August 5, 2026 10:30 am

August 5, 2026 10:30 am

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: विधवा बहू को ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार

ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होने पर भी मिलेगा भरण-पोषण

हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम की सुप्रीम कोर्ट ने की स्पष्ट व्याख्या
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी को एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई बहू अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होती है, तब भी वह हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अधिकार के लिए यह शर्त आवश्यक नहीं है कि बहू ससुर के जीवित रहते विधवा हुई हो।
“बेटे की कोई भी विधवा” आश्रित की श्रेणी में
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि अधिनियम की धारा 21 (vii) में प्रयुक्त शब्द “बेटे की कोई भी विधवा” पूरी तरह स्पष्ट हैं। इसका अर्थ यह है कि मृत हिंदू के बेटे की विधवा, चाहे उसके पति की मृत्यु ससुर से पहले हुई हो या बाद में, वह कानूनन आश्रित मानी जाएगी और धारा 22 के तहत भरण-पोषण की पात्र होगी।

हाईकोर्ट का आदेश सही, अपीलें खारिज
शीर्ष अदालत ने इस मामले में दायर सभी सिविल अपीलों को खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट द्वारा पारिवारिक न्यायालय को याचिका को सुनवाई योग्य मानने और गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश देना पूरी तरह वैध है। कोर्ट ने कहा कि अपीलों में कोई दम नहीं है और इन्हें खारिज किया जाता है।

सभी वारिसों पर आश्रितों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 22 के अनुसार मृतक हिंदू के सभी उत्तराधिकारियों पर यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे मृतक की संपत्ति से उसके आश्रितों का भरण-पोषण करें। यदि किसी आश्रित को विरासत में कोई हिस्सा नहीं मिला है, तो वह उन लोगों से भरण-पोषण पाने का हकदार होगा, जिन्हें संपत्ति प्राप्त हुई है।

संकीर्ण व्याख्या से विधवा बहू होगी बेसहारा: कोर्ट
अदालत ने कहा कि कानून की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या कर यदि विधवा बहू को भरण-पोषण से वंचित किया जाता है, तो यह उसे सामाजिक रूप से असहाय बना देगा और सम्मान के साथ जीवन जीने के उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।
मनुस्मृति का हवाला, पारिवारिक दायित्व पर जोर
कोर्ट ने मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदू कानून में परिवार के कमजोर सदस्यों, विशेषकर महिलाओं की देखभाल को पारिवारिक मुखिया का दायित्व माना गया है। यह सिद्धांत आज भी सामाजिक न्याय की भावना को मजबूत करता है।

क्या है पूरा मामला
यह विवाद दिसंबर 2021 में दिवंगत हुए डॉ. महेंद्र प्रसाद के उत्तराधिकारियों के बीच शुरू हुआ। उनकी बहू गीता शर्मा ने मार्च 2023 में अपने पति की मृत्यु के बाद ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि ससुर की मृत्यु के समय वह विधवा नहीं थीं।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए याचिका को सुनवाई योग्य माना और भरण-पोषण तय करने के निर्देश दिए। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसे अब खारिज कर दिया गया है।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

बाबूगिरी हिंदी

virender chahal

Our Visitor

3 8 2 7 1 1
Total Users : 382711
Total views : 622159

शहर चुनें