वर्तमान समय को यदि किसी एक शब्द में परिभाषित किया जाए, तो वह है—बाजार। बाजार शताब्दियों से मनुष्य की सुविधाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम रहा है। वस्तुओं के लेन-देन के साथ-साथ इसने समाज को व्यवस्थित करने में भी भूमिका निभाई है। किंतु आज यही बाजार किस प्रकार मनुष्य को उसकी ही इच्छाओं का गुलाम बनाता जा रहा है, इस साधारण-सी प्रक्रिया पर शायद ही कोई गंभीरता से विचार करता हो।
हर स्थिति में व्यावसायिक अवसर तलाशने की प्रवृत्ति ने बाजार को मानव समाज और संस्कृति के लिए एक स्थायी खतरे में बदल दिया है। नियम, नैतिकता, भावना और संवेदना से रहित यह बाजार मनुष्य को एक कठपुतली के रूप में देखने लगा है, जिसे जब चाहे अपने लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अधिकतम मुनाफे की अंधी दौड़ में बाजार ने मानवीय जीवन के हर पहलू में हस्तक्षेप शुरू कर दिया है। आपदा में अवसर देखने की यह मानसिकता मनुष्य को ऐसी निरर्थक प्रतिस्पर्धा में धकेल देती है, जिसका अंत किसी के लिए भी सुखद नहीं होता।
बाजार हमें यह संदेश देता है कि स्वयं को महसूस करो, अपनी सुंदरता को पहचानो और चीजों को केवल बाहरी दिखावे से नहीं, भावनाओं से परखो। किंतु यह बात वह कभी सीधे नहीं कहता, क्योंकि सीधी सच्चाई से उसका हित नहीं सधता। इसके विपरीत, वह झूठे सपने दिखाता है, व्यक्ति में हीनता की भावना भरता है और भ्रमित करने वाली आकांक्षाएँ पैदा करता है। विज्ञापनों और प्रचार के माध्यम से वह ऐसी मानसिक हवा बनाता है, जिसमें व्यक्ति यह मानने लगता है कि वह जैसा है, वैसा पर्याप्त नहीं है। जो उसके पास है, वह अधूरा है और जो दूसरे के पास है, वही पूर्ण है। इसी सोच के जरिए बाजार स्वयं को सबके लिए अनिवार्य बना देता है।
अक्सर देखा जाता है कि बाजार सुरक्षा और सुविधा के नाम पर हमें हमारी शिक्षा, परंपराओं, घरेलू नुस्खों और सांस्कृतिक जड़ों से अलग करता है। बाद में वही चीजें नए पैकेज और फैशन के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर दी जाती हैं। हमारी दिनचर्या में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहां लोग अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों की स्वीकार्यता के लिए बाजार द्वारा तय किए गए ट्रेंड की ओर देखते हैं। यही कारण है कि बाजार उन पुरानी चीजों को भी फैशन के नाम पर चला देता है, जिन्हें मनुष्य समय के साथ पीछे छोड़ चुका होता है।
समस्या यह भी है कि अधिकांश लोगों के पास चीजों को परखने का अपना दृष्टिकोण नहीं होता। वे दूसरों की हां में हां मिलाते हैं। हमारा समाज काफी हद तक ‘दूसरे क्या कहेंगे’ की मानसिकता पर टिका हुआ है। लेकिन जब सभी एक जैसे दिखने और सोचने लगें, तो कहने-सुनने के लिए कुछ बचता ही नहीं। इसी क्रम में हम अपने पैसे खर्च कर बाजार का गुणगान भी करते रहते हैं।
बाजार सभी को एक समान धरातल पर ले आता है, किंतु ऐसा करते हुए वह व्यक्ति को उपभोक्ता में बदल देता है। उपभोक्ता की न तो कोई निजी पसंद होती है और न ही स्वतंत्र निर्णय। वह उन्हीं वस्तुओं का उपभोग करता है, जो उसके लिए तैयार की जाती हैं। इस समानता की कीमत हमें अपने व्यक्तित्व और विविधता को खोकर चुकानी पड़ती है। इसके बावजूद व्यक्ति में कोई बेचैनी नहीं होती, क्योंकि सोचने और सवाल करने की क्षमता को कुंद करके ही ये प्रवृत्तियाँ हमारे भीतर जगह बनाती हैं।
मनुष्य की अस्मिता उसकी बुद्धि, विचारशीलता, नैतिकता और विवेक से निर्मित होती है। वह केवल अपने हित-अहित के बारे में ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और अन्य प्राणियों के प्रति भी जिम्मेदारी महसूस करता है। समाज, संस्कृति और प्रकृति के प्रति दायित्वबोध ही उसे मनुष्य बनाता है। किंतु बाजार जब उसे उपभोक्ता में बदल देता है, तो उसके विचार, व्यवहार और भावनाओं को नियंत्रित करने लगता है। व्यक्ति की गरिमा स्खलित होती है और वह भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाता है। अकेले व्यक्ति को नियंत्रित करना कठिन होता है, लेकिन भीड़ का हिस्सा बनाकर उसे संचालित करना बेहद आसान।
यह समझना आवश्यक है कि हमारी जरूरतों की पूर्ति करने वाला बाजार कब ‘बाजारवाद’ में बदल जाता है और हम कब बाजारीकरण की प्रक्रिया के शिकार हो जाते हैं। जब तक हम बाजार से परे मानवीय अस्तित्व को नहीं समझेंगे, तब तक अपने ही बनाए इस तंत्र के हाथों मनुष्य के कैद होने की त्रासदी को सही अर्थों में महसूस नहीं कर पाएंगे।
— डॉ. विजय गर्ग
(सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट, पंजाब)












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