May 4, 2026 12:45 pm

May 4, 2026 12:45 pm

आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते,

अगर अपनी जिंदगी का हमें एतबार होता

ताजा ताजा बुद्ध पूर्णिमा मनाई गई है। महात्मा बुद्ध ने कहा था कि यदि आप उड़ना चाहते हैं तो वह सब कुछ छोड़ दें जो आपको नीचे खींचता है। ऐसा लगता है कि हरियाणा सरकार ने कर्णधारों ने महात्मा बुद्ध की इस सीख को ज्यादा ही दिल पे ले लिया है। उन्होंने न केवल वो छोड़ दिया है जो उनको नीचें खींचता है, बल्कि उस सब से भी किनारा कर लिया है जो उनको उड़ने के लिए प्रेरित करता हो। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि सरकार के कुछ लोग ना इधर के हैं, न उधर के हैं.. वो बीच में ही झूल रहे हैं। इसी अवस्था में परम आनंद को प्राप्त कर रहे हैं। इसी का रस ले रहे हैं। जहां वो खुद हैं, दूसरा भी कोई है तो वो खुद ही हैं। ये इनकी खुद से खुद की मुलाकात है। इसमें किसी दूसरे के लिए कोई स्थान नहीं है। मैं ही मैं हंू। तन्हाई ही तन्हाई है। इनको किसी से कुछ लेना नहीं है। कोई कुछ कह जाए। कुछ कर जाए..मगर इनको किसी से कोई सरोकार नहीं। इस चक्कर में ये भी हो जाता है कि ये मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अनाउसमेंटस को सिरे चढवाने की दिशा में भी ध्यान नहीं दे पाते। अब दे भी तो कैसे? ध्यान तो कहीं ओर लगाया हुआ है। जैसे कि अभी अभी देश दुनिया में गाजे बाजे के साथ 1 मई को मई दिवस या अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया गया। मई दिवस का इतिहास है कि 1 मई, 1886 को अमेरिका के करीब 13 हजार व्यवसायों में कार्यरत तीन लाख श्रमिकों ने काम समय-आवर तय करने के लिए आंदोलन कर दिया था। पहले जहां वो 14 से 18 आवर तक काम करते थे वहीं बाद में इसी आंदोलन के कारण उनके बाद में 8 आवर काम करने का हक हासिल हुआ। हालांकि इस मांग को पूरा करवाने के लिए श्रमिकों को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी। अब अपने हरियाणा में भी मजदूर हैं। उनको भी अपने हकों की लड़ाई लड़नी पड़ती है। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के संज्ञान में ये लाया गया कि श्रमिकों को उनका हक समय पर नहीं मिल पा रहा। अदालतों में उनके बहुत से मुकदमें लंबित रहते हैं। श्रमिकों के जो मुकदमें अदालतों में आते हैं वो किस्म किस्म के होते हैं। श्रमिकों की नौकरी खत्म करने,निलंबन,वेतन का भुगतान न होने, ओवरटाइम, ग्रेच्युटी, पीएफ से जुड़े विवाद,कार्यस्थल पर सुरक्षा,काम करने का दयनीय माहौल और श्रम अधिकारों की पालना न हो पाने जैसे मुददों पर श्रमिकों को लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर होना पड़ता है। हाईकोर्ट ने श्रमिकों को समय पर न्याय देने के लिए हरियाणा में 12 नई लेबर कोर्ट बनाने का प्रस्ताव पिछले बरस 2025 के मई महीने में सरकार को भेज दिया। लेबर कोर्टस के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, ज्यूडिशियल अधिकारियों-कर्मचारियों की भर्ती का प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी देने का प्रस्ताव हाईकोर्ट ने सरकार को साल भर पहले भेज दिया था। ये प्रस्ताव इधर उधर चक्करी काटता हुआ आखिरकार वित्त विभाग में पहुंच गया। यंू सोचिए कि वित्त विभाग में पहुंच कर इस प्रस्ताव को मोक्ष की प्राप्ति हो गई। ये स्वर्ग-नरक से मुक्त्त हो गया। वहां इस प्रस्ताव पर वित्त विभाग के ज्ञानी ज्ञानचंदों ने ऐसा गेड़ा दिया..ऐसा गेड़ा दिया कि इसकी ये सारी खुमारी उतार दी कि हाईकोर्ट हमारे सामने क्या है और सीएम की अनाउसमेंट हमारे सामने क्या हैं? असली सरकार तो हम हैं। हम ये तय करेंगे कि क्या होना है और क्या नहीं होना। और अगर होना है तो कैसे होना है। कभी ये आब्जैक्शन तो कभी ये क्लीरिफीकेशन। जब कभी इनके जवाब आ जाऐं तो मौके का बाबू बीड़ी जलाईते हुए कहे कि आज मेरा काम करने का मूढ नहीं है। कभी कहे कि आज मुझे और बहुत काम हैं। कभी कहे कि क्या मुझे सिर्फ यही एक काम है, तो कभी ये कहे कि मुझे इस काम से क्या काम है, तो कभी ये कह दे कि ऐसे ऐसे काम…सब बकवास है..जब कोई पैरवी के लिए मेरे पास आएगा तो फिर देखेंगे ये काम। अब मसला ये है कि इस काम की पैरवी करे तो कौन करे? क्या अपने हकों की लड़ाई लड़ रहे श्रमिक इसके लिए सरकार के सामने गिड़गिड़ाएंगे लेबर कोर्टस जल्द बन जाएं तो पैडिंग मुकदमों का जल्दी से निपटारा हो जाए। उनको अपने विवादों के सामधान के लिए दूर दराज के जिलों के चक्कर नहीं काटने होंगे।

