(एक शिकायत-सह-लेख) आरके गर्ग
यह लेख किसी एक व्यक्ति के निजी अनुभव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और सिनेमा हॉल प्रबंधन की संवेदनहीनता के विरुद्ध एक औपचारिक शिकायत है। कल एक सिनेमा हॉल में फिल्म देखने के दौरान जो दृश्य सामने आया, वह न केवल शर्मनाक था, बल्कि Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 का खुला उल्लंघन भी।
संबंधित सिनेमा हॉल में दिव्यांगजन, बुज़ुर्गों और शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के लिए कोई भी सुलभ व्यवस्था मौजूद नहीं थी।
न तो व्हीलचेयर के लिए जगह,
न सुलभ शौचालय,
और न ही ऐसी सीटें जहाँ बिना सीढ़ियाँ चढ़े सुरक्षित बैठा जा सके।
यह स्थिति महज़ अव्यवस्था नहीं, बल्कि कानून की सीधी अवहेलना है।
इस पूरी घटना का सबसे पीड़ादायक दृश्य एक शारीरिक रूप से कमजोर महिला से जुड़ा था, जिसे मजबूरी में ऊपर की सीट तक पहुँचने के लिए पूरी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ीं। हर सीढ़ी उसके लिए जोखिम थी। फिल्म के दौरान वह चाहकर भी बाथरूम नहीं जा सकी, क्योंकि उसे डर था कि यदि वह नीचे उतरी तो शायद दोबारा अपनी सीट तक पहुँच ही न पाए।
यह डर किसी कल्पना से नहीं, बल्कि उस अमानवीय व्यवस्था से पैदा हुआ था, जिसे सिनेमा प्रबंधन ने सामान्य मान लिया है।
फिल्म समाप्त होने के बाद वही महिला फिर से सीढ़ियाँ उतरने को मजबूर हुई—थकी हुई, डरी हुई और असहाय।
यह कोई भावनात्मक कहानी नहीं, बल्कि एक जीवित उदाहरण है कि कैसे सार्वजनिक स्थानों पर कानून को खुलेआम पैरों तले रौंदा जा रहा है।
यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि भारत में इसके लिए स्पष्ट कानून मौजूद है।
Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 के अनुसार सिनेमा हॉल जैसे सार्वजनिक स्थलों में—
बाधा-मुक्त प्रवेश (रैंप/लिफ्ट)
व्हीलचेयर के लिए सुरक्षित बैठने की व्यवस्था
सुलभ शौचालय
बिना सीढ़ियों के पहुँच योग्य सीटें
अनिवार्य हैं।
ये कोई अतिरिक्त सुविधाएँ नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार हैं। इसके बावजूद ज़मीनी हकीकत यह है कि सिनेमा हॉल मालिक मुनाफा तो कमाते हैं, लेकिन सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी से बचते हैं।
इस शिकायत का दूसरा और उतना ही गंभीर पक्ष प्रशासन से जुड़ा है। सवाल उठते हैं—
ऐसे सिनेमा हॉल को लाइसेंस कैसे मिला?
निरीक्षण के दौरान क्या किसी अधिकारी ने यह देखा कि कोई दिव्यांग व्यक्ति अंदर कैसे जाएगा?
क्या लाइसेंस नवीनीकरण के समय कानून सिर्फ काग़ज़ों में पूरा किया जाता है?
यदि प्रशासन अपनी आँखें बंद रखेगा, तो इसे लापरवाही नहीं बल्कि मौन सहमति ही माना जाएगा।
ऐसे सिनेमा हॉल दरअसल यह संदेश देते हैं कि—
“मनोरंजन सिर्फ स्वस्थ और ताकतवर लोगों के लिए है।”
यह सोच न केवल असंवैधानिक है, बल्कि सामाजिक रूप से भी खतरनाक है। किसी सभ्य समाज की पहचान यह होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है।
यह लेख इसलिए भी एक शिकायत है क्योंकि आज यदि एक कमजोर महिला सीढ़ियों के डर से बाथरूम नहीं जा सकी, तो कल कोई बुज़ुर्ग गिर सकता है, कोई दिव्यांग गंभीर रूप से घायल हो सकता है। तब जिम्मेदारी कौन लेगा—सिनेमा हॉल मालिक या प्रशासन?
अतः इस लेख के माध्यम से औपचारिक रूप से मांग की जाती है कि—
सभी सिनेमा हॉल का तत्काल एक्सेसिबिलिटी ऑडिट कराया जाए
नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कानूनी कार्रवाई और जुर्माना लगाया जाए
भविष्य में लाइसेंस और नवीनीकरण को सुलभता से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए
यदि कानून सिर्फ किताबों में रहेगा और कमजोर लोगों को सिनेमा देखने के लिए सीढ़ियों पर अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ेगी, तो यह व्यवस्था की नहीं, बल्कि हमारे समाज की सामूहिक असफलता होगी।
यह शिकायत अनसुनी नहीं रहनी चाहिए।
— आर. के. गर्ग
समाजिक कार्यकर्ता चंडीगढ़











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