August 28, 2026 10:03 am

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परंपरा, मनोरंजन के साथ सेहत का भी सुख; मकर संक्रांति पर पतंगबाजी: डॉ. विजय गर्ग

पतंग उड़ाना भारतीय संस्कृति की उन जीवंत परंपराओं में शामिल है, जो सदियों से समय के साथ उड़ान भरती आ रही हैं। मकर संक्रांति के साथ जुड़ी पतंगबाजी केवल उत्सव और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। खुले आकाश के नीचे सूर्य की किरणों के साथ पतंग उड़ाना जीवन में ऊर्जा, सकारात्मकता और नए दृष्टिकोण का संचार करता है।
हर वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाने वाला मकर संक्रांति पर्व सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक है। ‘मकर’ एक राशि है और ‘संक्रांति’ का अर्थ है संक्रमण—अर्थात सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश। हिंदू परंपरा में सूर्य को प्रकाश, शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना गया है, इसलिए इस दिन का विशेष आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है।
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का लाभ
सर्दियों में लोग प्रायः घरों में सीमित रह जाते हैं, लेकिन मकर संक्रांति के आसपास मिलने वाली धूप कई मौसमी बीमारियों से बचाव में सहायक होती है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि उत्तरायण की सूर्य किरणें सर्दी, खांसी और फ्लू जैसी समस्याओं को कम करती हैं। अथर्ववेद में भी सूर्य को औषधियों का स्रोत माना गया है, जो अपनी रश्मियों से समस्त जीवों का स्वास्थ्य उत्तम रखता है।
हालिया शोधों के अनुसार भारत में लगभग 80 प्रतिशत लोगों में विटामिन-डी की कमी पाई गई है। दिल्ली जैसे महानगरों में तो 90 से 97 प्रतिशत स्कूली बच्चों में इसकी कमी सामने आई है, जबकि भारत सूर्यप्रकाश से भरपूर देश है। ऐसे में पतंग उड़ाना बच्चों और बड़ों—दोनों को प्राकृतिक रूप से धूप लेने का अवसर देता है।
पतंग उड़ाते समय हाथ, कंधे, कमर और आंखों की अच्छी कसरत होती है। ऊपर की ओर देखने और गहरी सांस लेने से शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बेहतर होता है। साथ ही यह गतिविधि तनाव कम करती है, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाती है और पारिवारिक व सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करती है।
पतंग की ऐतिहासिक उड़ान
पतंग उड़ाने की शुरुआत को लेकर अनेक मान्यताएं हैं। माना जाता है कि लगभग 2800 वर्ष पहले चीन के शानडोंग प्रांत में पतंग उड़ाने की परंपरा शुरू हुई। शुरुआती पतंगें बांस और कागज से बनाई जाती थीं। एक किंवदंती के अनुसार, एक किसान ने हवा से उड़ती अपनी टोपी को रस्सी से बांधा, जिससे पतंग का विचार जन्मा।
भारतीय ग्रंथों में भी पतंग का उल्लेख मिलता है। तमिल ‘तंदनान रामायण’ के अनुसार मकर संक्रांति के दिन श्रीराम द्वारा उड़ाई गई पतंग इंद्रलोक तक पहुंची थी। मध्यकाल में हकीम लुकमान ने पतंगबाजी को स्वास्थ्य से जोड़ते हुए सुबह के समय पतंग उड़ाने की परंपरा को बढ़ावा दिया।
नवाबी दौर में पतंगबाजी शाही शौक बन गई। नवाब आसफुद्दौला और बादशाह अमजद अली शाह के समय पतंगों को चटख रंगों, सोने-चांदी के तारों और कलात्मक सजावट से सजाया जाता था। पतंग कटकर जिस घर में गिरती, वहां उत्सव स्वरूप पुलाव बनता था।
पर्व एक, रूप अनेक
समय के साथ पतंगबाजी ने वैश्विक उत्सव का रूप ले लिया। गुजरात का इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल 7 से 15 जनवरी तक आयोजित होता है, जिसमें जापान, चीन, मलेशिया और सिंगापुर सहित कई देशों के प्रतिभागी शामिल होते हैं। तेलंगाना, जयपुर और अहमदाबाद के पतंग महोत्सव भी अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुके हैं।
विदेशों में चीन के वेईफांग, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया, अमेरिका और इटली में पतंग उत्सव बड़े स्तर पर मनाए जाते हैं। कहीं 3-डी पतंगों का आकर्षण है तो कहीं 100 मीटर लंबी पूछ वाली पतंगें बच्चों का मन मोह लेती हैं।
रोचक तथ्य और किस्से
जापान में एक ही लाइन पर 11,284 पतंग उड़ाने का रिकॉर्ड है।
दुनिया की सबसे बड़ी पतंग 630 वर्ग मीटर क्षेत्रफल की बनाई गई।
भारत में पतंग उद्योग लगभग 1200 करोड़ रुपये का है और इससे 70 हजार से अधिक कारीगर जुड़े हैं।
1760 में जापान में पतंगबाजी पर प्रतिबंध लगाया गया था, क्योंकि लोग काम छोड़कर पतंग उड़ाने लगे थे।
जीवन जीने की सीख देती पतंग
एक डोर के सहारे आसमान छूती पतंग जीवन का दर्शन सिखाती है। गिरने के बाद फिर उड़ने का साहस, संतुलन बनाए रखने की कला और प्रतिस्पर्धा में भी ऊंचा उठने की प्रेरणा—यह सब पतंग हमें सहज रूप से सिखाती है। असफलताओं के बावजूद प्रयास जारी रखने का संदेश पतंगबाजी में छिपा है।
सावधानियां भी जरूरी
पतंग उड़ाते समय छत की मुंडेरों और आसपास के खुले स्थानों का ध्यान रखें। कांच या चाइनीज मांझे का प्रयोग न करें, क्योंकि यह जानलेवा हो सकता है। यदि त्वचा संवेदनशील हो तो सनस्क्रीन और आंखों के लिए गॉगल्स का उपयोग करें।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट (पंजाब)

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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