दिलों में रंजिशें रख कर सलामती पूछते हैं लोग
बर्बाद कर के एक दूसरे की खैरियत पूछते हैं लोग
कभी कभी ऐसा लगता है कि हमारे यहां तीन समस्याएं काफी बढ गई हैं। पहली-आदमी के पास काम नहीं है। दूसरी-काम के लिए आदमी नहीं मिल रहे। तीसरी और सबसे बड़ी- काम के लिए रखे आदमी,किसी के काम के नहीं। ऐसा लगता है काम पर रखे हुए आदमी हर काम करने में निपुण होते हैं,सिवाय काम करने के। करें भी तो कैसे ये बेचारें..क्योंकि उनको काम करना आता ही नहीं। पिछले दिनों नई दिल्ली के संसद भवन में मेरा जाना हुआ। नई संसद बनने के बाद पहली दफा संसद में जाना हुआ था। इस संसद के निर्माण पर करीब 1200 करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। शुरूआत में इसका ठेका टाटा प्रोजेक्टस लिमिटेड को 862 करोड़ रूपए में दिया गया था। बाद में इसका बजट बढते बढते करीब 350 करोड़ रूपए और बढ गया। इतना पैसा खर्च कर के भी इस इमारत निर्माण में एक बुनियादी बड़ी चूक कर दी गई है। संसद के लिए जाने के लिए बने किसी दरवाजे के ऊपर पोर्च-छज्जा नहीं बनाया गया है। इस कारण से जब भी बारिश होती है मंत्रियों, सांसदों, अधिकारियों, कर्मचारियों,पत्रकारों आदि को आमतौर पर भीगते भीगते अपने वाहन तक – संसद भवन के अंदर जाना पड़ता है। जब भी ऐसी अवस्था उत्पन्न होती है,लगभग हर कोई वहां सरकार को साधुवाद दे रहा होता है कि कंक्रीट के इस जंगल में उनको प्रकृति के करीब लाने के लिए सरकार ने क्या शानदार चाक चौबंद प्रबंध किए हैं। यहां पर सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम का अहसास उनको समय समय पर करवाया जाता है। नए संसद भवन के उल्ट पुराने संसद भवन में ऐसा नहीं था। वहां दरवाजे के बाहर बडे पोर्च-छज्जे की व्यवस्था होने से लोग कुदरत से करीबी नहीं बना पाते थे। बरसात में भीगने से बच जाते थे। सरकार में अपने यहां एक से बढ कर एक धुरंधर हैं। कोई कहीं से डिग्री हथियाए हुए है, तो कोई कहीं से पढाई किए हुए हैं। एक से बढ कर एक दिमागदार इंजीनियर और वास्तुकार हैं। ऐसा नहीं है कि इंसान से गलतियां नहीं होती। बड़े बडों से भी हो जाती है। कई बड़े बड़े तो इतनी मामूली गलतियां कर बैठते हैं कि उनके बड़े होने पर शक उत्पन्न होने लगता है। गलती से और बड़ी गलती होती है उस गलती को ना सुधारना। पता नहीं ये सामान्य सी,लेकिन महत्वपूर्ण चूक को सुधारने की तरफ इन बड़े लोगों की ओर से ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा? शायद ये बड़े लोग बड़े मसलों के निदान में इस कदर खुद को व्यस्त किए हुए हैं कि इन छोटी गलतियों की तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता। या ये भी हो सकता है कि इन छोटी गलतियों में सुधारने का कार्यक्रम उनको बिलो स्टेटस लगता हो। वो क्या खाक बड़ा होगा, जो इन छोटे कामों में खुद को उलझाए हुए हो। ऐसा लगता है कि सरकार ने निदा फाजली के कहे को ज्यादा ही गंभीरता से लिया..कभी उन्होंने कहा था कि..
