May 23, 2026 9:42 pm

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आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

उसी को जीने का हक है इस जमाने में,
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए

हरियाणा में राज्यसभा चुनाव में विधायकों की खरीद फरोख्त के मामले में विपक्ष बिना बात के ही हल्ला मचा रहा है। इसकी कोई जरूरत नहीं। ये सबको पता है कि हरियाणा में ऐसा होता है। ऐसा कभी से होते आया है। ऐसा होना ही था। ऐसा हुए बिना बात बन ही नहीं सकती। हरियाणा की इस मामले में समृद्ध परंपरा भी रही। आया राम गया राम की शुरूआत भी यहीं से हुई थी। वो तो खैर पुरानी बात हुई, ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। ये वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद की बात है। तब हरियाणा विधानसभा की 90 सीट में से कांग्रेस के 40 और हजकां के छह विधायक चुन कर आए थे। उस दौरान मैं दिल्ली में था और इस हालात पर अपने टीवी चैनल इंडिया न्यूज के लिए खबरें देने के दायित्व में जुटा था। इसी दौरान मेरी हजकां सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई से बात हुई। मैंने उन से पूछा क्या चल रहा है? वो बोले सब ठीक है। मैंने कहा कि उनके विधायक उनका साथ छोड़ कर फुर्र होने वाले हैं। क्या आप की सरकार से डील मैच्योर नहीं हुई? तब ऐसा सुना गया था कि कांगेस हाईकमान ने हजकां के कांग्रेस में विलय होने की सूरत में हजकां संरक्षक भजनलाल को किसी प्रदेश का राज्यपाल और कुलदीप बिश्नोई को डिप्टी सीएम बनाने और कुछ अन्य आकर्षक आफर एक पैकेज में आफर की हैं। कुलदीप कुछ इस से ज्यादा चाह रहे हैं और मामला खटाई में लटका हुआ है। कांग्रेस के लोग हजकां के अन्य विधायकों के साथ भी सम्पर्क बनाए हुए थे। मैंने कुलदीप को कहा कि आप इस मामले में जितनी देर में फैसला करेंगे,उतना ही आपको नुकसान होगा। ऐसा सा समझिए कि सत्ता-पावर गुड़ की तरह होती हैं और विधायक-एमपी मक्खी की तरह होते हैं। जहां गुड़ होता है, वहां मक्खी आ ही जाती है। ऐसे में ये विधायक ज्यादा देर तक आप के साथ वफादारी नहीं निभा पाएंगे,लेकिन कुलदीप बिश्नोई किसी और ही दुनिया में थे। कहने लगे इन विधायकों ने लौटे में नूण गेर के कसम खाई है कि हमेशा मेरा साथ निभाएंगे। उन्होंने किसी डील या पैकेज आफर होने से भी साफ साफ इंकार किया। ये हमारी वार्तालाप रात को हो रही थी कि अगले दिन शाम होने से पहले पहले हजकां के चार विधायक विनोद भ्याणा,सतपाल सांगवान,राव नरेंद्र और जिले राम शर्मा चंडीगढ पहुंच कर हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष के सामने पहुंच चुके थे। कांग्रेस को समर्थन दे चुके थे। जब ये बात पांचवें विधायक धर्म सिंह छौक्कर को पता लगी तो उन्होंने भी मौका न चूकते हुए अपना समर्थन भी कांग्रेस को दे दिया। कुल मिला कर सत्तारूढ कांग्रेस पार्टी ने ऐसा समां बांधा कि कुलदीप बिश्नोई बीच चौराहे पर अकेले रह गए। अब इधर भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल हरियाणा राज्यसभा में चुनाव बहुत बीरीक अंतर से राज्यसभा की चौखट दाखिल करने से वंचित रह गए। सरकार के प्रबंधन में कहीं कोई कसर नहीं थी,हार के लिए तो नांदल की किस्मत को ही दोष दिया जा सकता है। वर्ना माहौल तो ये था कि विधायकों की खुल्लेआम मंडी लगी हुई थी। कोई किसी तरह से बिकने को तैयार था तो कोई किसी तरह से। भाजपा की तैयारी भी पूरी थी। कहीं कोई चूक नहीं थी। सारा बंदोबस्त हो चुका था। वो तो इनैलो के ऐन मौके पर राज्यसभा चुनाव में वोटिंग का बायकाट करने और भाजपा के एक विधायक का वोट कैंसिल होने से मामला गड़बड़ा गया। अगर भाजपा अतिरिक्त एहितयात बरतती तो वो कांग्रेस की एक-दो वोट का और प्रबंध कर सकती थी। मगर ऐसा लगता है कि भाजपा ने बंदोबस्त तो जरूरत से ज्यादा ही कर रखा था और उनको कांग्रेस विधायकों पर भी अपने ज्यादा ही भरोसा था। वो तो ऐन मौके पर इन तीन वोटों का फर्क पड़ने से गणित गड़बड़ा गया और नांदल की बात बनते बनते रह गई। अब ये कांग्रेसी लोग जो राज्यसभा चुनाव से पहले अपने विधायकों की बाड़ेबंदी करते फिरते हैं, उनको असलियत में जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। इस तरह विधायकों के इधर उधर ले जाणे से सौदेबाजी नहीं रूका करती। इनफैक्ट सौदेबाजी तो राज्यसभा चुनाव की वोटिंग से बहुत पहले ही हो लिया करती है। इसके लिए कयामत की रात तक का इंतजार नहीं किया जाता। और हरियाणा में काफी पहले से होता रहा है। पिछले राज्यसभा चुनाव में भी ऐसा हुआ कि जब कांग्रेसियों का यंू रायपुर लेना किसी काम नहीं आया। इसी तरह वर्ष 1991 में भजनलाल सरकार के दौरान हुए राज्यसभा चुनाव में उद्योगपति और हविपा के राज्यसभा उम्मीदवार ओपी जिंदल विधायकों को भारत दर्शन करवाने ले गए थे। चैन्नई तक की यात्रा करवा लाए थे,लेकिन इसके बावजूद भी भजनलाल अपने दूसरे उम्मीदवार रामजीलाल को जितवा ले गए थे। जिंदल जीत नहीं पाए थे। कुल मिला कर ये कि सारा खेल पावर का है। जब कांग्रेस पावर में थी तो वो ये खेल करती थी और अब भाजपा पावर में है तो वो ये खेल कर रही है। जब ओपी चौटाला पावर में थे तो वो तत्कालीन विपक्षी कांग्रेसी विधायकों के वोट का अपने माफिक इस्तेमाल कर लिया करते थे। ऐसा ही खेल कर के वो वषग् 2004 में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार रही किरन चौधरी को हरवा चुके हैं। तब मुख्यमंत्री रहे चौटाला ने विपक्षी कांग्रेस में असानी से सेंध लगा ली थी। सारा रौला पावर का है। सारा सौदा पावर का है। बिकने से किसी पार्टी के विधायक को रत्ती भर भी ऐतराज नहीं है। कीमत अलग अलग है। पैकेज अलग अलग है। इस हालात पर कहा जा सकता है..
हमारा अज्म ए सफर कब किधर का हो जाए
ये वो नहीं जो किसी रहगुजर का हो जाए
खुली हवाओं में उड़ना तो उस की फितरत है
परिंदा क्यों किसी शाख ए शजर का हो जाए
मैं लाख चाहंू मगर हो तो ये नहीं सकता
कि तेरा चेहरा मेरी ही नजर का हो जाए
मेरा न होने से क्या फर्क उस को पड़ना है
पता चले जो किसी कम नजर का हो जाए

