July 13, 2026 5:06 am

July 13, 2026 5:06 am

आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

यू ही मीलों चलता रहा मोहब्बत का कारवां,
ना लैला ऊंट से उतरी, ना मजनुओं ने पीछा छोड़ा
एक विषय जिसके प्रति सरकारों में अफसरों और नेताओं में गजब का आकर्षण पाया गया है वो है विभागों,बोर्ड,निगमों में होने वाली सरकारी खरीद। पिछले दिनों एक खबर पढने को मिली कि हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग में बच्चों का भविष्य बनाने से पहले खुद का भविष्य बनाने की होड़ लगी हुई है। इसी प्रोग्राम के तहत सरकारी स्कूलों की सार्इंस लैब के लिए खरीदा जाने वाला सामान दो से 17 गुना तक महंगे दामों पर खरीदा गया। उस पर सोने पर सुहागा ये है कि सरकारी स्कूलों की प्रयोगशाला के लिए खरीदी गई इन किटस का इस्तेमाल ही नहीं हो पाया। 729 सरकारी स्कूलों के लिए खरीदी गई ये किटस दो बरस से प्रयोगशालाओं में धूल फांक रहीं हैं। इस सारे सामान की सारी खरीद प्रक्रिया महज दो सप्ताह में तुरता फुरती में निपटा दी गई। एक तरफ शिक्षा विभाग के लोग ऐसे काम इतनी मुस्तैदी से काम करते हैं और लोग हैं कि ये मानने को तैयार ही नहीं कि यहां इतनी तेजी से फाइलों को पहिए लगते होंगे। ये ठीक है कि यहां बहुत से बाबू मुख्यमंत्री के आदेशों पर भी कुंडली मारे बैठे रहते हैं,लेकिन इसका मतलब ये हरगिज नहीं निकाला जाना चाहिए कि जहां उनका खुद का इंट्रैस्ट होता होगा वहां ये लोग क्या क्या गुल नहीं खिलाते होंगे? क्या उन लोगों की जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए कि ये बाजार भाव से इतनी ऊंची दरों पर सामान क्यों खरीद गया? और जब खरीद हो गई तो इस सामान का इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ? ये साामन क्यों प्रयोगशालाओं में धूल फांक रहा है? शिक्षा विभाग के मौजूदा कर्णधारों ने ये मामला सार्वजनिक होने के बाद क्या किया? क्या उन्होंने किसी जांच एजेंसी को इसकी जांच करवाने की सिफारिश करी? यदि नहीं करी, तो क्यों नहीं करी? अब सरकार में सरकार का खौफ ही खत्म हो गया। गदर सा मचा हुआ है। आईडीएफसी और ईयू स्माल बैंक का फ्राड हम सबके सामने हैं। शिक्षा विभाग का तो ये उदाहरण सामने आ गया है। पता नहीं ऐसे ही काम और विभागों में किस किस रूप में, कैसे कैसे हो रहें होंगे। ऐसा लगता है कि किसी को किसी का डर ही नहीं रहा।

काम एक, लक्ष्य एक, मंजिल एक, तरीके अनेक
हर कोई खुल के बैटिंग करने पर लगा है। जिस देखो वही खेल कर रहा है। खेल का तरीका अलग अलग है। कुछ लोग थोड़ा बच बच के काम करते हैं। संभल के काम करते हैं। खुद कुछ करने या फाइल पर लिखने-पढने से बचते हैं, बल्कि ये सारा कार्यक्रम अपने अधीनस्थ से करते और करवाते हैं। यानी कल को मुंडी दबोची जाए तो नीचे वाले की और सारा माल मैं खुद गलप लंू। कुछ लोग इतने शातिर होते हैं कि खरीदने-काम देने के काम को अंजाम देने के लिए विभाग में मैसेज दे देंगे कि सारा काम मेरे ही इशारे से करना है। खुद मीटिंग करेंगे.. पार्टी से अनआफिशियल। सरकारी कागजों में कहीं इस मीटिंग का जिक्र नहीं आने देंगे। पार्टी को सिग्नल दे देंगे कि रियल बोस कौन है। फिर दो-चार अधीनस्थ लोगों की कमेटी बना देंगे। ऐसा लगेगा सारे कामों का फैसला ये कमेटी करेगी। टेंडर देने,सामान खरीदने,पेमेंट जारी करने आदि की सारी जिम्मेदारी इस कमेटी की होगी। फिर कमेटी वाले को कह देंगे कि फलां को ये काम देना है। फलां की पेमेंट कर देना। फिर झट से बाहर की बाहर अपना कमीशन गड़प किया और चल मेरे भाई। गन्ना उखाड़ो और चलो खेत से बाहर। कागजों को नीचे वाले से इतने होशियारी से ड्राफ्ट करवाएंगे कि एक एक कोमा, सेमी कालम, अर्धविराम खुद चैक करेंगे। सब अनओफिशियली। कागजों में खुद की कहीं कोई जवाबदेही नहीं।

