डॉ. विजय गर्ग
आज का समय climate change का समय है, जहां पर्यावरणीय बदलाव केवल मौसम तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सीधे तौर पर मानव जीवन और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में इसका सबसे गहरा असर खेती-किसानी पर पड़ रहा है। लगातार बढ़ता तापमान (rising temperature), अनियमित वर्षा (irregular rainfall), और बढ़ती लू (heatwaves) ने कृषि व्यवस्था को अस्थिर बना दिया है।
पहले खेती मौसम की एक निश्चित लय (seasonal cycle) पर आधारित होती थी, लेकिन अब यह लय टूट चुकी है। किसान, जो पीढ़ियों से अपने अनुभव और पारंपरिक ज्ञान (traditional knowledge) के आधार पर खेती करते आए थे, अब बदलते मौसम के सामने खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
1. बढ़ता तापमान और फसलों पर प्रभाव (Impact on Crops)
तापमान में वृद्धि का सबसे सीधा असर फसलों की उत्पादकता (crop productivity) पर पड़ता है। गेहूं, धान और मक्का जैसी प्रमुख फसलें तापमान के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं।
उदाहरण के लिए, गेहूं को पकने के समय ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है। यदि इस दौरान तापमान अचानक बढ़ जाए, तो terminal heat stress की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे दाने छोटे और हल्के रह जाते हैं। परिणामस्वरूप उत्पादन में गिरावट आती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान में मात्र 1 से 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से फसल उत्पादन में 15% से 20% तक की कमी आ सकती है।
2. जल संकट और सिंचाई का दबाव (Water Crisis)
गर्मी बढ़ने से मिट्टी की नमी (soil moisture) तेजी से घटती है। इससे फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है, जिससे सिंचाई (irrigation demand) का दबाव बढ़ जाता है।
भारत के कई हिस्सों में पहले से ही जल संकट मौजूद है। ऐसे में भूजल स्तर (groundwater level) लगातार नीचे जा रहा है। किसान अधिक पानी के लिए मोटर और ट्यूबवेल का उपयोग बढ़ा रहे हैं, जिससे लागत भी बढ़ रही है।
3. कीट और रोगों का बढ़ता खतरा (Pests & Diseases)
उच्च तापमान और आर्द्रता में बदलाव कीटों और रोगों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं। Pest infestation तेजी से बढ़ता है, जिससे फसलों को नुकसान होता है।
कीटों की संख्या बढ़ने से किसानों को अधिक pesticides का उपयोग करना पड़ता है, जिससे न केवल लागत बढ़ती है बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
4. हीटवेव और मानव स्वास्थ्य (Heatwave Impact)
Heatwaves केवल फसलों को ही नहीं, बल्कि किसानों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती हैं। तेज गर्मी में लंबे समय तक खेतों में काम करना कठिन हो जाता है, जिससे heat stress और dehydration जैसी समस्याएं बढ़ती हैं।
यह स्थिति कृषि श्रम (farm labour) की उत्पादकता को भी प्रभावित करती है, जिससे खेती का काम धीमा पड़ जाता है।
5. बदलता फसल चक्र (Changing Crop Cycle)
मौसम की अनिश्चितता के कारण बुवाई और कटाई का समय (sowing & harvesting time) प्रभावित हो रहा है। कभी बारिश समय से पहले हो जाती है, तो कभी सूखा लंबे समय तक बना रहता है।
इससे फसल चक्र (cropping pattern) बिगड़ जाता है और किसानों के लिए सही निर्णय लेना कठिन हो जाता है। पारंपरिक कृषि ज्ञान अब बदलते मौसम के सामने पर्याप्त नहीं रह गया है।
6. आर्थिक दबाव और किसानों की स्थिति (Economic Impact)
बढ़ते तापमान का असर केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खेती की लागत (cost of cultivation) को भी बढ़ा रहा है।
अधिक सिंचाई, उर्वरकों (fertilizers) और कीटनाशकों (pesticides) की जरूरत किसानों के खर्च को बढ़ा देती है, जबकि उत्पादन घटने से आय कम हो जाती है।
भारत में लगभग 80% किसान छोटे और सीमांत (small & marginal farmers) हैं। ऐसे में यह दोहरा दबाव उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर कर रहा है और कर्ज का बोझ बढ़ा रहा है।
7. बागवानी और नकदी फसलों पर असर (Horticulture Impact)
बढ़ते तापमान का असर केवल अनाज पर ही नहीं, बल्कि बागवानी फसलों (horticulture crops) पर भी पड़ रहा है।
आम, लीची और नींबू जैसे फलों में sunburn की समस्या बढ़ रही है। कॉफी, आलू और अन्य नकदी फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
8. समाधान: जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate-Resilient Farming)
इस संकट से निपटने के लिए खेती में बदलाव अनिवार्य है। Climate-resilient agriculture को अपनाना समय की मांग है।
ताप-सहनशील बीज (heat-resistant seeds): ऐसी फसल किस्मों का उपयोग करना जो उच्च तापमान को सहन कर सकें।
सूक्ष्म सिंचाई (micro irrigation): ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक से पानी की बचत और बेहतर उपयोग।
मल्चिंग (mulching): मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए फसल अवशेषों का उपयोग।
जैविक खेती (organic farming): मिट्टी की गुणवत्ता और जल धारण क्षमता बढ़ाने के लिए।
फसल विविधीकरण (crop diversification): मोटे अनाज (millets) जैसी कम पानी वाली फसलों को अपनाना।
9. सरकार और नीतिगत भूमिका (Policy Support)
सरकार की भूमिका इस संकट में अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसानों को weather forecasting, crop insurance और minimum support price (MSP) जैसी सुविधाएं समय पर मिलनी चाहिए।
इसके साथ ही कृषि अनुसंधान (agricultural research) और नई तकनीकों (innovation) को बढ़ावा देना आवश्यक है, ताकि बदलते जलवायु के अनुसार खेती को अनुकूल बनाया जा सके।
10. सामूहिक जिम्मेदारी (Collective Responsibility)
यह संकट केवल किसानों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। खाद्य सुरक्षा (food security) सीधे तौर पर खेती पर निर्भर करती है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर हर व्यक्ति तक पहुंचेगा।
हमें जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली (sustainable lifestyle) अपनानी होगी, ताकि इस संकट को कम किया जा सके।
निष्कर्ष
बढ़ते तापमान के इस दौर में खेती एक गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। यह केवल उत्पादन का संकट नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संकट भी है।
समाधान के लिए आवश्यक है कि हम पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संतुलन बनाएं। Sustainable agriculture और climate-smart practices को अपनाकर ही हम इस संकट से बाहर निकल सकते हैं।
अंततः, खेती को बचाना केवल किसानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी जिम्मेदारी है। यदि हम अभी से ठोस कदम उठाएं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है।









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