क्या करेगी कांग्रेसी काली भेड़ों का?
अब ये देखना रोचक होगा कि कांग्रेस के जिन विधायकों ने हरियाणा राज्यसभा चुनाव में क्रास वोटिंग की है-अपने वोट जान बूझकर रदद करवाए हैं,उनके खिलाफ पार्टी हाईकमान क्या कार्रवाई करती है। ये भी पहली दफा हो रहा है कि सरकार का साथ देने वाले कुछ विधायक इस दफा खुल्लमखुल्ला ये मानने से गुरेज कर रहे हैं कि उन्होंने सरकार की मदद की है। वर्ना पहले ऐसे हालात में लोग मान लिया करते थे। राज्यसभा चुनाव से ये भी साबित हुआ कि कई कांग्रेस विधायकों को अनुशासन और वफादारी से दूर दूर तक का भी वास्ता नहीं है। ये कहते कुछ हैं,करते कुछ हैं, दिखते कुछ हैं,बनते कुछ हैं,लगते कुछ हैं। इस दफा के चुनाव में कहीं पर निंगाहें कहीं पर निशाना भी रहा। कांगे्रेस वाले दिखा कुछ रहे थे और हुआ कुछ और ही। इसी तरह से इनैलो के बारे में बहुत से लोगों की धारणा ये थी कि ये सरकार समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार को वोट करेंगे,लेकिन उन्होंने ऐन मौके पर चौंका दिया। इनैलो को कांग्रेस के लोग चैलेंज देते थे कि अगर दम है तो वो राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवार को वोट ना डाल कर दिखाए,इनैलो ने इस चलैंज को स्वीकार तो किया,लेकिन पत्ते काफी देर से खोले। इनैलो इस हालात का सियासी फायदा लेने की कोशिश करेगी। बहरहाल इस राज्यसभा चुनाव में खेला करने वाले कई विधायक पब्लिक को यही कह कर फुसला रहे होंगे कि..
बुरा नहीं हंू मैं, मेरी भी कुछ कहानी है,
ये जो बदला बदला सा लगता हंू,
अपनों की ही मेहरबानी है