अगर मैनजमेंट के हिसाब से देखा जाए तो श्रमिकों को समय पर इंसाफ मिलने से ये भी होगा कि हरियाणा के औद्योगिक विकास को गति मिलेगी। श्रम विवादों के जल्द समाधान से हड़ताल-धरने जैसे हालत कम होंगे। निवेश को गति मिलेगी। अब फिर वही बात के इस काम से किसी को लेना देना क्या है? जब तक टेबल दर टेबल बाबू को चढावा नहीं मिलेगा वो तो आब्जैक्कशन ठोकने और क्लीरीफिकेशन मांगने से बाज आएगें नहीं। वो तो इसी को काम समझते हैं। इन भले माणसों को ये मालूम नहीं कि अगर किसी दिन हाईकोर्ट ने सरकार से हल्के से कान में ही पूछ लिया कि हमने जो साल भर पहले आपको प्रस्ताव भेजा था उसका हुआ क्या है? और उस पर जुल्म ये कि ये सीएम की एनाउसमेंट भी है। आपको तो पता ही होगा कि सरकार में सीएम अनाउसमेंट लागू करने के नाम पर कितनों की ही रोजी रोटी चल रही है। बाकयदा इस काम के लिए आईएएस से लेकर नीचे के अधिकारियों-कर्मचारियों की फौज होती है। सीएम आफिस के अलावा हर विभाग के प्रशासकीय सचिव और विभागाध्यक्ष को ये समय समय पर समीक्षा करनी ही पड़ती है कि उनके विभाग की कुल कितनी सीएम अनाउसमेंट हुई हैं-इनमें से कितनी सिरे चढी-कितनी पैडिंग हैं- किस कारण से पैडिंग हैं-किस के पास कितनी देर से पैडिंग हैं-कितनी फिजीबल नहीं है। न जाने सीएम अनाउसमेंट के नाम पर सरकारों में क्या नहीं होता..सिवाय इसके कि इनको सिरे चढाने के लिए ठोस काम नहीं होता।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 हमें त्वरित न्याय का अधिकार देता है। अफसोस की सरकार में इसकी साफ साफ अवहेलना हो रही है। मार्च, 2026 के अपने एक इतिहासिक फैसले में पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि प्रशासनिक या वित्तीय सीमाओं के नाम पर किसी नागरिक के वैध अधिकारों को खत्म करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस मामले में हाईकोर्ट ने वित्त विभाग के एक शीर्ष अधिकारी का वेतन तक रोकने के आदेश दिए थे। ऐसे में जब यदि कोई हाईकोर्ट में जाकर ये बतला दे कि उनके भेजे प्रस्ताव पर वित्त विभाग वाले लंबे समय से मुझे क्या और मेरा क्या खेल खेल रहे हैं, तो सोचिए ये खेल खेलने वालों के साथ कितना बड़ा खेला हो सकता है? खैर.. सरकारों में ये सब होता रहता है। सरकार चलाने वाले,सरकार को बनाने वाले और सरकार को भुगतने वालों के लिए ये रूटीन का मामला होता है। मसला ये है कि जहां हाईकोर्ट और सीएम का नाम जुड़ा है वहां तो सरकार के कर्णधारों को इस काम को तव्वजों देने की कोशिश कर ही लेनी चाहिए। उनकी मजबूरियां हम समझते हैं,लेकिन सितम ये है कि वो हमारी मजबूरियां नहीं समझते। सरकारी बाबूओं के अंदाज को सलाम करते हुए यही कहा जा सकता है..

तेरी जुल्फें,तेरी लाली और ये कातिल अदायें,
यंू ही जान मांग लेते,ये बेशुमार इंतजाम क्यों किए

