बाबूगिरी ब्यूरो
चंडीगढ़, 23 मार्च — हरियाणा से हाल ही में हुए राज्यसभा द्विवार्षिक चुनाव में विजयी घोषित भाजपा के संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौद्ध को मिला निर्वाचन प्रमाण-पत्र फिलहाल केवल औपचारिक है और इसका प्रभाव आगामी 10 अप्रैल 2026 से ही शुरू होगा।
यह जानकारी पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट और संवैधानिक मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने दी। उन्होंने कहा कि यह प्रमाण-पत्र “पोस्ट-डेटेड चेक” की तरह है, जो तुरंत लागू नहीं होता बल्कि निर्धारित तिथि पर ही प्रभावी होता है।
10 अप्रैल से शुरू होगा कार्यकाल
हेमंत कुमार के अनुसार, दोनों नेताओं का राज्यसभा सांसद के रूप में कार्यकाल 10 अप्रैल 2026 से शुरू होगा और 9 अप्रैल 2032 तक रहेगा। इसी दिन केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग द्वारा संबंधित अधिसूचना भारत सरकार के राजपत्र (गजट) में प्रकाशित की जाएगी।
उन्होंने बताया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 71 और धारा 155(1) के तहत गजट नोटिफिकेशन जारी होने के साथ ही दोनों सांसदों का 6 वर्ष का कार्यकाल आधिकारिक रूप से प्रारंभ होगा। इसी तिथि से उन्हें वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं भी मिलनी शुरू होंगी।
शपथ जुलाई से पहले भी संभव
हालांकि 10 अप्रैल को संसद का सत्र नहीं होगा, ऐसे में संजय भाटिया और कर्मवीर बौद्ध जुलाई 2026 के मानसून सत्र का इंतजार किए बिना ही उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन के कार्यालय में शपथ ले सकते हैं।
वर्तमान सांसदों का कार्यकाल 9 अप्रैल तक
हेमंत कुमार ने बताया कि हरियाणा से राज्यसभा की कुल पांच सीटें हैं। वर्तमान में इन पर राम चंद्र जांगड़ा, किरण चौधरी, रेखा शर्मा, सुभाष बराला और कार्तिकेय शर्मा सदस्य हैं।
संजय भाटिया और कर्मवीर बौद्ध का निर्वाचन उन दो सीटों के लिए हुआ है, जो 10 अप्रैल 2026 से रिक्त होंगी। इन सीटों पर फिलहाल राम चंद्र जांगड़ा और किरण चौधरी सदस्य हैं, जिनका कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 तक है।
समय से पहले इस्तीफा देने पर भी नहीं बदलेगी तिथि
एडवोकेट हेमंत ने स्पष्ट किया कि यदि वर्तमान सांसद समय से पहले इस्तीफा भी दे दें, तब भी नव-निर्वाचित सांसदों का कार्यकाल 10 अप्रैल 2026 से ही शुरू होगा, उससे पहले नहीं।
राज्यसभा चुनाव में जीत का प्रमाण-पत्र मिलने के बावजूद, सांसद के रूप में अधिकार और जिम्मेदारियां केवल निर्धारित तिथि से ही लागू होती हैं, जिससे संवैधानिक प्रक्रिया की स्पष्टता और निरंतरता बनी रहती है।










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