विजिलेंस ने दर्ज किए तीन केस
बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
पंचकूला, 2 अगस्त। हरियाणा के बहुचर्चित पर्ल ग्रुप जमीन घोटाले में विजिलेंस ब्यूरो की जांच के दौरान बड़ा खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित लोढ़ा कमेटी द्वारा विवादित जमीन पर रजिस्ट्री और हस्तांतरण पर स्पष्ट रोक लगाए जाने के बावजूद तत्कालीन राजस्व अधिकारियों ने न केवल जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) रजिस्टर्ड की, बल्कि उसी जीपीए के आधार पर करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन आगे बेच दी गई। मामले में विजिलेंस ब्यूरो ने तीन एफआईआर दर्ज कर जांच तेज कर दी है। कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि फरार आरोपियों की तलाश जारी है।
दिसंबर 2020 में लगाई गई थी रोक
विजिलेंस जांच के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित लोढ़ा कमेटी ने 10 दिसंबर 2020 को पंचकूला प्रशासन, तत्कालीन तहसीलदार और सेबी (SEBI) को पत्र भेजकर स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पर्ल ग्रुप से जुड़ी 125 कनाल 19 मरले जमीन की किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, बिक्री, ट्रांसफर या म्यूटेशन नहीं किया जाए। कमेटी ने यह भी कहा था कि संबंधित संपत्ति पहले से जांच के दायरे में है और इस पर किसी तरह का लेन-देन न्यायिक आदेशों का उल्लंघन होगा।
जनवरी 2021 में कर दी गई जीपीए रजिस्टर्ड
जांच में सामने आया है कि लोढ़ा कमेटी के निर्देशों के बावजूद तत्कालीन तहसीलदार ने जनवरी 2021 में करीब 18 एकड़ जमीन की जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) रजिस्टर्ड कर दी। इसके बाद इसी जीपीए को आधार बनाकर वर्ष 2025 में विवादित जमीन विभिन्न व्यक्तियों के नाम बेच दी गई। विजिलेंस का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया अदालत और लोढ़ा कमेटी के आदेशों की अनदेखी कर पूरी की गई।
जमीन मालिक ने कई बार भेजी थीं आपत्तियां
जांच में यह भी सामने आया कि जमीन मालिक सुखमुख सिंह ने लोढ़ा कमेटी के निर्देशों का हवाला देते हुए पंचकूला प्रशासन को कई बार ई-मेल और लिखित शिकायतें भेजीं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से रजिस्ट्री रोकने की मांग की थी, लेकिन कथित तौर पर इन शिकायतों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद वर्ष 2026 में भी जीपीए के आधार पर जमीन के हिस्से आगे बेच दिए गए।
सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में
विजिलेंस की जांच में तत्कालीन डीआरओ जोगिंदर शर्मा सहित कुछ अन्य अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप है कि सरकारी वाहन और पुलिस सुरक्षा के साथ जमीन मालिक पर दबाव बनाया गया तथा विवादित जमीन की बिक्री के लिए वातावरण तैयार किया गया। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि पूरे घटनाक्रम में किन-किन अधिकारियों और निजी व्यक्तियों की भूमिका रही तथा किस स्तर पर नियमों की अनदेखी की गई।
करोड़ों रुपये के लेन-देन की जांच
विजिलेंस बैंक खातों में हुए करोड़ों रुपये के लेन-देन की भी जांच कर रही है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि जमीन की बिक्री से प्राप्त बड़ी रकम अलग-अलग खातों में ट्रांसफर की गई। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन लेन-देन से किसे आर्थिक लाभ पहुंचा और क्या इसमें धन शोधन (मनी ट्रेल) का कोई पहलू भी जुड़ा हुआ है।
तीन एफआईआर, कई गिरफ्तारियां
विजिलेंस ब्यूरो ने इस पूरे मामले में तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की हैं। कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए लगातार छापेमारी की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान सामने आने वाले नए तथ्यों के आधार पर और भी लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
जांच जारी, और बढ़ सकती है कार्रवाई
विजिलेंस अधिकारियों के अनुसार, मामले की जांच अभी जारी है। सभी दस्तावेजों, रजिस्ट्री रिकॉर्ड, बैंक खातों और राजस्व अधिकारियों की भूमिका की गहन जांच की जा रही है। यदि जांच में किसी सरकारी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की संलिप्तता प्रमाणित होती है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी। पर्ल ग्रुप जमीन घोटाले को हरियाणा के सबसे बड़े और चर्चित भूमि घोटालों में से एक माना जा रहा है, जिसकी जांच में लगातार नए खुलासे हो रहे हैं।













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