हाल ए जजपा
हरियाणा में एक राष्ट्रीय स्तर की सियासी पाटी है जजपा। जजपा में अंतरराष्ट्रीय पार्टी हो जाने की प्रचुर मात्रा में संभावनाएं हैं। जजपा वाले सियासीथर्मामीटर लेकर राजनीतिक माहौल चैक करने के लिए काफी समय से इधर उधर दौड़ भाग कर रहे हैं। भटक रहे हैं। गुणा भाग कर रहे हैं। किसे ऐसा मुददा बनाया जाए कि हमें जनता का साथ मिल जाए। कई तरह से कई तरह के प्रयोग कर लिए। माफी भी मांग ली पब्लिक से इन्होंने। इनका कोई स्टंट अभी तक काम नहीं आ पाया है। अब तक तो मामला निल बटा सन्नाटा ही है। जनता को तो इनकी असलियत मालूम है और अच्छा ये है कि इनको भी अपनी असलियत अच्छे से मालूम है। वो इसलिए कि पिछले चुनाव में इनको विधानसभा की न केवल सभी सीटों पर हार मिली,बल्कि ज्यादातर सीटों पर इनकी जमानत जब्त हुई। कहां तो एक तरफ ये राजस्थान में विधानसभा का चुनाव लड़ कर किंग मेकर बनने के सपने पल रहे थे और कहां ये नौबत आ गई है कि ये हरियाणा में हो रहे स्थानीय निकाय चुनावों से ही पीठ दिखा कर भाग खड़े हुए। अब हालात ये है कि जो मिलता है वही इनको आइना दिखा देता है। कभी किसान तो कभी नौजवान, हर जगह इनको बेइज्जत होना पड़ रहा है। अब तो हालत ये हो गई है पुलिस के तीसरे दर्जे के कर्मचारी ही इनको बीच सड़क के आंख दिखा देते हैं। जब वो इन पुलिस वाले की शिकायत एसपी को करते हैं तो वहां भी इनकी दाल नहीं गलती। रही सही कसर हिसार रेंज के एडीजीपी पूरी कर देते हैं। एडीजीपी के साथ इस राष्ट्रीय पार्टी के हाई फाई नेताओं मीटिंग की सिलैक्टिव-एडिटिडि वीडियो फुटेज इन दिनों काफी चर्चा में है। इस मामले की पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में भी सुनवाई हो रही है। देखते हैं कि वहां से इनके लिए क्या खबर आती है।

महिला कल्याण को व्याकुल नेतागण
देश और प्रदेश की महिलाओं के लिए अच्छी खबर है कि उनका उद्धार करने,राजनीति में उनका हक दिलाने,आगे बढाने के लिए हमारी संसद और विधानसभा में बैठे लोग व्याकुल हुए जा रहे हैं। उनके लिए संसद और विधानसभा में 33 फीसदी सीट आरक्षित करने के लिए सभी पार्टियों के नेता आम सहमति से भी आगे की सहमति दे चुके हैं।संसद और हरियाणा विधानसभा में इन नेताओं के भाषण सुन कर महिलाओं का कलेजा भर आया होगा कि उनको उनका हक दिलाने के लिए ये लोग इतनी शिददत से जुटे हुए हैं और कभी महिलाओं को इसकी खबर भी नहीं हुई। बड़े बड़े नेताओं ने बड़ी बड़ी फेंकी। दूर की हांकी। खूब पेली। महिला सम्मान में इनके भाषण सुनकर आंखें डबडबा गई। हकीकत में इस भाषणबाजी का नतीजा कुछ नहीं निकला। कानून तो जब बनेगा बनेगा। पता नहीं बनेगा भी या नहीं बनेगा। बनेगा तो कैसा बनेगा। मगर सवाल ये है कि क्या बिना कानून बनाए आधी आबादी को उनका हक नहीं दिया जा सकता? अब सरकारों में 33 फीसदी के हिसाब से महिलाओं को मंत्री बनाने पर किसने रोका है? महिलाओं को पार्टी संगठन में 33 फीसदी पद देने पर किसने रोका है? अब महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 फीसदी टिकट देने से राजनीतिक दलों को किसने रोका है? मगर ये सब तो करना नहीं,बाते करनी हैं फिजूल की। शायद ऐसे ही माहौल के लिए कहा गया है..
झूठ के आगे पीछे दरिया चलते हैं
सच बोला तो प्यासा मारा जाएगा

योगदान को सलाम
हरियाणा विधानसभा के सत्र में महिलाओं के बारे में बहुत से नेताओं ने बड़ी बड़ी बातें कहीं। इनैलो के रानियां के विधायक अर्जुन चौटाला ने कहा कि उनके पड़दादा जननायक स्व.देवीलाल और दादा ओमप्रकाश चौटाला ने राजनीति में जो बुलंदी छुई उनमें उनकी बीवियों का बहुत बड़ा योगदान था। ये महिलाएं ही थी जो रसाई में देर रात तक खाना बनवा कर लोगों को खिलाती थी। खुद भी रसोई में काम करती थी और करवाती थी। इज्जत बढाती थी। यहां तक की उनके गांव में प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी,चंद्रशेखर तक आए और उनकी दादियों के हाथ का खाना खा कर उनकी तारीफ करके गए। इन महिलाओं का काम और योगदान अतुलनीय है। इन महिलाओं की शख्सियत को सलाम करते हुए कहा जा सकता है..

कितना कुछ जानता होगा मेरे बारे में वो शख्स,
जिसने मुझे हंसते हुए देख कर पूछा उदास क्यों हो

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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