April 6, 2026 5:02 am

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राजनीतिक घृणा की अति और देश की प्रतिष्ठा

(अब क्या कहेंगे वे लोग, जो स्टेडियम के नाम को बहाना बनाकर प्रधानमंत्री को “पनौती” कहने में संकोच नहीं करते थे?)

— डॉ. प्रियंका सौरभ

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यहाँ असहमति की जगह होती है। नागरिकों को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने, उसके निर्णयों की आलोचना करने और सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार होता है। यही परंपरा लोकतंत्र को जीवंत और मजबूत बनाती है। लेकिन जब यह आलोचना मर्यादा की सीमा पार कर व्यक्तिगत कटाक्ष, उपहास और अपमान का रूप लेने लगती है, तब यह लोकतांत्रिक संवाद की स्वस्थ परंपरा को कमजोर करने लगती है।

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में विचारों की बहस की जगह कटुता और घृणा का स्वर तेज़ होता दिखाई देता है। राजनीतिक मतभेद अब कई बार इतने तीखे रूप में सामने आते हैं कि किसी भी राष्ट्रीय घटना, उपलब्धि या आयोजन को भी लोग अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने लगते हैं। किसी उपलब्धि को स्वीकार करने से पहले यह देखा जाता है कि उसका श्रेय किसे दिया जाएगा, और यही प्रवृत्ति सार्वजनिक विमर्श को दूषित करती है।

खेल के मैदान को सामान्यतः राजनीति से अलग माना जाता है। खेल में प्रतिस्पर्धा होती है, लेकिन अंततः खेल भावना ही सर्वोपरि रहती है। खेल लोगों को जोड़ने का माध्यम होता है, न कि विभाजन का। किंतु दुर्भाग्य से अब खेल के मंच भी राजनीतिक कटाक्ष और आरोप-प्रत्यारोप से अछूते नहीं रहे। क्रिकेट जैसे खेल, जो भारत में करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा है, वह भी कई बार राजनीतिक तंज का विषय बन जाता है।

हाल के समय में स्टेडियम के नाम को लेकर जिस प्रकार की टिप्पणियाँ की गईं, वे इसी प्रवृत्ति का उदाहरण हैं। राजनीतिक असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन जब किसी राष्ट्रीय आयोजन या खेल स्थल के नाम को आधार बनाकर व्यक्तिगत अपमानजनक टिप्पणियाँ की जाती हैं, तो यह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक जीवन की मर्यादा को भी प्रभावित करता है।

विडंबना यह है कि जिस मैदान को लेकर कभी व्यंग्य और कटाक्ष किए गए थे, उसी मैदान पर भारत ने विश्व कप जीतकर इतिहास रच दिया। यह केवल एक खेल की जीत नहीं थी, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से भी एक बड़ा संदेश था। यह घटना याद दिलाती है कि क्षणिक राजनीतिक टिप्पणियाँ और नकारात्मक बयानबाजी अंततः वास्तविक उपलब्धियों के सामने टिक नहीं पातीं।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है कि सभी लोग एक ही विचारधारा से सहमत नहीं होंगे। किसी भी नेता या सरकार की आलोचना होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आलोचना तथ्यों, तर्कों और मर्यादा के आधार पर की जाए। जब आलोचना का स्वरूप गिरकर केवल उपहास या अपमान तक सीमित हो जाता है, तो वह लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय कमजोर करता है।

सोशल मीडिया के विस्तार ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है। आज हर व्यक्ति के पास अपनी राय व्यक्त करने का मंच है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सकारात्मक पक्ष है। लेकिन इसके साथ यह भी देखने में आता है कि बिना तथ्य जाँचे, बिना गहराई से सोचे लोग ऐसी टिप्पणियाँ कर देते हैं जो अनावश्यक विवाद और कटुता को जन्म देती हैं। कई बार लोग केवल भीड़ का हिस्सा बनने या किसी समूह को खुश करने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने लगते हैं जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती।

