June 23, 2026 11:23 am

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शहर किसके लिए: वाहन या नागरिक?

-डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत के शहर तेजी से बढ़ रहे हैं। महानगरों से लेकर मध्यम और छोटे शहरों तक शहरीकरण की गति अभूतपूर्व है। आर्थिक विकास, रोजगार के अवसरों और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग प्रतिवर्ष शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। किंतु इस तीव्र शहरी विस्तार के बीच एक बुनियादी प्रश्न अक्सर उपेक्षित रह जाता है—क्या हमारे शहर अपने नागरिकों के लिए चलने योग्य (Walkable) हैं? क्या सड़कें केवल वाहनों के लिए हैं या मनुष्यों के लिए भी?
हाल ही में न्यायपालिका द्वारा सुरक्षित फुटपाथों पर चलने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और गरिमा के अधिकार से जोड़ते हुए मौलिक अधिकार की संज्ञा दिए जाने की दिशा में महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की गई हैं। यह एक स्वागत योग्य संवैधानिक प्रोत्साहन है, क्योंकि यह पहली बार शहरी अवसंरचना को केवल निर्माण और यातायात के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और मानव गरिमा के संदर्भ में देखने का प्रयास करता है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या केवल न्यायिक घोषणा या कानूनी मान्यता से भारतीय शहर वास्तव में पैदल यात्रियों के अनुकूल बन जाएंगे? इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक है। वास्तविक परिवर्तन तब आएगा जब शहरी नियोजन की सोच वाहन-केंद्रित मॉडल से हटकर मानव-केंद्रित मॉडल की ओर अग्रसर होगी और समाज में पैदल चलने को सम्मानजनक एवं प्राथमिक परिवहन माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाएगा।

भारत में पैदल चलना कोई सीमित गतिविधि नहीं है। विभिन्न सरकारी और स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार देश में बड़ी संख्या में दैनिक यात्राएँ पूरी या आंशिक रूप से पैदल ही की जाती हैं। गरीब, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएँ, बुजुर्ग और दिव्यांग नागरिक सबसे अधिक पैदल यात्रा करते हैं। इसके बावजूद शहरी नियोजन में पैदल यात्रियों को सबसे कम प्राथमिकता मिलती है। अधिकांश शहरों में फुटपाथ या तो हैं ही नहीं, या इतने संकरे, टूटे हुए और अतिक्रमण से घिरे होते हैं कि उनका उपयोग करना कठिन हो जाता है। कई स्थानों पर फुटपाथ पार्किंग स्थल, दुकानों के विस्तार, ठेलों या निर्माण सामग्री के भंडारण में परिवर्तित हो जाते हैं।
इस स्थिति का सबसे दुखद परिणाम सड़क दुर्घटनाओं में दिखाई देता है। भारत विश्व में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के मामले में अग्रणी देशों में है। इन दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या पैदल यात्रियों की होती है। सड़क पार करने, फुटपाथों की अनुपलब्धता और वाहनों की तेज गति के कारण हजारों लोग प्रतिवर्ष अपनी जान गंवाते हैं। यह केवल परिवहन का संकट नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और मानवाधिकार का भी प्रश्न है।

संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करता है। समय के साथ न्यायपालिका ने इसकी व्याख्या का दायरा बढ़ाते हुए स्वच्छ पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे अधिकारों को भी इसमें शामिल किया है। सुरक्षित पैदल मार्गों का अधिकार इसी प्रगतिशील संवैधानिक दृष्टिकोण का विस्तार है। जब कोई नागरिक अपने घर से विद्यालय, कार्यालय, अस्पताल या बाजार तक सुरक्षित रूप से नहीं पहुँच सकता, तब उसके जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार अधूरा रह जाता है। इसलिए फुटपाथ केवल सीमेंट और कंक्रीट की संरचना नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता और समानता का प्रतीक हैं।

