पंचकूला: अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि एक निश्चित उम्र के बाद सपने देखने और उन्हें पूरा करने का समय निकल जाता है। लेकिन पंचकूला के सेक्टर-4 निवासी श्रीनिवास वशिष्ठ ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। 62 वर्ष की उम्र में इंटरनेशनल सीनियर टेनिस टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि अगर जुनून जिंदा हो, तो उम्र सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाती है।
जिम्मेदारियों के बीच दब गया था सपना
श्रीनिवास वशिष्ठ का जीवन संघर्ष और जिम्मेदारियों से भरा रहा। हरियाणा के करनाल जिले से संबंध रखने वाले श्रीनिवास सात भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। ऐसे में बचपन से ही उनके कंधों पर परिवार की जिम्मेदारियां आ गईं।
खेलों में रुचि होने के बावजूद उन्हें अपने शौक को दबाना पड़ा। वे बताते हैं कि जब भी वे वॉलीबॉल खेलने के लिए मैदान जाते, तो घर की जिम्मेदारियों को लेकर उन्हें डांट पड़ती और कई बार मार भी खानी पड़ती थी। धीरे-धीरे हालात ऐसे बने कि खेल उनके जीवन से लगभग दूर हो गया।
नौकरी, परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच उनका सपना कहीं पीछे छूट गया। उन्होंने एलआईसी में डेवलपमेंट ऑफिसर के रूप में लंबी सेवा दी, लेकिन खेल का जुनून उनके भीतर कहीं न कहीं जीवित रहा।
LIC से रिटायरमेंट के बाद बदली जिंदगी
श्रीनिवास वशिष्ठ भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में विकास अधिकारी (Development Officer) के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। लंबे समय तक नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के बाद उन्होंने अपने जीवन को नया मोड़ देने का फैसला किया।
50 वर्ष की उम्र में उन्होंने टेनिस खेलना शुरू किया। यह फैसला उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

50 की उम्र में लिया जिंदगी बदलने वाला फैसला
अधिकांश लोग 50 की उम्र में रिटायरमेंट की योजना बनाते हैं, लेकिन श्रीनिवास वशिष्ठ ने इसी उम्र में अपनी नई शुरुआत की। उन्होंने टेनिस रैकेट उठाया और नियमित अभ्यास शुरू किया।
शुरुआत आसान नहीं थी। उम्र के साथ शरीर की सीमाएं थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी फिटनेस सुधारी, तकनीक पर काम किया और प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया।
उनकी मेहनत रंग लाई और वे राज्य स्तर से राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गए।

इंटरनेशनल मंच पर चमका हुनर
हाल ही में जमशेदपुर में आयोजित इंटरनेशनल रैंकिंग सीनियर टेनिस टूर्नामेंट में श्रीनिवास वशिष्ठ ने शानदार प्रदर्शन किया।
उन्होंने 60 प्लस कैटेगरी के डबल्स मुकाबले में अपने साथी देव शंकर मिश्रा के साथ गोल्ड मेडल जीता। इसके अलावा सिंगल्स में भी उन्होंने दमदार खेल दिखाते हुए रनर-अप का खिताब हासिल किया।
यह उपलब्धि सिर्फ एक मेडल नहीं, बल्कि उस संघर्ष, धैर्य और जुनून की जीत है, जिसे उन्होंने दशकों तक अपने भीतर जिंदा रखा।
पत्नी बनीं सबसे बड़ी ताकत
हर सफल व्यक्ति के पीछे किसी न किसी का मजबूत साथ होता है, और श्रीनिवास के जीवन में यह भूमिका उनकी पत्नी सुमित्रा वशिष्ठ निभा रही हैं।
सुमित्रा न केवल उनकी जीवनसाथी हैं, बल्कि उनकी योगाचार्य और डाइटीशियन भी हैं। वे ही तय करती हैं कि श्रीनिवास को कौन-से योगासन करने हैं और किस मौसम में कैसी डाइट लेनी है।
श्रीनिवास मानते हैं कि उनकी फिटनेस और आज की सफलता में उनकी पत्नी का सबसे बड़ा योगदान है।
अनुशासित दिनचर्या ही सफलता की कुंजी
62 साल की उम्र में भी श्रीनिवास वशिष्ठ की दिनचर्या किसी युवा खिलाड़ी से कम नहीं है।
रोजाना साइक्लिंग
नियमित योग अभ्यास
टेनिस की प्रैक्टिस
संतुलित आहार
इसके अलावा उन्हें संगीत से भी गहरा लगाव है। वे बांसुरी बजाते हैं और प्रकृति के बीच समय बिताना पसंद करते हैं।
उनका मानना है कि मानसिक और शारीरिक संतुलन ही असली फिटनेस है, और यही उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है।
अब वर्ल्ड कप पर नजर
श्रीनिवास वशिष्ठ का अगला लक्ष्य और भी बड़ा है। वे अगले तीन वर्षों में 65 वर्ष की उम्र में सीनियर्स टेनिस वर्ल्ड कप में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं।
वे कहते हैं कि यह सपना वे रोज देखते हैं और उसी के अनुसार अपनी तैयारी कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक लक्ष्य नहीं, बल्कि जीवन का मिशन बन चुका है।

प्रेरणा बन रही है यह कहानी
श्रीनिवास वशिष्ठ की यह कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो उम्र या परिस्थितियों का हवाला देकर अपने सपनों को छोड़ देते हैं।
उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि—
“अगर इरादे मजबूत हों, तो जिंदगी के किसी भी मोड़ पर नई शुरुआत की जा सकती है।”
पंचकूला का यह खिलाड़ी आज न सिर्फ मेडल जीत रहा है, बल्कि हजारों लोगों को यह सिखा रहा है कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती।











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