कैंसर से जूझती मां, टूटा पैर और फिर विनेश पर जीत…
एशियन गेम्स ट्रायल में मीनाक्षी ने किया बड़ा उलटफेर, विनेश फोगाट का सपना टूटा
रमेश गोयत
चंडीगढ़/नई दिल्ली, 30 मई। हरियाणा के जींद जिले के छोटे से गांव चाबरी की बेटी मीनाक्षी गोयत ने एशियन गेम्स 2026 के चयन ट्रायल्स में ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने पूरे भारतीय कुश्ती जगत को चौंका दिया। दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में खेले गए महिलाओं के 53 किलोग्राम भारवर्ग के सेमीफाइनल मुकाबले में मीनाक्षी ने अनुभवी ओलिंपियन और स्टार पहलवान को 6-4 से हराकर सबसे बड़ा उलटफेर कर दिया।
इस हार के साथ विनेश फोगाट का जापान में होने वाले एशियाई खेलों में खेलने का सपना टूट गया, जबकि मीनाक्षी गोयत अचानक देशभर में चर्चा का चेहरा बन गईं। हालांकि फाइनल में उन्हें से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन विनेश पर मिली जीत ने उन्हें नई पहचान दिला दी।

“डॉक्टरों ने कहा था चलना मुश्किल होगा, लेकिन मैंने हार नहीं मानी”
25 वर्षीय मीनाक्षी गोयत की कहानी केवल एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि दर्द, संघर्ष और अटूट हौसले की मिसाल है। एक समय ऐसा भी आया जब डॉक्टरों ने कह दिया था कि उनके लिए सामान्य रूप से चल पाना भी मुश्किल हो सकता है। लेकिन मीनाक्षी ने हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय खुद को और मजबूत बनाया।
आज वही खिलाड़ी देश की दिग्गज पहलवानों को चुनौती दे रही हैं और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करने की तैयारी में हैं।
जींद के छोटे गांव से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर
मीनाक्षी हरियाणा के जींद जिले के चाबरी गांव की रहने वाली हैं। वह तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। बेटी के टैलेंट को देखते हुए परिवार ने बड़ा फैसला लिया और बेहतर प्रशिक्षण के लिए जींद से सोनीपत शिफ्ट हो गया।
उनके पिता प्रेम गोयत सोनीपत में डेयरी चलाते हैं। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने बेटी की ट्रेनिंग, डाइट और प्रतियोगिताओं में कभी कमी नहीं आने दी। मीनाक्षी ने खेल के साथ पढ़ाई भी जारी रखी और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से बीए की डिग्री हासिल की।
जॉन सीना को टीवी पर देखकर जागा पहलवान बनने का सपना
मीनाक्षी के पिता बताते हैं कि बचपन से ही उनकी बेटी को कुश्ती का जुनून था। WWE सुपरस्टार उनके पसंदीदा खिलाड़ी रहे हैं। टीवी पर जॉन सीना को देखकर ही उन्होंने पहलवान बनने का सपना देखा।
महज 10 साल की उम्र में उन्होंने कुश्ती की ट्रेनिंग शुरू कर दी। शुरुआती प्रशिक्षण के लिए उन्हें निडानी स्पोर्ट्स हॉस्टल भेजा गया, जहां से उनके खेल करियर की मजबूत नींव रखी गई।
मां के कैंसर ने परिवार को झकझोरा, लेकिन बेटी नहीं टूटी
मीनाक्षी की जिंदगी का सबसे कठिन दौर तब आया जब उनकी मां को कैंसर होने का पता चला। पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक तनाव से गुजर रहा था। लेकिन मीनाक्षी ने मुश्किलों के बीच भी अभ्यास जारी रखा।
उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने 2016 में सब-जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी प्रतिभा साबित कर दी। इसके बाद 2018 में जूनियर राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया।
एक चोट ने करियर खत्म करने की दी थी चेतावनी
साल 2019 में अंडर-23 राष्ट्रीय प्रतियोगिता के दौरान मुकाबले में फिसलने से मीनाक्षी के पैर में गंभीर चोट लग गई। चोट इतनी गंभीर थी कि डॉक्टरों ने यहां तक कह दिया कि उनके लिए सामान्य रूप से चलना भी मुश्किल हो सकता है।
वह छह महीने से ज्यादा समय तक बिस्तर पर रहीं। इस दौरान दूसरे खिलाड़ियों को मेडल जीतते देखकर वह कई बार निराश हुईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
बिस्तर से उठकर फिर मैट पर लौटने की जिद ने बदली किस्मत
लंबे इलाज और रिहैब के बाद मीनाक्षी ने दोबारा ट्रेनिंग शुरू की। उन्होंने खुद को फिट किया, वजन कम किया और फिर से मैट पर वापसी के लिए कड़ी मेहनत की।
उनकी मेहनत रंग लाई और एक साल के भीतर ही उन्होंने राष्ट्रीय चैंपियनशिप का खिताब जीत लिया। इसके बाद उन्होंने 53 किलोग्राम भारवर्ग में लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी मजबूत पहचान बना ली।
सिल्वर मेडल से लेकर विनेश पर जीत तक चमका करियर
पिछले महीने मीनाक्षी ने सीनियर एशियन चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतकर अपनी फॉर्म का संकेत दे दिया था। वह राष्ट्रीय स्तर पर दो बार चैंपियन भी रह चुकी हैं।
एशियन गेम्स चयन ट्रायल्स में उन्होंने दमदार प्रदर्शन करते हुए भारतीय कुश्ती की दिग्गज पहलवान को हराकर अपने करियर की सबसे बड़ी जीत दर्ज की।
वहीं विनेश फोगाट ने भी ट्रायल में शानदार शुरुआत की थी। उन्होंने पहले मुकाबले में ज्योति को 7-1 से हराया और क्वार्टरफाइनल में निशु के खिलाफ 0-5 से पिछड़ने के बाद शानदार वापसी करते हुए मुकाबला 7-6 से जीत लिया था। लेकिन सेमीफाइनल में मीनाक्षी के आक्रामक खेल के सामने वह टिक नहीं सकीं।
संघर्ष की मिसाल बनी हरियाणा की बेटी
मीनाक्षी गोयत की कहानी उन खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल हालात में अपने सपनों को छोड़ देते हैं। मां की बीमारी, गंभीर चोट और लंबे संघर्ष के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आज देश की सबसे चर्चित महिला पहलवानों में शामिल हो चुकी हैं।













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