धूप में निकलो,घटाओं में नहा कर देखो
जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
सिर्फ आंखों से ही दुनिया नहीं देखी जाती
दिल की धड़कन को भी बीनाई बना कर देखो
पत्थरों में भी जुबां होती है,दिल होते हैं
अपने घरों के दर-ओ-दीवार सजा कर देखो
वो सितारा है चमकने दो यंू ही आंखों में
क्या जरूरी है उसे जिस्म बना कर देखो
फासला नजरों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढा कर देखो
डिनर पर चर्चा
एक सीनियर आईएएस अधिकारी ने कभी मुझे कहा था कि हमारा जीवन ऐसा सा हो गया है कि जब हम नौकरी में आते हैं तभी हम अपना दिल, दिमाग और सबसे जरूरी-अपनी रीढ की हडडी सरकार के पास गिरवी रख देते हैं। जब हम आईएएस की नौकरी या इस गुलामी से रिटायर होते हैं, तब ये तीनों वस्तुएं हमें वापस ससम्मान सुरक्षित सौंप दी जाती हैं। रिटायरमेंट के बाद अचानक से- झट से हमारी आत्मा जागृत हो जाती है। हम ऐसे ऐसे उपदेश देने लग जाएंगे, जिससे लगेगा कि हम से बड़ा कर्त्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और निडर ना तो पहले कभी इस दुनिया में अवतरित हुआ और ना ही आइंदा कभी ये कोई जोखिम ले पाएगा। हालांकि कुछ विरले आईएएस ऐसे होते हैं कि जो नौकरी में रहते हुए ही अपनी रीढ की हड्डी काफी हद तक सीधी रखते हैं। एक ऐसे ही अफसर से पिछले दिनों डिनर पर इनकाउंटर हो गया। जब इनको मेरे दिल्ली में होने की आहट हुई तो इन्होंने इसे हाथों हाथ लपका और हमें डिनर पर आमंत्रित किया। इस इतिहासिक मुलाकात के साक्षी चांद तारों के अलावा एक अन्य सज्जन भी बने, जो कभी सीएम आफिस का लंबे समय तक हिस्सा रह चुके हैं। कुल मिला कर तीनों तरफ इस मधुर मिलन के लिए बरोबर की आग थी और इस की तपिश आज भी महसूस की जा सकती है। हमने प्रदेश,देश और दुनिया के ज्वलंत मुददों पर जमकर चर्चा की। आखिर में ये नौबत आई पाई गई कि हम तीनों में हर कोई एक दूसरे की ठोढी को हाथ लगा ये कहने को आतुर सा होने लगा कि…आज गाड़ी तेरा भाई चलाएगा। भाई है तू मेरा..बस ये बता करना क्या है..चाहिए क्या तुझे। पहले मेरी सुणो-पहले मुझे बोलण दो-आप दो मिनट रूको। हालांकि इस मुकाम पर आने में कुछ वक्त को लगता है,लेकिन बातचीत जब इस हालात में पहुंच जाए तो ये मानिए कि गुफ्तगू अपनी शीर्ष अवस्था प्राप्त कर गई है। जब इस हसीन मुलाकात ने इतनी ऊंचाई प्राप्त की तो मुझे हस्तीमल हस्ती की वो रचना याद आ गई जिसमें उन्होंने कहा था कि… जिस्म की बात नहीं थी,उन के दिल तक जाना था,लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है, हम ने इलाज- ए- जख्म- ए- दिल तो ढंूढ लिया लेकिन, गहरे जख्मों को भरने में वक्त तो लगता है। हमने वहां किस्म किस्म की बातें की। जी खोल कर बातें की। जी भर के बातें की। वहां हुई सार्थक चर्चा-गल्लां बातां का यहां ज्यादा जिक्र करने से उसकी पवित्रता पर आंच आ सकती है। मैंने उन अधिकारी से जंतर मंतर पर जैन जी के हालिया आंदोलन के बारे में प्रतिक्रिया पूछी- वो बोले कि हमारे