डॉ. विजय गर्ग
भारत में वनों को लेकर एक सकारात्मक कथा लंबे समय से प्रस्तुत की जाती रही है। सरकारी रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अक्सर यह बताया जाता है कि देश का वन आवरण लगातार बढ़ रहा है और आज कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग एक चौथाई हिस्सा हरित आच्छादन के रूप में दर्ज किया जाता है। यह तथ्य सुनने में उत्साहजनक लगता है और पर्यावरण संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। लेकिन जब इन आंकड़ों की गहराई में जाकर विश्लेषण किया जाता है, तो एक अधिक जटिल और चिंताजनक तस्वीर उभरती है।
भारत में वन मापन का सबसे प्रमुख आधार “वन कवर” है, जो उपग्रह चित्रों के माध्यम से पेड़ों की छतरी के नीचे आने वाले क्षेत्र का अनुमान प्रस्तुत करता है। यह तकनीकी रूप से सटीक प्रतीत होता है, लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण कमी है—यह प्राकृतिक वनों, कृत्रिम वृक्षारोपण और बिखरे हुए पेड़ों के बीच अंतर नहीं करता। परिणामस्वरूप, जैव विविधता से भरपूर घने प्राकृतिक जंगल और एक ही प्रजाति के वृक्षों वाले व्यावसायिक बागान एक ही श्रेणी में रख दिए जाते हैं। इससे वास्तविक पारिस्थितिक स्थिति की स्पष्ट समझ नहीं बन पाती।
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि कुल वन क्षेत्र में मामूली वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन यह वृद्धि असमान और असंतुलित है। कई क्षेत्रों में घने प्राकृतिक वनों का क्षरण हुआ है, जबकि उनकी जगह वृक्षारोपण परियोजनाओं ने ले ली है। यह बदलाव सतही तौर पर हरित आवरण बढ़ाने में सहायक दिखता है, लेकिन पारिस्थितिक दृष्टि से यह हानिकारक हो सकता है। प्राकृतिक वन न केवल अधिक जैव विविधता को संजोते हैं, बल्कि वे जल चक्र, मृदा संरक्षण और जलवायु संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जैव विविधता का प्रश्न इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले देशों में शामिल है, लेकिन वन मापन के मौजूदा मानक इस पहलू को पर्याप्त महत्व नहीं देते। किसी वन का मूल्य केवल उसके क्षेत्रफल से नहीं, बल्कि उसमें पाई जाने वाली प्रजातियों की विविधता, उनके आपसी संबंध और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता से निर्धारित होता है। उदाहरण के लिए, एक प्राकृतिक वन में सैकड़ों प्रकार के पौधे, जीव-जंतु और सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं, जो मिलकर एक जटिल और संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं। इसके विपरीत, एकल प्रजाति के वृक्षारोपण में यह विविधता लगभग नहीं के बराबर होती है।
वर्तमान समय में कार्बन भंडारण को भी वन मूल्यांकन का एक प्रमुख आधार बनाया जा रहा है, विशेषकर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में। भारत के जंगल कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। हालांकि, केवल कार्बन भंडारण के आधार पर वन स्वास्थ्य का आकलन करना भी अधूरा दृष्टिकोण है। हाल के अध्ययनों से संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वन उत्पादकता प्रभावित हो रही है और कई स्थानों पर हरित आवरण बढ़ने के बावजूद पारिस्थितिक गुणवत्ता घट रही है।
वनों के आर्थिक मूल्यांकन में भी सुधार की आवश्यकता है। पारंपरिक रूप से वनों का मूल्य लकड़ी और अन्य उत्पादों के आधार पर तय किया जाता रहा है, लेकिन आज यह समझ विकसित हो रही है कि वनों द्वारा प्रदान की जाने वाली पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं—जैसे जल संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, मृदा संरक्षण और जलवायु संतुलन—अधिक महत्वपूर्ण और दीर्घकालिक हैं। इन सेवाओं का आर्थिक मूल्य अक्सर वनों की कटाई से मिलने वाले अल्पकालिक लाभ से कहीं अधिक होता है, फिर भी नीति निर्माण में इन्हें पर्याप्त स्थान नहीं मिलता।
भारत जैसे विविध भौगोलिक और पारिस्थितिक परिस्थितियों वाले देश में एक समान वन मापदंड लागू करना भी चुनौतीपूर्ण है। पूर्वोत्तर भारत के वर्षावन, पश्चिमी घाट के जैव विविधता हॉटस्पॉट और हिमालय के पर्वतीय वन—इन सभी की संरचना, कार्य और संवेदनशीलता अलग-अलग है। एक समान राष्ट्रीय आंकड़ा इन भिन्नताओं को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं कर सकता। इसके परिणामस्वरूप, कई बार नीति निर्माण में स्थानीय आवश्यकताओं और चुनौतियों की अनदेखी हो जाती है।
इस स्थिति को सुधारने के लिए भारत को बहुआयामी वन मापन प्रणाली अपनाने की आवश्यकता है। केवल वन क्षेत्र के विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, यह समझना जरूरी है कि हमारे जंगल किस प्रकार के हैं और वे कितने स्वस्थ एवं लचीले हैं। इसके लिए जैव विविधता, वन गुणवत्ता, कार्बन गतिशीलता, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और स्थानीय समुदायों की निर्भरता जैसे पहलुओं को शामिल करना होगा।
तकनीकी प्रगति इस दिशा में नई संभावनाएं खोलती है। रिमोट सेंसिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जमीनी स्तर के सर्वेक्षणों के संयोजन से अधिक सटीक और व्यापक वन आकलन संभव है। साथ ही, स्थानीय समुदायों और आदिवासी ज्ञान को इस प्रक्रिया में शामिल करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे सदियों से वनों के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीते आए हैं और उनकी समझ अत्यंत मूल्यवान है।
अंततः, यह स्वीकार करना होगा कि केवल आंकड़ों के आधार पर वनों की वास्तविक स्थिति को नहीं समझा जा सकता। वन आवरण में वृद्धि एक सकारात्मक संकेत हो सकता है, लेकिन यह संपूर्ण सच्चाई नहीं है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करने में है कि हमारे जंगल न केवल अधिक हों, बल्कि स्वस्थ, विविध और टिकाऊ भी हों।
भारत के लिए यह समय है कि वह वन प्रबंधन के अपने दृष्टिकोण को पुनः परिभाषित करे—संख्या से गुणवत्ता की ओर, और मात्र हरियाली से वास्तविक पारिस्थितिक संतुलन की ओर। यही दृष्टिकोण हमें एक स्थायी और सुरक्षित पर्यावरणीय भविष्य की ओर ले जा सकता है।









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