फिर भी केवल अधिकार की घोषणा पर्याप्त नहीं है। भारत में अनेक अधिकारों को कानूनी मान्यता प्राप्त होने के बावजूद उनके क्रियान्वयन में गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं। शिक्षा का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार और भोजन का अधिकार इसके उदाहरण हैं। इसी प्रकार फुटपाथ के अधिकार को भी व्यवहार में उतारने के लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति, वित्तीय निवेश और संस्थागत सुधार आवश्यक होंगे।
भारतीय शहरी शासन की सबसे बड़ी समस्या इसका वाहन-केंद्रित दृष्टिकोण है। स्वतंत्रता के बाद विकास का जो मॉडल अपनाया गया, उसमें चौड़ी सड़कों, फ्लाईओवरों और एक्सप्रेसवे को आधुनिकता का प्रतीक माना गया। शहरों की सफलता को वाहनों की गति और सड़क क्षमता के आधार पर मापा गया। परिणामस्वरूप पैदल यात्री, साइकिल चालक और सार्वजनिक परिवहन उपयोगकर्ता हाशिए पर चले गए। नगर नियोजन का उद्देश्य लोगों की सुविधा के बजाय वाहनों की निर्बाध आवाजाही बन गया।

यह दृष्टिकोण सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के भी विपरीत है। भारत में निजी कारों का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, जबकि अधिकांश नागरिक सार्वजनिक परिवहन, साइकिल या पैदल यात्रा पर निर्भर हैं। इसके बावजूद सार्वजनिक धन का बड़ा हिस्सा उन परियोजनाओं पर खर्च होता है जो मुख्यतः वाहन मालिकों को लाभ पहुँचाती हैं। इससे संसाधनों के वितरण में असमानता बढ़ती है और गरीब वर्गों की गतिशीलता प्रभावित होती है।
फुटपाथों की स्थिति लैंगिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। महिलाएँ, विशेषकर कामकाजी महिलाएँ और छात्राएँ, सुरक्षित और प्रकाशयुक्त पैदल मार्गों पर अधिक निर्भर रहती हैं। खराब फुटपाथ, अपर्याप्त रोशनी और असुरक्षित सार्वजनिक स्थान उनके आवागमन को सीमित करते हैं। इसी प्रकार बुजुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए बाधा-रहित फुटपाथ जीवन की आवश्यक शर्त हैं। यदि शहरी अवसंरचना इन समूहों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती, तो शहर समावेशी नहीं कहे जा सकते।

मानव-केंद्रित शहरी नियोजन का विचार इसी संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इसका मूल सिद्धांत है कि शहरों को वाहनों के लिए नहीं, बल्कि लोगों के लिए डिज़ाइन किया जाना चाहिए। सड़कें केवल यातायात गलियारे नहीं, बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक स्थान भी हैं। फुटपाथ, साइकिल ट्रैक, हरित क्षेत्र, सार्वजनिक परिवहन और सार्वभौमिक पहुँच (Universal Accessibility) इस मॉडल के प्रमुख तत्व हैं।
विश्व के अनेक शहरों ने इस दिशा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। यूरोप और लैटिन अमेरिका के कई शहरों ने पैदल यात्रियों और सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देकर सड़क दुर्घटनाओं में कमी, वायु प्रदूषण में नियंत्रण और नागरिक जीवन की गुणवत्ता में सुधार हासिल किया है। इन अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि सुरक्षित और चलने योग्य शहर केवल यातायात प्रबंधन का विषय नहीं, बल्कि समग्र शहरी विकास की रणनीति हैं।

भारत में भी कुछ सकारात्मक पहलें देखने को मिली हैं। कुछ शहरों ने ‘कम्प्लीट स्ट्रीट्स’ की अवधारणा को अपनाने का प्रयास किया है, जिसके अंतर्गत सड़कों को सभी उपयोगकर्ताओं के लिए सुरक्षित बनाया जाता है। स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत भी कई स्थानों पर फुटपाथों के विकास और सार्वजनिक स्थलों के पुनरोद्धार के प्रयास हुए हैं। किंतु इन पहलों का प्रभाव अभी सीमित है और वे व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन का रूप नहीं ले सकी हैं।
इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। पहला, शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय और प्रशासनिक क्षमता सीमित है। अधिकांश नगर निकाय संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। दूसरा, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय का अभाव है। सड़क निर्माण, यातायात प्रबंधन, जल निकासी, बिजली और दूरसंचार से जुड़ी एजेंसियाँ अलग-अलग कार्य करती हैं, जिसके कारण फुटपाथ बार-बार खोदे जाते हैं और उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। तीसरा, नागरिक सहभागिता का अभाव है। योजनाएँ अक्सर ऊपर से नीचे (Top-down) दृष्टिकोण से बनाई जाती हैं, जिनमें स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।

