को आर्थिक संकट से उबारने के लिए किए गए थे। उदय योजना के तहत राज्य सरकार ने बिजली वितरण निगमों के 75 प्रतिशत ऋण का बोझ अपने ऊपर लिया, जिसके लिए 25,950 करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी किए गए। इसके अतिरिक्त, 3,352 करोड़ रुपये की इक्विटी पूंजी उपलब्ध कराई गई, गुरुग्राम स्मार्ट ग्रिड पर 1,608 करोड़ रुपये खर्च किए गए और 16,019 मेगावाट की क्षमता को सहारा देने वाले राज्य के बिजली बुनियादी ढांचे में 44,742 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने सार्वजनिक बिजली निगमों की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए जनता के धन का इस्तेमाल किया, लेकिन अब उन्हीं निगमों को कमजोर करके उनके अस्तित्व को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
बिजली अभियंताओं, कर्मचारी संगठनों और किसान संगठनों के प्रति पूर्ण एकजुटता व्यक्त करते हुए प्रो. सिंह ने मुख्यमंत्री से मांग की कि निजी कंपनी को दिया गया यह लाइसेंस रद्द करने के लिए विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 108 के तहत तत्काल स्पष्ट नीतिगत निर्देश जारी किए जाएं। उन्होंने सरकार से यह भी आग्रह किया कि संकट टालने के लिए संयुक्त संघर्ष मोर्चा के साथ तत्काल सार्थक बातचीत शुरू की जाए।
प्रो. सिंह ने चेतावनी दी कि सार्वजनिक बिजली व्यवस्था की रक्षा के लिए यह संघर्ष पूरी कानूनी, तकनीकी और राजनीतिक ताकत के साथ अदालतों से लेकर सड़कों तक लड़ा जाएगा।













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