बैच के देश भर में फैले आईएएस अफसरों के एक व्हाटसअप ग्रुप पर इस नाजुक मुददे पर एक दिन चर्चा हो रही थी। एक ने कहा कि हमें इन बच्चों को थपकी देनी चाहिए कि उन्होंने अपनी मांगों के लिए आंदोलन करने की हिम्मत दिखाई। उनकी इस बात पर हमारे वाले ने खूब ही जवाब दिया। अब एक तो ये आईएएस और वो भी अपणे हरियाणा के तो बात बिना लाग लपेट- खुल कर होनी ही थी। सो जवाब में हमारे वाले अफसर ने कह दिया कि हम में से थपकी देगा कौन और कैसे? हमारे में से आधे से ज्यादा अफसर तो रिटायरमेंट के बाद सरकारी पद हथिया कर मलाई मेवा चाटने में लगे हुए हैं। और जो बचे खुचे रह गए हैं वो निरंतर इस ताक में-जुगाड़ में हैं कि हमें सरकार फिर से किसी पोस्ट पर बिठा दे। हमारी प्रतिभा का जनहित में कहीं तो लाभ ले ले। सारा दिन इसी तिगड़म में तो हम लगे रहते हैं। अब बताओ कि जब हमारा 30-35 बरस की आईएएस की नौकरी से नहीं भरा तो फिर रिटायरमेंट के बाद अब हम ऐसा कौन सा तीर मार लेंगे? मुझे तो ये देख कर हैरानी भी होती है और शर्म भी आती है कि हमारे कुछ साथी अफसर तो रिटायरमेंट के बाद महज तीन तीन महीने पद पर रहने को ही अपनी शान समझने लगे हैं।
…अरूण जेटली ने कभी केंद्र सरकार को चेताया था
राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहते हुए अरूण जेटली ने कभी केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार को चेताया था कि आईएएस अधिकारियों और न्यायधीशों को रिटायरमेंट के बाद नए नए पदों का सृजन कर फिर से सरकारी पदों पर बिठाने का प्रोग्राम तत्काल बंद होना चाहिए। इनके लिए एक तरह से जबरदस्ती का पार्किग गैराज बनाया जा रहा है। सरकारी टैक्स से हासिल जनता का धन बेदर्दी से इन पर लुटाया जा रहा है। ये एक अपराधिक कृत्य है। इसके लिए जनता हमें कभी माफ नहीं करेगी। अगर ऐसा यंू ही जारी रहा तो न्यायपालिका और कार्यपालिका की संस्थाएं चरमरा जाएंगी। ये अपने दायित्व का ईमानदारी,निष्पक्षता और पारदर्शिता से निर्वहन नहीं कर पाएंगी। इनका तो एक सूत्री एजैंडा सरकार के शीर्ष नेतृत्व को खुश कर रिटायरमेंट के बाद अपने लिए बढिया से बढिया पद का जुगाड़ करने का रहेगा। ऐसे में ये लोग कहां से कभी किसी के साथ इंसाफ कर पाएंगे? कहां से ठीक को ठीक और गलत को गलत कहने का जिगरा लाएंगे? अरूण जेतली तो इसके लिए तब की कांग्रेस सरकार पर तोहमत लगा रहे थे, जबकि अब दुर्भाग्य से ये कार्यक्रम भाजपा सरकारों में कहीं ज्यादा धड़ल्ले और तीव्र गति से कुलांचे भर रहा है। ये अधिकारी कहने लगे कि पिछले दिनों एक रिटायर्ड बैचमेट आईपीएस मिल गए। वो कहने लगे कि नौकरी करना बड़ा मुश्किल हो गया था। ऐसा लगता था कि हम आईएएस तो नौकरी में आते ही सरकार को खुश करने में और अपना घर भरने में लग जाते हैं। फिर इस पर आंख रख लेते हैं कि रिटायरमेंट के बाद हमें कौन सा मलाईदार पद पाना है। इधर, हमारी आईपीएस बिरादरी का भी यही हाल है। ऐसा सा लगता है कि जिस किसी की तरफ सरकार ने काटने का इशारा कर दिया हम पालतू बन झट से पंूछ उठा कर उसके पीछे हो लेते हैं। ना केस की मैरिट देखते हैं, ना फैक्टस देखते हैं। बेकसूरों को झट से अंदर ठोक देते हैं। सरकार को खुश करने में जान झौंक देते हैं। और अपने अधीनस्थों पर रौब डालते हैं कि ये ऊपर का आदेश है ये काम तो न केवल करना ही है, बल्कि जल्दी भी करना है।