राजनीतिक संवाद में भाषा की मर्यादा का अत्यंत महत्व होता है। शब्द केवल विचार व्यक्त नहीं करते, बल्कि समाज के वातावरण को भी प्रभावित करते हैं। जब सार्वजनिक जीवन में प्रयुक्त भाषा लगातार कठोर और अपमानजनक होती जाती है, तो उसका असर समाज के सामान्य व्यवहार पर भी पड़ता है। धीरे-धीरे असहमति को दुश्मनी और आलोचना को अपमान समझने की प्रवृत्ति विकसित होने लगती है।

भारतीय राजनीतिक परंपरा में व्यंग्य और कटाक्ष की एक समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन उसके साथ संतुलन और मर्यादा भी जुड़ी रही है। आज कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि शब्दों की तीव्रता और भाषा की कठोरता संवाद की संभावनाओं को ही समाप्त कर देती है। इससे समाज में अनावश्यक तनाव और विभाजन की स्थिति पैदा होती है।

यह भी समझना जरूरी है कि स्वस्थ आलोचना लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि सरकार या नेतृत्व से कोई गलती होती है तो उसकी आलोचना होना स्वाभाविक है। मीडिया, बुद्धिजीवी और आम नागरिकों का यह दायित्व है कि वे सत्ता से सवाल पूछें। लेकिन आलोचना का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि केवल अपमान या उपहास।

आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह स्वस्थ आलोचना और अनावश्यक घृणा के बीच अंतर को समझे। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता हैं, लेकिन यदि ये मतभेद सामाजिक विभाजन का कारण बनने लगें तो यह स्थिति चिंता का विषय बन जाती है। इसलिए आवश्यक है कि हम असहमति को सम्मानजनक संवाद के रूप में स्वीकार करें, न कि उसे व्यक्तिगत आक्रमण का माध्यम बना दें।

समाज के जागरूक वर्ग—जैसे लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद और बुद्धिजीवी—इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक विमर्श का स्तर गिरने न पाए। तर्क, तथ्य और मर्यादा के साथ अपनी बात रखने की परंपरा को मजबूत करना ही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा योगदान हो सकता है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राजनीतिक सत्ता स्थायी नहीं होती। समय के साथ सरकारें बदलती रहती हैं, नेता आते-जाते रहते हैं और परिस्थितियाँ भी बदलती रहती हैं। लेकिन राष्ट्र की प्रतिष्ठा और उसकी गरिमा स्थायी होती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक विवाद या असहमति में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अंततः हम सभी एक ही देश के नागरिक हैं और उसकी प्रतिष्ठा हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम राजनीतिक बहसों को अधिक परिपक्व और जिम्मेदार बनाएं। असहमति को शत्रुता में बदलने के बजाय उसे विचारों के स्वस्थ आदान-प्रदान का माध्यम बनाएं। आलोचना करें, लेकिन तर्क और तथ्य के आधार पर करें। व्यंग्य करें, लेकिन उसकी मर्यादा बनाए रखें। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि किसी भी परिस्थिति में देश की प्रतिष्ठा और गरिमा को सर्वोपरि रखें।

लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनावों में नहीं, बल्कि उस संवाद में होती है जो समाज के भीतर निरंतर चलता रहता है। यदि यह संवाद संयमित, तर्कपूर्ण और सम्मानजनक होगा तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लेकिन यदि यह संवाद घृणा, उपहास और कटुता से भर जाएगा, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ने लगेंगी।

अंततः यह याद रखना होगा कि राजनीतिक टिप्पणियाँ क्षणिक होती हैं, लेकिन राष्ट्र की उपलब्धियाँ इतिहास बन जाती हैं। जिस मैदान को लेकर कभी तंज कसे गए थे, उसी मैदान पर जब भारत विश्व विजेता बनकर खड़ा होता है, तो वह केवल एक खेल की जीत नहीं होती—वह यह भी संदेश देती है कि नकारात्मकता और कटाक्ष से ऊपर उठकर ही देश की असली पहचान बनती है।

सत्ता बदलती रहती है, राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन देश की प्रतिष्ठा हमेशा सर्वोपरि रहती है। यही कारण है कि हर नागरिक का यह दायित्व है कि वह अपने शब्दों और विचारों के माध्यम से उस गरिमा को बनाए रखने में योगदान दे। जब हम यह समझने लगेंगे कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर राष्ट्रहित है, तभी लोकतंत्र की वास्तविक भावना सुरक्षित रह सकेगी।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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