चालाकी की इतनी इंतहा करेंगे…पूछिए मत। सब जिम्मेदारी नीचे वाले की। सब तोहमत नीचे वाले की। जरूरी नहीं कि हर कोई इतनी सफाई से ही ये काम करे। कुछ हैं कि खुल्लेआम करते हैं। बिना किसी डर के करते हैं। पहले इस तरफ कुछ खास लोग ही दिलचस्पी लेते थे,लेकिन वक्त गुजरने के साथ अब हर कोई इस कार्यक्रम में पारंगत होता आ रहा है। ये कोई एक सरकार का किस्सा नहीं हैं। ये सिलसिला तो अनादि अनंत काल से चला सा आ रहा है और हर सरकार ने अपने हिसाब से इस यज्ञ में आहुति डाली है। जहां एक तरफ सिस्टम को सुधारा जाता है,उसका दायरा व्यापक किया जाता है, वहीं हरियाणा का सप्लाईज एंड डिस्पोजल विभाग ऐसा है जिसमें मुटठी भर लोगों का ही स्टाफ है। ये विभाग ही एक करोड़ से अधिक की सरकारी खरीद को सिरे चढाने के लिए जाना पहचाना जाता है। अब तो यहां इस विभाग के जरिए पांच करोड़ से अधिक के सरकारी कामों के टेंडर भी होने लगे हैं। एक मौटे अनुमान के अनुसार हरियाणा में हर बरस करीब 1500 करोड़ की खरीद को अंजाम तक पहुंचाया जाता है। इस विभाग में सीमित स्टाफ की एक वजह ये हो सकती है कि ज्यादा लोग होने से कार्यक्षमता प्रभावित होगी। हालांकि कुछ दिलजले लोग ऐसे भी हैं जो ये मानते होंगे कि ज्यादा लोग होने से उनको कमीशन कम मिलेगा, इसलिए मैनेजमेंट के इस थंब रूल की पालना की जाए कि जितने कम लोग, उतना मुस्तैदी से काम। अब इस विभाग में पहले वाला गदरफंड नहीं है। वर्ना एक समय तो एक निदेशक ने अपने एक चेले के साथ यहां इतना गदर मचाया कि अगर उनके कार्यकाल की सीबीआई जांच हो जाए तो आईडीएफसी से बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। इस विभाग में एक अलग ही व्यवस्था बना दी गई है कि कौन सा एजैंडा खरीद कमेटी की मीटिंग में जाएगा और कौन सा नहीं ये अधिकार सबंधित विभाग के प्रशासकीय सचिव को नहीं होगा। ये अधिकार सप्लाईज व डिस्पोजल विभाग के निदेशक को होगा। यहां कई बरसों बरस ये होता रहा कि खरीद के कई एजैंडे पर कोई भी मामूली सा आब्जैक्शन लगा कर उसे खरीद कमेटी की मीटिंग में आने से रोक लिया जाता। उसके बाद सबंधित उद्यमी-सप्लायर जब दडवंत हो जाते तो उस से खरीद का एजैंडा लगाने के ही पैसे झाड़ लिए जाते थे। इस हालात पर कहा जा सकता है कि..

पत्थर तमाम शहर के सितमगर हो गए
जितने थे आइने वो मेरे घर के हो गए
शायद कि ये जमाना उन्हें पूजने लगे
कुछ लोग इस ख्याल से पत्थर के हो गए
मेरी बुलंदियों पे थी जिन की नजर
मैं खुश हंू वो मेरे बराबर के हो गए
खरीद-टैंडर के मानक बनाने में खेल
एक इसी तरह से दूसरे नाम से दूसरी दुकान सरकार में मैडीकल सप्लाईज कारपोरकेशन के नाम से बनी हुई है। जैसा कि इसके नाम से साफ है कि दवाईयों और चिकित्सा उपकरणों के लिए खरीद का काम इस विभाग के जरिए किया जाता है। ये एक खुला राज है कि पंचकूला सेकटर-6 के दो कैमिस्ट एसोसिएशन इस खरीद को बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं। वो खरीदे जा रहे सामान की स्पैसीफिकेशन से लेकर और भी इसी प्रक्रिया से जुड़े कामों को प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर प्रभावित करने की हैसियत रखते हैं। एक और गजब का विभाग है आईटी। इस पर आमतौर पर ज्यादा सी किसी की नजर नहीं रहती। यहां जो होता है और जो होने की संभावना रहती है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। मसलन एक सोफ्टवेयर एक लाख रूपए में भी डवैलप हो सकता है और इसी नेक काम के पांच करोड़ रूपए भी सरकार से वसूले जा सकते हैं। अब हरियाणा के शिक्षा विभाग में एक समय करीब 1200 करोड़ के टैबलेटस बच्चों को दिए गए थे। कहते हैं कि उनकी स्पीसीफिकेशन बनाने के मामले में भी खासा दिमाग लगाया गया था। कुछ लोग बिना बात की बात बनाते हैं कि सारी स्पीसीफिकेशन किसी एक ऐसी कंपनी के लिए बनाई गई कि वो ही इस माल को स्पलाई करने का टेंडर ले सके। अब दूर से देखोगे तो सारा मामला उच्च कोटि की पारदर्शिता से जुड़ा हुआ लगेगा। सरकार को इस मामले में भी विरोधियों को चपत रसीद करने के लिए इसकी भी जांच करवा ही देनी चाहिए ताकि सब दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। इसी तरह से एक गदर विकास व पंचायत विभाग में भी मचता रहा है। जैसा कि नाम से भी साबित हो रहा है कि यहां सारा जोर विकास पर है। यहां इस विभाग में एक समय पर ऐसे ऐसे मंत्री रहे कि उन्होंने धुम्मा ठा दिया। उनके समय में विभाग में खरीद का अलग ही लवैल था। जो टीवी कोई 30 हजार में भी लेने से कतराएगा, वो तीन-तीन लाख रूपए में खरीदे गए। पंचायतों को चेप दिए गए। अब ये सारे टीवी बिना इस्तेमाल के धूल फांक रहे हैं। महंगी दरों पर फोगिंग मशीने खरीदी गई। कूड़ा फेंकने की रेहड़ी खरीदी गई। स्ट्रीट लाइटस खरीदी गई। लाइब्रेरी के लिए किताबें और फर्नीचर खरीदा गया। भले ही पंचायत घरों में इनको रखने के लिए जगह ना हो-इन पर बैठने के लिए लोग उपलब्ध ना हों, पर सरकार ने तो इस विभाग के अनुरूप विकास करना है।

