लेखक: डॉ. विजय गर्ग
एक पुरानी खेती की कहावत है— “माटी को खिलाओ, पौधे को नहीं।” यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की कृषि परंपरा का सार है। यह हमें याद दिलाती है कि मिट्टी केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि एक जीवित, गतिशील और जटिल पारिस्थितिकी तंत्र है। लेकिन आधुनिक कृषि के दौर में यह समझ धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही है। आज किसान एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां उन्हें यह तय करना है कि वे मिट्टी के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें या बाजार की मांग को।
मिट्टी: एक जीवित दुनिया
हम अक्सर मिट्टी को सिर्फ “धूल” या “गंदगी” समझ लेते हैं, लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। एक चम्मच स्वस्थ मिट्टी में अरबों सूक्ष्मजीव होते हैं—बैक्टीरिया, कवक, प्रोटोजोआ, नेमाटोड्स और केंचुए। ये सभी मिलकर एक ऐसी जटिल व्यवस्था बनाते हैं जो पौधों के लिए पोषक तत्व उपलब्ध कराती है, पानी को संचित करती है और रोगों से सुरक्षा प्रदान करती है।
यह भूमिगत दुनिया ही असली “उत्पादन मशीन” है। जब यह स्वस्थ होती है, तो फसलें भी स्वस्थ होती हैं। लेकिन जब यह कमजोर पड़ती है, तो किसान को अधिक उर्वरक, अधिक पानी और अधिक कीटनाशकों पर निर्भर होना पड़ता है।
हरित क्रांति और बदली सोच
20वीं सदी में हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव लाया। इससे भुखमरी पर काबू पाने में मदद मिली, लेकिन इसके साथ ही खेती की सोच भी बदल गई। अब ध्यान मिट्टी की जरूरतों पर नहीं, बल्कि फसल की अधिकतम पैदावार पर केंद्रित हो गया।
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने उत्पादन तो बढ़ाया, लेकिन उन्होंने मिट्टी के प्राकृतिक तंत्र को कमजोर कर दिया। फसलें सीधे रसायनों से पोषण लेने लगीं और मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्मजीव धीरे-धीरे कम होने लगे। नतीजा यह हुआ कि मिट्टी की उर्वरता कृत्रिम साधनों पर निर्भर हो गई।
बाजार का दबाव
आज का किसान केवल खेती नहीं कर रहा, वह बाजार की अर्थव्यवस्था का हिस्सा भी है। उसे अपनी लागत निकालनी है, कर्ज चुकाना है और मुनाफा भी कमाना है। ऐसे में वह वही फसल उगाता है जिसकी बाजार में मांग है, भले ही वह मिट्टी के लिए उपयुक्त न हो।
बाजार केवल पैदावार को महत्व देता है, मिट्टी के स्वास्थ्य को नहीं। एक क्विंटल गेहूं की कीमत इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह स्वस्थ मिट्टी में उगा है या बंजर होती जमीन पर। यही वजह है कि किसान अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक नुकसान को नजरअंदाज कर देता है।
चिंताजनक आंकड़े
वैश्विक स्तर पर स्थिति बेहद गंभीर है। अनुमान है कि दुनिया की लगभग एक-तिहाई उपजाऊ भूमि पहले ही क्षतिग्रस्त हो चुकी है। यदि यही रफ्तार जारी रही, तो आने वाले दशकों में खाद्य संकट गहराने की आशंका है।
मिट्टी का क्षरण केवल उत्पादन को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ा है। स्वस्थ मिट्टी कार्बन को संचित करती है, जबकि खराब मिट्टी कार्बन को वातावरण में छोड़ती है। इस प्रकार, मिट्टी का स्वास्थ्य सीधे-सीधे पर्यावरण और मानव जीवन से जुड़ा हुआ है।
उम्मीद की किरण: पुनर्जनन कृषि
हालांकि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। दुनिया भर में कई किसान पारंपरिक और टिकाऊ तरीकों की ओर लौट रहे हैं। इसे पुनर्जनन (Regenerative) कृषि कहा जाता है।
इसमें किसान:
कवर क्रॉप्स (आवरण फसलें) उगाते हैं
फसल विविधता अपनाते हैं
कम या बिना जुताई करते हैं
जैविक खाद और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हैं
इन तरीकों से मिट्टी की गुणवत्ता धीरे-धीरे सुधरती है। जल धारण क्षमता बढ़ती है, रासायनिक निर्भरता घटती है और फसलें अधिक टिकाऊ बनती हैं।
क्या बाजार बदलेगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या बाजार मिट्टी के स्वास्थ्य को महत्व देगा?
यदि किसानों को केवल उत्पादन के आधार पर ही भुगतान मिलता रहेगा, तो वे मिट्टी की अनदेखी करते रहेंगे। इसके लिए जरूरी है कि:
सरकारें मृदा संरक्षण के लिए प्रोत्साहन दें
कार्बन क्रेडिट जैसे मॉडल लागू हों
जैविक और टिकाऊ उत्पादों को बेहतर मूल्य मिले
उपभोक्ता जागरूक हों और जिम्मेदारी से खरीदारी करें
जब तक बाजार मिट्टी के स्वास्थ्य को “मूल्य” नहीं देगा, तब तक बड़े स्तर पर बदलाव मुश्किल है।
उपभोक्ता की भूमिका
हम सभी इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। जब हम सस्ता भोजन चुनते हैं, तो हम अनजाने में उस प्रणाली को समर्थन देते हैं जो मिट्टी का दोहन करती है। इसलिए जरूरी है कि हम यह समझें कि सस्ता भोजन वास्तव में महंगा है—क्योंकि इसकी कीमत पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियां चुकाती हैं।
निष्कर्ष
किसान आज दो रास्तों के बीच खड़ा है—एक तरफ बाजार की तात्कालिक मांग है और दूसरी तरफ मिट्टी का दीर्घकालिक स्वास्थ्य।
हम जानते हैं कि स्वस्थ मिट्टी कैसे बनाई जाती है। हमारे पास तकनीक भी है और अनुभव भी। लेकिन असली चुनौती यह है कि क्या हमारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था किसानों को सही निर्णय लेने की अनुमति देती है?
मिट्टी हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि हमारे बच्चों से लिया गया उधार है। यदि हम इसे आज नष्ट करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के पास कुछ नहीं बचेगा।
इसलिए अब समय आ गया है कि हम खेती को केवल उत्पादन का माध्यम न समझें, बल्कि एक जिम्मेदारी के रूप में देखें—एक ऐसी जिम्मेदारी, जो धरती, पर्यावरण और मानवता के भविष्य से जुड़ी है।
मिट्टी इंतजार कर रही है—लेकिन हमेशा के लिए नहीं।











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