August 29, 2026 2:24 pm

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उच्च न्यायालय का अहम फैसला: 83 वर्षीय विधवा को 33 साल बाद मिला पारिवारिक पेंशन का अधिकार

चंडीगढ़ | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में 83 वर्षीय अनपढ़ विधवा बदका देवी को 33 वर्षों की देरी के बावजूद पारिवारिक पेंशन का हक दिलाया है। बदका देवी के पति श्री राम दास का वर्ष 1991 में निधन हो गया था, लेकिन इसके बाद उन्हें आज तक पारिवारिक पेंशन नहीं मिल पाई थी।
न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह ब्राड ने सुप्रीम कोर्ट के “चलते हुए गलत (Continuing Wrong)” सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि पेंशन का भुगतान न होना हर महीने एक नया कारण (fresh cause of action) पैदा करता है। इसलिए देरी और लैचेस (अनावश्यक विलंब) के आधार पर पेंशन से इनकार नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का सहारा
अदालत ने अपने फैसले में एम.आर. गुप्ता बनाम भारत संघ (1995) और भारत संघ बनाम तरसेम सिंह (2008) के निर्णयों का हवाला दिया। न्यायालय ने माना कि पेंशन न देना एक निरंतर चलने वाली गलती है, जिसे समय-सीमा के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

फैसले के मुख्य बिंदु
अदालत ने सीडब्ल्यूपी-32455-2025 को स्वीकार करते हुए पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि
याचिका दायर करने से तीन वर्ष पूर्व की बकाया पारिवारिक पेंशन राशि 6% ब्याज सहित अदा की जाए।
चार सप्ताह के भीतर मासिक पारिवारिक पेंशन शुरू की जाए।
पेंशन के साथ-साथ एलटीसी और चिकित्सा भत्ता जैसी अन्य वैधानिक सुविधाएं भी प्रदान की जाएं।
यह मामला एडवोकेट गीतांजली छाबड़ा और मस्कान द्वारा बहसित किया गया।

पेंशन दान नहीं, मौलिक अधिकार
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पेंशन कोई दया या अनुग्रह नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है। इस सिद्धांत को हाल ही में उत्तर प्रदेश राज्य बनाम दिनेश कुमार शर्मा (2025) मामले में भी दोहराया गया था।
अदालत ने राज्य सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता की ओर से देरी हुई है या अंशदायी निधि (Contributory Fund) जमा नहीं की गई थी।

प्रमुख कानूनी नजीरें
बालकृष्ण एस.पी. वाघमारे (AIR 1959 SC): “चलते हुए गलत” को निरंतर चोट के रूप में परिभाषित किया।
शिव दास बनाम भारत संघ (2007): पेंशन का अधिकार हर महीने उत्पन्न होता है।
रुशीभाई जगदीशचंद्र पाठक (2022): यदि दावा वैध हो तो बकाया राशि देय होती है, हालांकि सीमा अधिनियम लागू रहेगा।

बुजुर्गों के लिए मजबूत सुरक्षा
यह फैसला उन हजारों वृद्ध नागरिकों के लिए एक मजबूत नजीर साबित होगा, जिनके पेंशन दावे वर्षों से लंबित हैं। अदालत का यह रुख स्पष्ट संदेश देता है कि प्रशासनिक लापरवाही या देरी के कारण किसी बुजुर्ग को उसके वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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