सब ने रल मिल के विकास की बां.. बां..पां..पां.. बैजा..बैजा करा छैड्डी।
इंजीनियरिंग विभागों की मायावी दुनिया-महिमा
इसी तरह से नगर निकाय विभाग में भी विकास की सरपट दौड़ लगी रहती है। यहां भी लोग क्यों ही पीछे रहेंगे? जब सभी तरफ गदर मचा हुआ तो यहां भी तो बहती गंगा में हाथ धोया जाएगा के नहीं। यहां सरकारी खरीद के मामले में जितना कम कहा जाए उतना ही थोड़ा। यंू तो यहां लिखने को अनंत किस्से हैं। एक छोटे से उदाहरण से ही काम चलाते हैं। यहां स्ट्रीट लाइटस न केवल बाजार भाव से ऊंचे दाम पर खरीदी जाती रही हैं, बल्कि अफसोस ये कि इन में से तो कईयों के तो नसीब ही फूट थे। इनका तो वो इस्तेमाल भी नहीं हुआ, जिसके लिए ये खरीदी गई। ये स्टोर में पड़ी पड़ी जंग खाए जा रहीं हैं। ये तो महज मामूली से उदाहरण मात्र दिए गए हैं। ऐसे नाजुक मामलों में जो हो रहा है, जो होता होगा,वो इतने तरीके और सलीके से होता है कि उसकी जानकारी बाहर तक नहीं आ पाती। जैसे कि अपने इंजीनियरिंग विभाग। बिजली, जनस्वास्थ्य, लोक निर्माण,नगर निकाय आदि विभागों में खरीद और टेंडर कुछ अलग ही लवैल के होते हैं। सो यहां कुछ अलग ही गेम हो रही होती है। जब काम बड़े हैं तो गेम भी बड़ी होती होगी। इसे कोई एक सरकार दिल पर ना ले। ये तो पहले से हो रहा है और यंू ही चलता रहेगा। इस मामले में असल में खेल के नियमों में पहला नियम यही होता है कि भरोसा और गोपनीयता। दूसरा हिसाब साथ की साथ। कुछ पैडिंग नहीं होता। सब बंधा बंधाया होता है कि कितना कमीशन, किस को,कब, कैसे जाना होता है। सारी बेईमानी ट्रांसपेरैंसी की आड़ में और इसके नाम पर ही तो होती है। सरकारी खरीद की इस मायावी दुनिया को नमन करते हुए बशीर बद्र का शेर कहा जा सकता है कि..

हम दिल्ली भी हो आए हैं,लाहौर भी घूमे
ऐ यार मगर तेरी गली… तेरी गली है
निष्पक्ष जो हो जांच, तो ऊंची जाए आंच
सरकारी खरीद के मामले में खेल तो हद दर्जे के ही होते हैं। बहुत दफा ऐसा भी होता है कि स्पीसीफिकेशन कुछ है और माल की सप्लाई कुछ और ही हो रही है। सब कुछ इतनी स्पीड से होता है कि सभी दिशाओं से चक्को.. चक्को.. का रौला पड़ा रहता है। अब जब सैनी सरकार इस गदंगी मिटाने पर आमदा हो ही गई है तो… आईडीएफसी फर्स्ट घोटाले की सीबीआई जांच हो ही गई है तो सरकार को एक नजर इस तरफ भी देनी चाहिए। सरकारी खरीद के विवादास्पद मामलों की भी विजिलेंस अथवा सीबीआई जांच करवा ही देनी चाहिए। डर किस बात का? बाजण दो चिमटा। इस हाल पर कहा जा सकता है कि..
जब जवान हुआ तो पहाड़ों के दुख समझने लगा
बड़े बड़ों को भी अक्सर खामोश रहना पड़ता है

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

virender chahal

Our Visitor

3 6 6 6 5 6
Total Users : 366656
Total views : 600323

शहर चुनें