फुटपाथों के अधिकार की सफलता के लिए केवल कानूनी उपायों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। न्यायालय किसी अधिकार की घोषणा कर सकते हैं और सरकारों को निर्देश दे सकते हैं, लेकिन शहरों के चरित्र को बदलने के लिए सामाजिक और प्रशासनिक परिवर्तन आवश्यक है। यह परिवर्तन सबसे पहले नीति-निर्माण में दिखाई देना चाहिए। शहरी परिवहन नीतियों में पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रत्येक सड़क परियोजना में फुटपाथ, सुरक्षित क्रॉसिंग और दिव्यांग-अनुकूल सुविधाओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

दूसरा, बजट आवंटन में परिवर्तन आवश्यक है। यदि नगर निकायों के अधिकांश संसाधन फ्लाईओवर और सड़क चौड़ीकरण पर खर्च होते रहेंगे, तो पैदल यात्री सुविधाएँ कभी प्राथमिकता नहीं बन पाएंगी। सार्वजनिक निवेश का एक निश्चित भाग गैर-मोटर चालित परिवहन के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए।
तीसरा, शहरी संस्कृति में बदलाव लाना होगा। भारतीय समाज में निजी वाहन, विशेषकर कार, सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माने जाते हैं। इसके विपरीत पैदल चलने को अक्सर मजबूरी समझा जाता है। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक नीति और व्यवहार में पैदल यात्रियों को उचित सम्मान नहीं मिल सकेगा। शहरों को इस विचार को बढ़ावा देना होगा कि पैदल चलना केवल गरीबों का साधन नहीं, बल्कि स्वस्थ, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली का हिस्सा है।

चौथा, तकनीक और डेटा का बेहतर उपयोग किया जाना चाहिए। दुर्घटना-प्रवण क्षेत्रों की पहचान, पैदल यात्री यातायात का आकलन और अवसंरचना की नियमित निगरानी से अधिक प्रभावी योजनाएँ बनाई जा सकती हैं। स्मार्ट शहरों की अवधारणा तभी सार्थक होगी जब तकनीक का उपयोग नागरिकों की सुरक्षा और सुविधा बढ़ाने के लिए किया जाए।
पाँचवाँ, जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। यदि किसी सड़क परियोजना में मानक फुटपाथों का निर्माण नहीं होता या निर्माण के बाद उनका रखरखाव नहीं किया जाता, तो संबंधित एजेंसियों को उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। शहरी शासन में पारदर्शिता और सामाजिक लेखा-परीक्षा इस दिशा में सहायक हो सकती है।
हालाँकि इस विचार की कुछ सीमाएँ भी हैं। भारत के घनी आबादी वाले और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़े शहरों में फुटपाथों का उपयोग केवल पैदल यात्रियों द्वारा नहीं किया जाता। रेहड़ी-पटरी विक्रेता, छोटे व्यापारी और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक भी इन्हीं स्थानों पर अपनी आजीविका चलाते हैं। इसलिए फुटपाथों को अतिक्रमण-मुक्त बनाने की प्रक्रिया को मानवीय और संतुलित दृष्टिकोण से लागू करना होगा। केवल बेदखली की कार्रवाई सामाजिक संघर्ष को जन्म दे सकती है। समाधान यह है कि शहरी नियोजन में आजीविका और गतिशीलता दोनों के लिए पर्याप्त स्थान सुनिश्चित किया जाए।

अंततः सुरक्षित फुटपाथों पर चलने का अधिकार भारतीय लोकतंत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह अधिकार हमें याद दिलाता है कि शहरों का वास्तविक उद्देश्य नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है, न कि केवल वाहनों की गति बढ़ाना। किंतु इस अधिकार की सफलता न्यायालयों के आदेशों से अधिक इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या भारत अपने शहरी विकास मॉडल को मानव-केंद्रित बना पाता है। यदि शहरी शासन पैदल यात्रियों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की आवश्यकताओं को केंद्र में रखकर योजनाएँ बनाता है, तो शहर अधिक सुरक्षित, समावेशी और टिकाऊ बन सकते हैं।
इसलिए सुरक्षित फुटपाथों को मौलिक अधिकार घोषित करना एक महत्वपूर्ण शुरुआत अवश्य है, परंतु यह मंज़िल नहीं है। वास्तविक लक्ष्य ऐसे शहरों का निर्माण होना चाहिए जहाँ प्रत्येक नागरिक बिना भय, बाधा और असुरक्षा के गरिमा के साथ चल सके। यही मानव-केंद्रित शहरीकरण का सार है और यही भारत के भविष्य के शहरों की पहचान भी होनी चाहिए।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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