किस्मत के धनी कर्मवीर
बहुत सी हिंदी फिल्मों की शुरूआत में नबरिंग से पहले एक शेर आया करता था- फानूस बन कर जिसकी हिफाजत हवा करे, वो शम्मां क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे। छोटे होते हुए मुझे इस शेर का मतलब समझ में नहीं आता था। हरियाणा के राज्यसभा चुनाव ने इसका मतलब बखूबी समझा दिया है। इसे कहते हैं कि किस्मत हो तो कर्मवीर जैसी। पहले तो उनका हरियाणा से कांग्रेस का राज्यसभा का उम्मीदवार बनना ही किसी चमत्कार से कम नहीं था। वो हरयिाणा में कांग्रेस के किसी धड़े से नहीं जुड़े थे।उनका नाम सीधे ऊपर से आया है। उसके बाद सरकार के तमाम साम,दाम,दंड और भेद के सब फार्मूले फेल करते हुए वो राज्यसभा तक जा पहुंचे। हरियाणा सचिवालय में कर्मचारी नेता रहे कर्मवीर ने सियासी मंच पर अपनी धांसू एंट्री से सबको चौंका दिया है। प्रसिद्ध साहित्यकार हरिशंकर परसाई ने शायद कभी ऐसे ही हालात के लिए कहा होगा कि जिन की हैसियत है वो एक से ज्यादा बाप रखते हैं। एक परिवार में, एक दफ्तर में, एक-दो बाजार में और एक-एक हर राजनीतिक दल में।

कर्ज बकाया नहीं रखते मनोहरलाल
मनोहरलाल के लिए करनाल की लोकसभा सीट का बलिदान करने वाले संजय भाटिया को भी इनाम मिल गया है। उन्होंने वर्ष 2019 का लोकसभा का चुनाव छह लाख,56 हजार,142 मतों के अंतर से जीता था। वे तब देश भर में सर्वाधिक अंतर से जीतने वाले नेताओं में से एक थे। इसके बावजूद भाजपा ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाटिया का बलिदान ले किया और इस सीट पर पूर्व सीएम मनोहरलाल खटटर को उम्मीदवार बना दिया। अब संजय भाटिया को राज्यसभा भिजवा कर खटटर ने साबित किया कि वो यारों के यार हैं। अपना साथ देने वालों को कभी नहीं भूलते और मौका आने पर कई गुना ब्याज के साथ कर्ज चुकाते हैं। ये सही भी है कि जब आप किसी हैसियत में हों तो खुलकर खेलने में कभी कोताही नहीं करनी चाहिए क्योकि ऐसे अवसर जीवन में हरदम हर किसी को उपलब्ध नहीं रहते। भाटिया का नाम हरियाणा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के लिए भी चर्चा में रहा है। लोकसभा की टिकट कटने के बाद संजय भाटिया जरूर ये सोचते होंगे कि…
उस की खुशबू से कभी मेरा भी आंगन महके
मेरे यहां भी कभी रात की रानी आए
जिंदगी भर मुझे ये हसरत रही
दिन गुजारूं तो कोई रात सुहानी आए
ऐन मुमकिन है कोई टूट के चाहे
कभी एक दफा पलट कर तो जवानी आए

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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