गलत आदेश मेरा भी मत मानना-सरदार पटेल
देश के पहले गृह मंत्री रहे सरदार पटेल ने वर्ष 1947 में भारतीय प्रशासनिक सेवा-आईएएस के पहले बैच के प्रोेबेशनर्स अधिकारियों को संबोधित करते हुए उनको भारत के स्टील फ्रेम का खिताब दिया था। सरदार पटेल के संबोधन की मुख्य बातें थे कि एक सिविल सेवक को राजनीति में भाग नहीं लेना चाहिए। उसे हमेशा निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। उन्होंने अफसरों से ये अपेक्षा की थी कि वे बिना डर या पक्षपात के राष्ट्र की सेवा करें और अपने चरित्र व कार्यकुशलता से एक मजबूत परंपरा की नींव रखें। उन्होंने यहां तक कहा था कि कोई कितना ही बड़ा व्यक्ति हो, उसका गलत आदेश किसी भी सूरत में ना माना जाना जाए। यहां तक की अगर मैं भी नियमों के खिलाफ आदेश दंू तो ये अधिकारियों को इसे हरगिज नहीं मानना चाहिए। उनमें सही सलाह देने का दम होना चाहिए। उनमें सच के साथ खड़े होने का हौसला होना चाहिए। खैर ये तो हुई सरदार पटेल की बात। मगर अब ना तो हमारे देश में पटेल जैसे नेता रहे और ना ही उस जमाने के अफसर रहे। कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं,लेकिन उनकी संख्या काफी कम है। भारत सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग-डीओपीटी के आंकड़ों के मुताबिक देश में आईएएस के कुल 6877 स्वीकृत पद हैं, जिन में से 5577 वर्तमान में कार्यरत हैं,जबकि शेष खाली हैं। आप कल्पना कीजिए कि अगर ये पांच हजार लोग ही सरकारों के गलत आदेश मानने से इंकार कर दें तोे देश का कितना कायाकल्प-कायापल्ट हो जाएगा। जानकारी के लिए बतला दें कि इन उपरोक्त आईएएस अधिकारी को नौकरी से रिटायरमेंट के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहरलाल खटटर ने एक से अधिक मौकों पर सरकरी पद पर एडजैस्ट करने की भी पेशकश की,लेकिन इसे उन्होंने विनम्रता से ये कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि.. बहुत हो ली नौकरी,बहुत हो ली सरकार की जी हजूरी, मैं अब जिंदगी जीना चाहता हंू। इस हालात पर कहा जा सकता है कि..
उस की आंखों में उतर जाने को जी चाहता है
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है
किसी झूठे को अगर सच का पहरेदार कहना पड़ जाए तो
ऐसे जीने से तो मर जाने को जी चाहता है
इक इक बात में सच्चाई है उस की लेकिन
अपने वादों से मुकरने जाने को जी चाहता है
अपनी पलकों पे सजाए हुए यादों के दीये
उस की नींदों से गुजर जाने कोे जी चाहता है
एक उजड़े हुए वीरान खंडहर में अब जाना
है तो ना-मुनासिब,मगर जाने को जी चाहता है














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